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क्या खत्म होगी 50% आरक्षण की सीमा?

UB India News by UB India News
July 7, 2024
in TAZA KHABR, पटना, बिहार
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क्या खत्म होगी 50% आरक्षण की सीमा?
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बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर पटना हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी है जिसमें राज्य की ओर से पारित 65% आरक्षण कानून को रद्द कर दिया गया था. पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के दो कानूनों को रद्द कर दिया था.

ये कानून सरकारी नौकरियों और एजुकेशन इंस्टीट्यूट में पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण को 50% से बढ़ाकर 65% करने के लिए बनाए गए थे. हाईकोर्ट ने कहा था कि ये कानून संविधान के उन अनुच्छेदों के खिलाफ हैं जो समानता का अधिकार देते हैं. अब बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट से कह रही है कि हाईकोर्ट का फैसला गलत था.

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बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका में कहा है कि पिछड़े वर्गों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में सही प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण का प्रतिशत तय करना राज्य का अधिकार है. हाईकोर्ट अपने विचारों को राज्य के विचारों से ऊपर नहीं रख सकता.

आखिर क्यों 65% आरक्षण लागू करना चाहती है बिहार सरकार?
बिहार में पिछले साल (2022-23) जाति आधारित जनगणना हुई थी. इसी जनगणना के नतीजों के आधार पर सरकार ने आरक्षण बढ़ाने का फैसला किया था. जनगणना में पता चला कि बिहार की करीब 85% आबादी पिछड़ी जातियों (अत्यंत पिछड़ी जातियां, अन्य पिछड़ी जातियां, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति) से आती है. इसी के तहत बिहार सरकार ने आरक्षण की सीमा बढ़ाने वाले दो कानून पारित किए.

बिहार सरकार का कहना है कि जाति आधारित जनगणना से पता चला है कि पिछड़े वर्ग के लोग जमीन, शिक्षा, घर जैसी बुनियादी सुविधाओं और आमदनी की सुरक्षा जैसे सामाजिक और आर्थिक मामलों में काफी पीछे हैं. इसलिए, इन समुदायों को ज़्यादा मदद, सरकारी नौकरियों और पढ़ाई में ज्यादा जगह देने की सख्त जरूरत है.

लेकिन पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार के इस फैसले को रद्द कर दिया. 87 पन्नों के अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार ने सिर्फ आबादी के हिसाब से आरक्षण बढ़ाया, ये सही नहीं है. असल में सरकारी नौकरियों और पढ़ाई में इन जातियों के कितने लोग हैं, ये देखना ज़रूरी था. हाईकोर्ट के अनुसार, सिर्फ आबादी के आधार पर आरक्षण देना भेदभाव और समानता के अधिकार के खिलाफ है.

हाईकोर्ट ने कहा कि आरक्षण 50% से ज़्यादा नहीं हो सकता और बिहार सरकार ये नहीं बता पाई कि इतना ज़्यादा आरक्षण क्यों ज़रूरी है. हालांकि, बिहार सरकार हाईकोर्ट के फैसले से बिल्कुल सहमत नहीं है और उसने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी है.

मंडल कमीशन क्या है?
सुप्रीम कोर्ट जल्द ही बिहार में 65% आरक्षण के मामले की सुनवाई करने जा रहा है. इसकी वजह से मंडल कमीशन को लागू करने का सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसले एक बार फिर चर्चा में है. साल 1978 में भारत सरकार ने पिछड़े वर्गों को आगे बढ़ाने के लिए एक कमिशन बनाया जिसे मंडल कमीशन के नाम से जाना जाता है. तबये जनता पार्टी की सरकार थी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे.

ये कमिशन ये पता लगाने के लिए बना था कि असल में कौन से समाज भारत में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं. इसको समझने के लिए उन्होंने 11 अलग-अलग स्थितियों को देखा. जैसे किसी समाज की आर्थिक स्थिति, शिक्षा का स्तर और सामाजिक रिवाज.

कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि भारत की आबादी का लगभग 52% हिस्सा ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (ओबीसी) में आता है. इन लोगों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देकर आगे बढ़ाने की सिफारिश की गई. इस रिपोर्ट में सिर्फ हिंदू समाज के पिछड़े वर्गों को ही नहीं, बल्कि मुस्लिम, सिख, ईसाई और बौद्ध धर्मों में भी पिछड़े वर्गों की पहचान की गई.

क्या राज्य आरक्षण की 50% सीमा तोड़ सकते हैं?
1989 से 1992 के बीच केंद्र सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया था. ये सिफारिशें पिछड़ा वर्ग (OBCs) को आरक्षण देने के लिए थीं. इस फैसले के बाद देश में काफी राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल मची थी. उन्हीं सिफारिशों को कोर्ट में चुनौती दी गई और मामला सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों वाली संविधान पीठ के पास भेज दिया गया.

1992 के इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़े वर्गों के लिए 27 फीसदी आरक्षण को तो बरकरार रखा, लेकिन सरकार के उस नोटिफिकेशन को खारिज कर दिया जिसमें उच्च जातियों के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए सरकारी नौकरियों में 10% आरक्षण रखा गया था. इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि आरक्षण का फायदा लेने वाले लोगों की कुल संख्या भारत की आबादी के 50% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

पीठ के 9 जजों में से 5 जजों ने कुछ अपवादों के साथ आरक्षण की सीमा 50% रखने के पक्ष में फैसला सुनाया. वहीं 3 जजों ने आरक्षण की सीमा को पूरी तरह से 50% तक ही सीमित रखने के पक्ष में फैसला सुनाया. एक जज ने 50% की सीमा खत्म करने के पक्ष में फैसला दिया. ये फैसला सर्वसम्मति से नहीं आया था.

इस पर बिहार सरकार का कहना है कि हाईकोर्ट ये बात नहीं समझ पाया कि 50% का आरक्षण एक सख्त नियम नहीं है. कुछ खास स्थितियों में इसे तोड़ा जा सकता है.

बिहार सरकार ने इंदिरा साहनी मामले को दी चुनौती?
बिहार सरकार ने इंदिरा साहनी मामले पर पटना हाईकोर्ट की व्याख्या को चुनौती दी है. बिहार सरकार कह रही है कि हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दो फैसलों ‘इंदिरा साहनी केस’ और ‘जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल केस’ में बताए गए कानून को ठीक से नहीं समझा. इन फैसलों में बताया गया था कि अनुच्छेद 16(4) का असली मतलब और महत्व क्या है.

राज्य का कहना है कि इंदिरा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने 50% की सीमा को अनिवार्य नहीं बनाया था, लेकिन हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अल्पमत की राय के आधार पर फैसला सुनाया.

बिहार सरकार ये भी कह रही है कि हाल ही में जब मराठा आरक्षण का मामला आया था, तब कुछ राज्यों ने इस 50% वाले मुद्दे को एक बड़ी बेंच के पास भेजने की बात कही थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा करने से मना कर दिया. तो अब बिहार सरकार कह रही है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही इस मुद्दे को बड़ी बेंच के पास नहीं भेजा, तो इसका मतलब है कि वो 50% की सीमा को लेकर अभी भी अपने पुराने स्टैंड पर ही हैं. बिहार सरकार का तर्क है कि 50% से ज्यादा आरक्षण दिया जा सकता है, बस उसके लिए ठोस वजह होनी चाहिए.

बिहार सरकार का कहना है कि इंदिरा साहनी केस में जो फैसला आया था, उसमें एक छोटा सा रास्ता छोड़ा गया था. फैसले में कहा गया था कि आमतौर पर आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए, लेकिन अगर कोई राज्य ये साबित कर दे कि उसके यहां कुछ जातियां बहुत ही पिछड़ी हुई हैं, तो 50% की सीमा को तोड़ा जा सकता है.

बिहार का कहना है कि वही इकलौता राज्य है जिसने जाति सर्वेक्षण करवाया. सिर्फ जाति ही नहीं, बल्कि लोगों की आर्थिक हालत और पढ़ाई-लिखाई का भी पूरा ब्योरा निकाला. इस जाति सर्वेक्षण से साफ पता चलता है कि कुछ जातियां अभी भी बहुत पिछड़ी हुई हैं. ये साबित कर दिया है कि बिहार में 50% से ज्यादा आरक्षण की जरूरत है. अब बिहार सरकार चाहती है कि उनके इस सर्वे को देखा जाए और फिर फैसला लिया जाए कि क्या वाकई में वहां 50% से ज्यादा आरक्षण दिया जा सकता है या नहीं.

जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
मराठा समुदाय महाराष्ट्र की आबादी का एक बड़ा हिस्सा है और वो काफी समय से सरकारी नौकरियों और पढ़ाई में आरक्षण की मांग कर रहा है. उनकी मांगों को मानते हुए ‘सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के लिए महाराष्ट्र राज्य आरक्षण अधिनियम 2018’ लाया गया. इस कानून के तहत मराठा समुदाय को राज्य की नौकरियों और शिक्षा क्षेत्र में 16% आरक्षण दिया गया. मगर इस फैसले को जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल नाम के शख्स ने कोर्ट में चुनौती दी. उनका कहना था कि ये आरक्षण असंवैधानिक और गलत है.

हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस कानून को असंवैधानिक तो नहीं माना, लेकिन कोर्ट ने ये भी कहा कि 16% आरक्षण ज्यादा है और इसे घटाकर 12-13% किया जाना चाहिए. हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई. 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अहम फैसला सुनाते हुए महाराष्ट्र सरकार के आरक्षण कानून को असंवैधानिक करार दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि उसने मराठा आरक्षण की ज़रूरत को सही ठहराने के लिए ठोस आंकड़े इकट्ठा नहीं किए. कोर्ट ने इस फैसले के पीछे राजनीतिक कारणों की तरफ भी इशारा किया. संविधान पीठ की अध्यक्षता करने वाले जस्टिस भूषण ने कहा कि अनुच्छेद 16(4) के तहत 50% आरक्षण की सीमा की शर्त मराठों को नौकरियों और शिक्षा में 12% और 13% आरक्षण देने में पूरी नहीं होती.

वहीं याचिकाकर्ता पाटिल ने शुरू से ही तर्क दिया है कि सिर्फ जाति के आधार पर आरक्षण देना सही नहीं है. बल्कि, आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति होना चाहिए. उन्होंने ये भी बताया कि कई समुदाय जो पहले से ही सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में अच्छी स्थिति में हैं, उन्हें आरक्षण का फायदा मिल रहा है जबकि गरीब तबके के लोग इससे वंचित रह जाते हैं.

65% आरक्षण मामले में बिहार सरकार जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामले का जिक्र करके हुए एक बड़ी बात कह रही है. बिहार का कहना है कि जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ-साफ कहा था कि 50% से ज्यादा आरक्षण देने के लिए ये नहीं देखना चाहिए कि कोई जगह कहां है. बल्कि ये देखना चाहिए कि वहां के लोगों की सामाजिक हालत कैसी है.

संविधान में आरक्षण को लेकर किए गए प्रावधान
भारत के संविधान का भाग 16 केंद्र और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण की बात करता है. इसे आप इस तरह समझ सकते हैं कि संविधान ने राज्य और केंद्र सरकार को सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सीटें आरक्षित करने का अधिकार दिया है. ये अधिकार संविधान के अनुच्छेद 15(4) और 16(4) में दिया गया है.

संविधान में बाद में बदलाव भी किए गए हैं. 1995 में संविधान (77वां संशोधन) अधिनियम द्वारा संविधान में संशोधन किया गया था और अनुच्छेद 16 में एक नया खंड (4A) जोड़ा गया था. इस संशोधन के बाद सरकार पदोन्नति में भी आरक्षण देने में सक्षम हो गई. 2001 में संविधान (85वां संशोधन) अधिनियम लाया गया. इस संशोधन ने अनुच्छेद 16(4A) में थोड़ा बदलाव किया. इस बदलाव के तहत आरक्षण के जरिए प्रमोशन पाने वाले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को वरिष्ठता का भी फायदा मिलने लगा.

2000 में संविधान में 81वां संशोधन किया गया था. इस संशोधन के तहत संविधान में अनुच्छेद 16 (4बी) जोड़ा गया. ये धारा सरकार को ये अधिकार देती है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सरकारी नौकरियों के अगर किसी साल पूरे पद न भर पाएं, तो उन खाली पदों को अगले साल में जोड़ा जा सकता है. इससे कुल आरक्षण 50% से ज्यादा हो सकता है.

आरक्षण की मांग क्यों बढ़ती जा रही है?
कई लोगों का मानना है कि सरकार ने विकास की जो नीतियां बनाई हैं, उनकी वजह से कुछ लोगों को तो फायदा हुआ है, लेकिन बहुत से लोग अब भी पिछड़े हुए हैं. ऐसे में ये लोग आरक्षण को अपने हालात सुधारने का रास्ता समझते हैं.

हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में भले ही अर्थव्यवस्था अच्छी है, लेकिन वहां के लोगों को तीन बड़ी समस्याएं हैं: खेती की जमीनों की खस्ता हालत, रोजगार के कम अवसर और विकास असमान रूप से होना. इन सब मुश्किलों को दूर करने के बजाय सरकारों के लिए आरक्षण की बात करना ज्यादा आसान होता है.

अब ऊंची जाति के लोग भी आरक्षण की मांग कर रहे हैं. उनकी चिंता ये है कि आरक्षण की वजह से उन्हें सरकारी नौकरियों में कम मौके मिल रहे हैं. उन्हें लगता है कि पिछड़ी जातियों को मिलने वाले फायदे उन्हें नहीं मिल पा रहे हैं.

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