महिला अधिकारों की बात करने वाली देश की दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों ने बिहार में अपने कोटे से एक भी महिला कैंडिडेट्स नहीं दिए हैं। एनडीए की सहयोगी दल लोजपा राम विलास और जेडीयू ने दो-दो महिला कैंडिडेट्स दिए हैं, लेकिन वह भी आम नहीं, पॉलिटिकली खास हैं। राजद ने एनडीए को टक्कर देने के लिए 6 महिला कैंडिडेट्स उतारे हैं, लेकिन इसमें भी लालू परिवार से लेकर बाहुबलियों के परिवार का दबदबा दिख रहा है।
3.6 करोड़ महिला वोटर्स की कौन बनेगा आवाज
13 करोड़ से अधिक की जनसंख्या वाले बिहार में लगभग 7.6 करोड़ वोटर्स हैं। बात महिला वोटर्स की करें तो यह संख्या लगभग 3.6 करोड़ है। यहां की 40 लोकसभा सीट पर एनडीए और महागठबंधन की तरफ से 40-40 कैंडिडेट्स मैदान में उतारे गए हैं।
हालांकि, महिला सुरक्षा और महिला आरक्षण से लेकर महिलाओं के मुद्दों के लिए लड़ाई लड़ने वाली पार्टियां महिला कैंडिडेट्स पर भरोसा नहीं जता पाती हैं। चुनाव से महिलाओं के मुद्दे भी गायब रहते हैं।
परिवारवाद और बाहुबली कनेक्शन है इसके पीछे कारण
जेडीयू और लोजपा रामविलास के साथ महागठबंधन ने बिहार में 10 महिला कैंडिडेट्स को इस बार चुनाव मैदान में उतारा है। परिवारवाद और बाहुबली कनेक्शन नहीं होता तो महिला कैंडिडेट्स की संख्या और कम हो जाती। इसमें आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव की बेटी पाटलिपुत्र से मीसा भारती और सारण से रोहिणी आचार्य शामिल हैं।
मुंगेर से कुख्यात अशोक महतो की पत्नी अनीता देवी, समस्तीपुर से मंत्री अशोक चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी, पूर्णिया से कुख्यात अवधेश मंडल की पत्नी बीमा भारती, शिवहर से बाहुबली आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद, सीवान से पूर्व विधायक रमेश कुशवाहा की पत्नी विजयलक्ष्मी देवी और वैशाली से वीणा देवी मैदान में हैं। वीणा देवी दिनेश सिंह की पत्नी हैं।
इस कानून ने बाहुबलियों को मजबूर किया
बिहार के लोकसभा सीट पर आम महिला प्रत्याशियों की जगह बाहुबलियों की पत्नी या नेताओं की बेटियों को कैंडिडेट्स बनाने के सवाल पर सीनियर जर्नलिस्ट लव कुमार मिश्रा कहते हैं- ‘पत्नी और बेटी को चुनाव में उतारना मनमोहन सिंह की सरकार से शुरू हुआ था।
जब देश में मनमोहन सिंह की सरकार थी तो उन्होंने साल 2013 में एक अध्यादेश लाया था, जिसके मुताबिक जिन लोगों को 2 साल की सजा सुनाई गई हो या सजा काटी हो, वह लोग चुनाव लड़ने योग्य नहीं होंगे। फिर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह निर्णय लिया गया कि जो भी व्यक्ति 2 साल से ज्यादा के लिए जेल जा चुके हैं या सजा सुनाई गई है, वह व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ेगा।’
इसके बाद से यह परंपरा चल आ रही है कि बिहार में बाहुबली की पत्नी या फिर नेताओं की बेटियां चुनाव में उतर रही हैं।
जब यह कानून बना तो सबसे पहली गाज उत्तर प्रदेश के सांसद पर गिरा था, उन्हें सजा हुई थी, इसलिए उनकी सदस्यता चली गई। इस कानून ने ही लालू प्रसाद यादव की भी सदस्यता छीन ली थी।
पिछले एक दशक से आम महिला प्रत्याशियों की जगह नेताओं या बाहुबलियों की बीवी, बेटी या बेटों को चुनाव में उतरा जा रहा है। जिसका फायदा भी उन्हें देखने को मिलता है।
अगर किसी नेता या फिर बाहुबली की पत्नी या बेटी चुनाव में उतरती है तो महिलाएं उन्हें वोट देने जरूर जाएंगी। इसके दो कारण हैं पहला- सिंपैथी और दूसरा- बाहुबली का दबदबा, जिस कारण ऐसी महिला प्रत्याशियों का वोट मार्जिन बढ़ जाता है।
महिलाएं तो मोहरा..काम तो बाहुबली या दागदार करेगा
चुनाव में महिला प्रत्याशियों की कमी और महिलाओं से जुड़े मुद्दे गायब होने के पीछे पार्टी की महिला विंग का हाथ है। प्रवीण बागी मानते हैं कि जितनी भी पार्टियां बिहार में हैं, वह पुरुष मानसिकता वाली सोच से प्रेरित हैं। इसी के चलते लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण का बिल लंबे समय से लटकता रहा। कई हंगामे और बिल फाड़ने के बाद यह बिल पास हो चुका है।
प्रवीण बागी कहते हैं कि चाहे पक्ष में हो या फिर विपक्ष में जितने भी नेता हैं, वह एक मत होकर इस पर काम करते हैं। नेताओं का ऐसा व्यवहार बताता है कि वह महिलाओं को राजनीति में नहीं आने देना चाहते हैं। यही कारण है कि महिला प्रत्याशियों को चुनाव में टिकट नहीं दिए जा रहे हैं। जिससे पुरुष प्रधान इस समाज में चुनाव के दौरान पुरुषों के टिकट न छीन जाए।
महिला कैंडिडेट्स के लिए पुरुष ही बाधा
जर्नलिस्ट प्रवीण बागी कहते हैं, महिलाओं को लेकर सभी राजनीतिक पार्टियों का एकमत है कि महिलाएं दौड़ भाग का काम नहीं कर सकती हैं। चुनाव में अगर उन्हें उतारा भी जाएगा तो वह अपने क्षेत्र में घूम-घूम कर प्रचार-प्रसार नहीं कर पाएंगी। जिस वजह से टिकट की दौड़ में महिलाएं पिछड़ जाती हैं।
बाहुबली की पत्नी या फिर नेताओं की पत्नी या बेटी को टिकट देना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन, सामान्य महिला के लिए बड़ी चुनौती है। बाहुबली और दागदार नेताओं के घर की महिलाएं तो चुनाव में डमी कैंडिडेट ही मानी जाती हैं।
चुनाव का चेहरा तो वह बन जाती है, लेकिन उसके पीछे सारा काम परिवार का होता है और वहीं चुनाव लड़ते हैं।
महिलाओं के मुद्दे को लेकर प्रवीण बागी का मानना है- जितने भी महिला संगठन हैं, वह महिलाओं के मुद्दे को सही से उठा नहीं पा रही, जिस कारण वह मुद्दे पिछड़ते जा रहे हैं। हर पार्टी में अपना महिला मोर्चा विंग होता है, लेकिन वहां भी वह अपनी स्वतंत्र हैसियत नहीं बना पाती, जिस कारण पार्टी भी उन्हें दरकिनार रखती है।
1984 में महिला सांसदों का बना था रिकॉर्ड
साल 1977 के लोकसभा चुनाव में बिहार महिला प्रतिनिधि पूरी तरह से शून्य रहा। लेकिन, 1980 के लोकसभा चुनाव 5 महिला कैंडिडेट्स ने जीत हासिल की थी। इनमें वैशाली से किशोरी सिन्हा, शिवहर से रामदुलारी सिन्हा, पूर्णिया से माधुरी सिंह, बेगूसराय से कृष्णा शाही और पलामू से कमला कुमारी शामिल थीं। तब झारखंड बिहार का हिस्सा था। रामदुलारी सिन्हा बिहार की पहली महिला थीं, जिन्हें राज्यपाल बनाया गया था।
अगर रिकॉर्ड की बात करें तो बिहार में महिलाओं का सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली लोकसभा साल 1984 में रही। साल 1984 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 9 महिलाएं लोकसभा सदस्य चुनी गईं। इसमें मोतिहारी से प्रभावती गुप्ता, वैशाली से किशोरी सिन्हा, बलिया से चंद्रभानु देवी, पूर्णिया से माधुरी सिंह, बांका से मनोरमा सिंह, बेगूसराय से कृष्णा शाही, लोहरदगा से सुमति ओरांंव और पलामू से कमला कुमारी चुनाव में निर्वाचित हुईं।
महिलाओं के लिए बिहार में सेफ स्पेस नहीं
लोकसभा चुनाव में महिला कैंडिडेट्स को लेकर RJ अंजलि कहती हैं, बिहार में महिलाओं के लिए एक सेफ स्पेस की कमी है। आज भारत स्पेस में जगह बना चुका है, लेकिन बिहार में महिलाओं को लेकर राजनीतिक पार्टियों का नजरिया ठीक नहीं है। आज भी यहां चुनाव बिजली, पानी और सड़क पर सीमित है।
हम 2024 में हैं, इस वक्त सबसे अहम मुद्दे एजुकेशन, टेक्नोलॉजी और ऐंप्लायमैंट है। अगर, इस मुद्दे पर बात करे तो बिहार का विकास ज्यादा तेजी से होगा। महिला सुरक्षा पर तो बात ही नहीं होती, जबकि हर परिवार की यह बड़ी चिंता है। महिला होने के नाते मुझे सोचना पड़ता है कि रात 8 बज रहे हैं, अब घर लौट जाना चाहिए। बिहार में पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर कोई भी बात नहीं करता। जबकि, राज्य की ज्यादातर आबादी इसी पर निर्भर है।
महिलाओं की योजना उन तक नहीं पहुंच रही
पटना के मगध महिला कॉलेज की होम साइंस डिपार्टमेंट की एचओडी सुहेली मेहता मानती है कि महिलाओं के लिए कई सरकारी योजनाएं हैं, लेकिन वह उन तक नहीं पहुंच पा रही हैं। बिहार सहित देश में महिला सशक्तिकरण पर काफी काम हुए हैं।
आगे के लिए भी काम किए जा रहे हैं। इसके बावजूद भी महिलाएं सुरक्षित नहीं है। बिहार में महिलाओं की सुरक्षा और उन्हें इंडिपेंडेंट बनाना बड़ा मुद्दा होना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकार की कई योजनाओं के बाद भी महिलाएं घर से लेकर रोड तक सुरक्षित नहीं है। इसीलिए सुरक्षा और इंडिपेंडेन्सी महिलाओं के बड़े और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। जिस पर चुनावी प्रत्याशियों को ध्यान देना चाहिए।
महिला वोटर बढ़ीं, लेकिन मुद्दों से महिलाएं गायब
लोकसभा चुनाव में महिलाओं की भागीदारी और मुद्दों को लेकर सीनियर जर्नलिस्ट रजनी शंकर कहती हैं, बिहार में बड़ा गैप है। वह 30 वर्षों से पत्रकारिता में हैं, लेकिन महिलाओं के मुद्दे को लेकर कभी राजनीतिक पार्टियों को गंभीर होते नहीं देखा। महिलाओं के मुद्दे पर बराबरी की बात ही नहीं होती है। महिलाओं को भी पुरुषों की तरह मौका दिया जाना चाहिए।
यह दुखद है कि चुनाव से महिलाओं के मुद्दे गायब हो गए हैं। अब महिला प्रत्याशी भी धीरे-धीरे गायब हो रही हैं। रजनी कहती हैं, बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में महिला वोटर्स की संख्या सबसे अधिक थी।
अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए वह घर से निकलकर बाहर आ रही हैं। लेकिन, अफसोस की बात यह है कि जब चुनाव के लिए महिला प्रत्याशी चुनने की बात होती है तो सभी दल केवल परिवार और बाहुबलियों को साधते हैं। जमीन से जुड़ी महिलाएं चुनाव में उतरेंगी तो उन्हें जमीनी हकीकत पता होगी।
ऐसे कैंडिडेट्स से क्या उम्मीद
पॉलिटिकल एक्सपर्ट लव मिश्रा कहते हैं, देश की दो बड़ी पार्टियों ने बिहार में एक भी महिला प्रत्याशी चुनाव में नहीं उतारा, बाकी जिन दलों ने महिला कैंडिडेट्स दिए हैं, उसमें अधिकतर ने जमीन पर कोई काम नहीं किया है। इसके साथ ही कुछ प्रत्याशी ऐसे भी हैं, जिनके पति चुनाव नहीं लड़ सकते। इसलिए उन्हें लोकसभा चुनाव में मोहरा बनाया गया है।
चुनाव के लिए शादी तक कर ली जाती है। ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार में पॉलिटिकल पार्टियों की मंशा क्या है? बिहार में वाजिब मुद्दों के सिमटने के पीछे यही सबसे बड़ा कारण भी समझ में आता है।
अगर समाज में अच्छा और जमीनी काम करने वाली महिलाओं को पार्टियां कैंडिडेट्स बनाती तो महिलाओं के मुद्दे दिल्ली तक पहुंचते। यहां तो परिवारवाद और बाहुबलियों के चक्कर में ऐसी महिला कैंडीडेट्स हैं जो जीत के बाद भी महिला मुद्दों पर आवाज नहीं उठा सकती हैं। विपक्ष उन्हें परिवारवाद या फिर बाहुबली कनेक्शन पर घेर लेगा।
घरेलू हिंसा में आई कमी, फिर भी बढ़ा क्राइम
महिलाओं को लेकर बढ़ते क्राइम के ग्राफ को लेकर पटना हाई कोर्ट की एडवोकेट्स एसोसिएशन की उपाध्यक्ष एडवोकेट छाया मिश्रा कहती हैं, बिहार में शराबबंदी बहुत बड़ी सफलता मानी जाती है। घरेलू हिंसा में कमी का दावा तो किया जाता है, लेकिन इसके बाद भी महिला अपराध में कमी नहीं हाे रही है।
बिहार में महिलाओं के लिए सुरक्षा सबसे बड़ा इश्यू है, लेकिन चुनाव में यह मुद्दा क्यों नहीं बनता? ग्रामीण और शहरी इलाकों में महिला के साथ छेड़खानी, चेन स्नैचिंग, रेप की घटनाओं में काफी वृद्धि हुई है। इसके बाद भी सुरक्षा के मुद्दे पर क्यों नहीं किसी महिला कैंडिडेट्स को उतारा जाता है।
राजनीतिक पार्टियों ने कई निर्वाचन क्षेत्रों में ऐसे नेता या बाहुबली पर भरोसा जताया है जो कानूनी तौर पर चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हैं। ऐसे में उन्होंने अपनी पत्नी या बेटी को उस सीट से उम्मीदवार बनाया है।
ऐसी प्रॉक्सी कैंडिडेट की जगह योग्य, सक्षम और साफ छवि का प्रत्याशी हो तो उसे ही चुनाव में उतारना चाहिए। लेकिन राजनीति में आए परिवारवाद और करप्शन के कारण सामान्य महिलाएं सदन तक नहीं पहुंच पा रही हैं। जिस पर दाग लगता है, दाग के कारण चुनाव नहीं लड़ सकता है। ऐसे ही नेताओं के घर की बहू बेटियों को टिकट देकर चुनाव जितवाया जाता है।
बिहार की 10 महिला कैंडिडेट्स को जानिए
लालू की बेटी मीसा पाटलिपुत्र से कैंडिडेट

लालू की बेटी मीसा को राजद ने पाटलिपुत्रा से कैंडिडेट बनाया है। लैंड फॉर जॉब मामले में तेजस्वी के साथ मीसा का भी नाम है। मीसा भारती पर पिता लालू यादव के साथ मिलकर घोटाला करने का आरोप है। वह पाटलिपुत्र लोकसभा सीट से कई बार चुनाव लड़ चुकी हैं, लेकिन जीत से कोसों दूर रहीं।
लालू की बेटी सारण से कैंडिडेट

बिहार की सबसे हॉट सीट के साथ लालू यादव के गढ़ रहे सारण सीट से राजद ने रोहिणी आचार्य को कैंडीडेट बनाया है। वह पहली बार किसी चुनाव में उतरी हैं। पिछले 2 बार से लालू परिवार को सारण सीट से हार का सामना करना पड़ रहा है। रोहिणी के सामने अपने पिता की विरासत को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी है। एमबीबीएस कर चुकी रोहिणी के साथ पिता को किडनी देने की सिमपैथी है।
पूर्व IAS की पत्नी रितु जायसवाल कैंडिडेट

पूर्व आईएएस अधिकारी की पत्नी और पूर्व मुखिया रितु जायसवाल को राजद ने शिवहर से टिकट दिया है। रितु 2016 में सीतामढ़ी जिला के चर्चित मुखिया के नाम से भी जानी जाती हैं। रितु ने 7 दिसंबर 1996 को आईएएस अरुण कुमार से शादी की थी। 26 दिसंबर 2018 को विज्ञान भवन नई दिल्ली में भारत के उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू की ओर से चैंपियंस ऑफ चेंज (पुरस्कार) मिल चुका है।
टिकट के लिए अनीता ने की शादी

अनीता देवी कुख्यात अशोक महतो की पत्नी हैं। अशोक महतो दागदार हैं, इसलिए लोकसभा में एंट्री के लिए चुनाव से पहले आनन-फानन में शादी किए और अनीता से आशीर्वाद दिलाकर उन्हें मुंगेर से आरजेडी से कैंडिडेट बनवा दिया। अनीता देवी की पहचान बस इतनी है कि वह कुख्यात की पत्नी हैं। बाकी इससे पहले उन्हें कोई जानता भी नहीं था।
पूर्व विधायक की पत्नी सीवान से कैंडिडेट

पूर्व विधायक रमेश कुशवाहा की पत्नी विजय लक्ष्मी देवी को सीवान लोकसभा सीट से कैंडिडेट बनाया गया है। विजयलक्ष्मी देवी कभी भी सक्रिय राजनीति का हिस्सा नहीं रही हैं। लेकिन, इसके बावजूद भी उन्हें जेडीए ने कैंडिडेट बनाया है। वह पहली बार चुनाव मैदान में हैं।
आनंद मोहन की पत्नी शिवहर से कैंडिडेट

बिहार के बाहुबली और पूर्व सांसद आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद को जेडीयू ने शिवहर से कैंडिडेट बनाया है। आनंद मोहन के लिए नीतीश सरकार ने जेल मैनुअल में बदलाव कर 27 कैदियों को रिहा कर दिया था। लवली आनंद के बेटे चेतन आनंद भी विधायक हैं। लवली का परिवार पूरी तरह से पॉलिटिकल है। इस कारण से उन पर परिवारवाद का आरोप है।
पूर्णिया से बीमा को राजद ने बनाया कैंडिडेट

बीमा भारती को राजद ने पूर्णिया से कैंडिडेट बनाया है। चुनाव से ठीक पहले बीमा जेडीयू छोड़ आरजेडी में शामिल हुई हैं। बीमा भारती रुपौली से 5 बार से विधायक रही हैं। बीमा बाहुबली अवधेश मंडल की पत्नी हैं। वह दो बार नीतीश सरकार में मंत्री भी रही हैं।
शांभवी को एलजेपी ने बनाया कैंडिडेट

नीतीश कुमार के करीबी और मंत्री अशोक चौधरी की बेटी शांभवी चौधरी पहली बार चुनाव मैदान में हैं। एलजेपी (आर) ने उन्हें समस्तीपुर से कैंडिडेट बनाया है। शांभवी की शादी बिहार के चर्चित रिटायर्ड आईपीएस किशोर कुणाल के बेटे सायण कुणाल से हुई है। शांभवी हाल में राजनीति में आईं। पहली बार किसी राजनीतिक पार्टी की सदस्य बनते ही उन्हें लोकसभा का टिकट मिल गया।
वैशाली से वीणा पर एलजेपी का भरोसा

वैशाली से वर्तमान सांसद वीणा देवी को एलजेपी (आर) से लोकसभा चुनाव में उतारा गया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में लोजपा ने वीणा देवी पर भरोसा जताया था। उन्होंने वैशाली सीट पर तब राजद के दिग्गज नेता रघुवंश प्रसाद सिंह को दो लाख से अधिक वोटों से हराया था। लोक जनशक्ति पार्टी में फूट के बाद वीणा पारस गुट में शामिल हो गई थीं, लेकिन नवंबर 2023 में वह चिराग की पार्टी एलजेपी (आर) में शामिल हो गईं। ऐसा माना जा रहा है कि चिराग ने उनकी जीत की मार्जिन को देखकर फिर से उनपर भरोसा जताया है।
अर्चना को जमुई से बनाया कैंडिडेट

जमुई लोकसभा सीट से राजद ने अर्चना रविदास कैंडिडेट बनाया है। 38 साल की अर्चना ने साल 2006 में मुकेश यादव से प्रेम विवाह किया था। मुकेश यादव ने साल 2020 का विधानसभा चुनाव राजद के टिकट पर लड़ा था। अर्चना की सास रंजू देवी भी मुंगेर जिला परिषद की चेयरमैन रह चुकी हैं। अर्चना पोस्ट-ग्रेजुएट हैं। वह सोशल मीडिया पर रील्स बनाने के कारण कई बार विवादों में भी रही हैं। पहली बार चुनाव लड़ने वाली अर्चना ने खुद को राजद का सिपाही बताया हैं।







