पिछले दो चुनावों से बिहार की सियासत से बाहर रहे लालू प्रसाद यादव अचानक लोकसभा चुनाव में एक्टिव हो गए हैं। उनकी एंट्री इतनी दमदार हुई है कि वो एक बार फिर से विपक्ष की सियासत की धुरी बन गए हैं। महागठबंधन में सीट शेयरिंग हो या फिर कैंडिडेट सिलेक्शन, बिना उनकी सहमति के कुछ नहीं हो रहा है।
इस चुनाव में लालू प्रसाद की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि पहले वो अपने कैंडिडेट को सिंबल देते हैं। इसके बाद गठबंधन के सहयोगियों के साथ बैठकर सीट शेयरिंग करते हैं।
टिकट बंटवारे में वो 90 के दशक वाले फॉर्मूले को आजमा रहे हैं, जिसके दम पर उन्होंने बिहार में डेढ़ दशक तक राज किया। अगड़ा वर्सेज पिछड़ा के साथ-साथ बाहुबली, वफादार और पारिवारिक सदस्यों पर दांव लगा रहे हैं।
ऐसे में चर्चा इस बात की शुरू हो गई है कि जब राजद की राजनीति में तेजस्वी यादव अपनी मजबूत पैठ बना चुके हैं। लालू की राजनीतिक विरासत को वो संभाल चुके हैं। बिना लालू पिछले विधानसभा में वो राजद को राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनाकर अपनी रणनीति साबित कर चुके हैं तो आखिर क्यों लालू प्रसाद यादव को एक बार फिर से कमान अपने हाथ में लेनी पड़ी?
मिशन विधानसभा चुनाव में जुटे हैं लालू
पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं कि लालू प्रसाद यादव इस बात को अच्छे से जानते हैं कि इस लोकसभा चुनाव में उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। अपनी रणनीति के तहत वो एक भी सीट जीतने में कामयाब होते हैं, तो यह उनकी सफलता मानी जाएगी। अब उनका एकमात्र लक्ष्य तेजस्वी यादव को बिहार का सीएम बनाना है। यही कारण है कि वो चुनाव तो लोकसभा का लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी तैयारी विधानसभा चुनाव की है।
सीट से लेकर कैंडिडेट तक किया प्रयोग
लालू यादव इस लोकसभा चुनाव में पहली बार उन सीटों पर भी कैंडिडेट उतार रहे हैं, जहां राजद सालों से चुनाव नहीं लड़ी है या आज तक वहां से नहीं जीती है। इनमें औरंगाबाद, पूर्णिया, सुपौल, मुंगेर और वाल्मीकि नगर जैसी सीटें हैं। पूर्णिया और औरंगाबाद में राजद आज तक एक भी चुनाव नहीं जीती है। मुख्य रूप से कांग्रेस के कोटे की मानी जाने वाली इन सीटों को न केवल राजद ने अपने हिस्से में लिया है, बल्कि यहां कैंडिडेट के चयन में भी लालू प्रसाद यादव ने प्रयोग किया है।
कैंडिडेट सिलेक्शन में लालू के तीन प्रयोग देखिए
पहला: नवादा में पिछले तीन चुनाव से सवर्ण उम्मीदवार के खिलाफ राजद यादव जाति से अपना उम्मीदवार उतारती रही है। यहां राजबल्लभ यादव के रूप में राजद के पास एक मजबूत नेता भी है। जिनके परिवार को लालू प्रसाद यादव मैदान में उतारते रहे हैं, लेकिन इस बार उन्होंने यहां से श्रवण कुशवाहा को मैदान में उतारा है।
दूसरा: औरंगाबाद को राजपूत बाहुल क्षेत्र माना जाता है। इससे इस क्षेत्र को बिहार का चित्तौड़गढ़ कहा जाता है। 2004 से लगातार यहां से कांग्रेस के निखिल कुमार चुनाव लड़ते आ रहे हैं। इस बार भी वे यहां से प्रबल दावेदार थे, लेकिन उन्होंने न केवल ये सीट कांग्रेस से ली, बल्कि यहां उन्होंने पहली बार कुशवाहा वर्ग से अपना कैंडिडेट भी उतारा है।
तीसरा: कभी लालू यादव के वफादार रहे पप्पू यादव पूर्णिया से दो बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। हालांकि, पिछले तीन चुनाव से वो यहां से बाहर हैं, लेकिन एक बार फिर वे यहां से तैयारी कर रहे थे। यहां से चुनाव लड़ने के लिए पप्पू यादव ने अपनी पार्टी का विलय तक कर लिया। इसके बावजूद लालू यादव ने कांग्रेस के खाते से ये सीट अपने पाले में कर लिया। इसके साथ ही लालू प्रसाद ने जदयू से पाला बदल कर राजद में शामिल हुई रुपौली विधायक बीमा भारती को अपना उम्मीदवार बना दिया।
अगड़ा वर्सेज पिछड़ा कितना सफल, समझने की कोशिश
पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं कि लालू प्रसाद यादव ने मुख्य रूप से जिन इलाकों में प्रयोग किए है, उसमें मुंगेर, नवादा, औरंगाबाद, पूर्णिया और वाल्मीकि नगर शामिल हैं। ये सभी सीट सवर्ण बहुल माने जाते हैं। यहां इन्होंने पिछड़ी जाति के उम्मीदवार को उतार कर लड़ाई को अगड़ा बनाम पिछड़ा करने की कोशिश की है। अगर वो इसमें कामयाब हो जाते हैं तो 2025 विधानसभा चुनाव में सही कैंडिडेट सिलेक्शन में उन्हें सहूलियत होगी।
पुराने प्रत्याशियों पर भरोसा, 4 को किया रिपीट
जहानाबाद से सुरेंद्र यादव, गया से कुमार सर्वजीत, दरभंगा से ललित यादव, बक्सर से सुधाकर सिंह और बांका से जय प्रकाश यादव को पहले ही राउंड में लालू टिकट दे चुके हैं। इसके अलावा आलोक कुमार मेहता और चंद्रशेखर को भी टिकट मिलना लगभग तय माना जा रहा है। ये सभी पिछले कुछ चुनावों से लगातार चुनाव हारते आ रहे हैं, लेकिन लालू यादव ने इन्हें बेटिकट करने के बजाय इनका हौसला अफजाई किया है। वरिष्ठ पत्रकार अरुण कुमार पांडेय कहते हैं कि लालू अपने प्रत्याशियों का साथ किसी भी सूरत में नहीं छोड़ते हैं। प्रयोग के साथ उन्होंने ये मैसेज देने की भी कोशिश की है।
जिन बाहुबली को तेजस्वी ने नाकारा, लालू ने फिर आजमाया
बाहुबलियों के दम पर लालू यादव सालों तक राज करते रहे हैं। लालू प्रसाद यादव ने एक बार फिर से थोड़ा संशोधन कर उन्हें अपने सिंबल से मैदान में उतारा है। सीधा बाहुबलियों को टिकट देने के बजाए उनकी पत्नियों को आजमाया है। यही कारण है कि अशोक महतो को टिकट के लिए शादी करनी पड़ी। इसके अलावा वैशाली से मुन्ना शुक्ला की पत्नी को टिकट देने की चर्चा है। रामा सिंह भी लगातार टिकट के लिए राबड़ी आवास का चक्कर लगा रहे हैं।
आलोचना के बाद भी परिवारवाद से नहीं हटे
बीजेपी लालू प्रसाद यादव को जिन दो बड़े मुद्दों पर घेर रही है, उनमें भ्रष्टाचार के बाद परिवारवाद है। आलोचना के बाद भी लालू प्रसाद परिवार को आगे बढ़ाने से पीछे नहीं हटे। इस चुनाव में वे अपनी एक और बेटी रोहिणी आचार्य को डेब्यू करा रहे हैं। सारण से उनके चुनाव लड़ने की चर्चा है और वो तैयारी में जुट गई हैं। वहीं, मीसा दो चुनाव से लगातार पाटलिपुत्र से लड़ रही हैं और इस चुनाव में भी उनका नाम यहां से तय माना जा रहा है।
बिहार में महागठबंधन की पार्टियों के बीच तीन महीने से सीट शेयरिंग पर जारी माथापच्ची को तीन मिनट में जाहिर कर दिया गया। इस बार बिहार की 26 सीटों पर राजद, 9 पर कांग्रेस, 3 पर भाकपा माले, जबकि सीपीआई और सीपीएम एक-एक सीटों पर चुनाव लड़ेगी। कांग्रेस के पास 2019 में भी 9 सीटें थीं और अब भी, लेकिन राजद के पास 19 सीटें थीं जो अब बढ़कर 26 हो गई हैं। इसका मैसेज साफ है कि महागठबंधन में लालू यादव ही बॉस हैं।







