उत्तर भारत सहित पूरे देश में भीषण गर्मी का कहर जारी है। देश के कई शहरों में तापमान रिकार्ड स्तर पर पहुंच चुका है। बढता तापमान अपने ही रिकार्डतोड अपनी अवधारणा को बदलने में लगा है। इस वर्ष मार्च में गर्मी के मौसम की शुरुआत के बाद से भारत के बडे हिस्से में गर्मी की स्थिति गंभीर होती जा रही है। उत्तर भारत सहित गुजरात‚ महाराष्ट्र‚ आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कुछ क्षेत्रों में गर्मी‚ लू एवं हीटवेव कहर बरपा रही है। पिछले कुछ दिनों में रूप से तीन राज्यों–उत्तर प्रदेश‚ बिहार और ओडिशा में लगभग १५० से अधिक मौतें हो चुकी हैं। अल्पकालिक वसंत ऋतु भी अब गर्मी में ही परिवर्तित हो गई है। मार्च का महीना १२२ वर्षों में सबसे गर्म रहा है। प्रति वर्ष पहाडी क्षेत्र में शीत लहर के दिनों की संख्या में कमी और अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या बढकर १२० हो गई है।
भीषण गर्मी के लिए भले ही हम ग्लोबल वार्मिंग को जिम्मेदार मानते रहे परंतु सच्चाई यह है कि कंक्रीटीकरण‚ वनों की कटाई‚ भूस्खलन‚ औद्योगिक गतिविधियां‚ जीवाश्म इधन आदि के बेतहाशा प्रयोग के प्रति हम कभी भी गंभीर नहीं रहे। आर्थिक लालच से प्रेरित मानवीय गतिविधियों ने धरती के सामान्य तापमान में १.१ डिग्री सेल्सियस की वृद्धि कर दी है जिसका प्रभाव न केवल भारत‚ बल्कि दुनिया भर में महसूस किया जा रहा है। भीषण गर्मी से जंगलों में लगने वाली आग एवं पिघलते ग्लेशियर इस समस्या को और अधिक गंभीर बना रहे हैं।
भीषण गर्मी मानव स्वास्थ्य‚ बिजली‚ पानी‚ खाद्य उत्पादन आदि समस्याओं को बढा रही है। निर्माण एवं अन्य क्षेत्रों में कार्य करने वाले श्रमिकों एवं कृषि में संलग्न आबादी को घंटों गर्मी के संपर्क में रहना पडता है‚ जिससे इनकी उत्पादकता घटकर आधी रह जाती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार उच्च तापमान के कारण २०२१ में वैश्विक स्तर पर ४७० बिलियन श्रम घंटों की हानि हुई थी। मानव की इच्छाओं और चाहतों का अंतहीन सिलसिला आज मानव के अस्तित्व के लिए ही संकट खडा कर रहा हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन भीषण गर्मी को वैश्विक स्वास्थ्य खतरे के रूप में परिभाषित करता है। द लैंसेट में प्रकाशित २०२१ की एक रिपोर्ट के अनुसार‚ भीषण गर्मी लोगों के स्वास्थ्य को समान रूप से प्रभावित नहीं करती। सबसे अधिक प्रभाव गरीब‚ महिलाओं‚ बच्चों‚ बुजुर्गों‚ पहले से अस्वस्थ लोगों पडता है‚ जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है। भीषण गर्मी से अनेक प्रकार के बुखार‚ दिल की बीमारियां‚ अस्थमा एलर्जी‚ ब्रोंकाइटिस‚ एक्जिमा जैसी समस्याएं बढ जाती हैं। धूल और वायु प्रदूषण की बढोतरी और जल संबंधी संक्रामक बीमारियों का प्रसार बढने लगता है। मच्छरों की आबादी में वृद्धि से मलेरिया‚ डेंगू और अन्य कीट जनित संक्रमणों का खतरा बढ जाता है।
गरीब और झुग्गियों में रहने वालों के लिए हालात सबसे मुश्किल वाले होते हैं क्योंकि न तो उनके पास बिजली की सही व्यवस्था होती है‚ और न ही पानी की। कम साफ सफाई होने के कारण बीमारियों के संक्रमण से मृत्यु दर का जोखिम भी बढ जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण प्रति वर्ष कम से कम १५०‚००० मौत होती हैं‚ यह संख्या २०३० तक दोगुनी होने की उम्मीद है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत है कि अधिक तनाव में जी रहे मानव के मानसिक स्वास्थ्य पर भी तापमान के बढने का प्रभाव पडता है। धरती के बढते तापमान को नियंत्रित करने के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। इसके लिए आवश्यक अल्पकालिक उपायों और वनीकरण जैसे दीर्घकालिक उपायों पर एक साथ काम कर ग्रीनहाउस गैसों जैसे–कार्बन डाइअक्साइड‚ मीथेन‚ नाइट्रस ऑक्साइड और फ्लोरोकार्बन गैसों के उत्सर्जन को कम करना होगा। नवीनीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को महत्व देना होगा। जलवायु–स्मार्ट कृषि तकनीकों को प्रचारित करना होगा। लोगों में ग्लोबल ऊष्णता के विषय में जागरूकता पैदा करनी होगी और सुरक्षित जीवनशैली अपनानी होगी। जलवायु परिवर्तन से संबधित पेरिस समझौते का लक्ष्य वैश्विक तापमान में होने वाली बढोतरी को १.५ डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना था परंतु इस दिशा में विश्व के देश बहुत गंभीर नही हैं।
स्वास्थ्य जोखिमों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाना होगा जिसमें सभी मंत्रालयों की सहभागिता के साथ–साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुडे लोगों‚ एनजीओ‚ नीति–निर्माताओं आदि को शामिल किया जाना चाहिए। संक्रामक रोगों के संबंध में जानकारियों को आम आदमी तक पहुंच बनाने के लिए नवीन तकनीकी एवं डिजिटल प्लेटफार्म के प्रयोग को बढावा दिया जाना चाहिए। मानवीय और तकनीकी के सम्मिलित प्रयासों द्वारा नई निगरानी विधियों और विश्लेषणात्मक तरीकों से स्वास्थ्य के जोखिम को कम किया जा सकता है जिससे भीषण गर्मी से प्रभावित आम आदमी के स्वास्थ्य पर पडने वाले नकारात्मक प्रभावों को प्राथमिक स्तर पर सुलझाना जा सके। इस दिशा में किए गए प्रभावी प्रयासों के परिणामस्वरूप इलाज योग्य बीमारियों से पीडित लोगों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि नहीं होगी। तापमान बढोतरी से स्वास्थ्य के अन्य क्षेत्रों जैसे– आंतरिक चिकित्सा‚ बाल चिकित्सा‚ त्वचा चिकित्सा‚ मनोचिकित्सा आदि पर पडने वाले प्रभावों पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। भीषण गर्मी से उत्पन्न होने वाले स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए सरकार को ही नहीं‚ बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को समस्या के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय देना होगा। दीर्घकालिक आर्थिक विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए रणनीतिक प्रयासों के साथ–साथ देश की उत्पादकता में होने वाले नुकसान से बचाने के प्रयास करने होंगे। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे में सुधार के साथ–साथ कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने पर फोकस करना होगा। इले्ट्रिरक वाहनों के लिए बैटरियों की लागत को कम करने की दिशा में प्रभावी प्रयास किए जाने चाहिए। हमें इस बात पर भी विचार करना होगा कि यदि आज प्रकृति हमसे नाराज है तो इसका एकमात्र उपाय यही है कि हम वापस प्रकृति की ओर लौटें।
भीषण गर्मी से उत्पन्न होने वाले स्वास्थ्य संकट से निपटने के लिए सरकार को ही नहीं‚ बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को समस्या के प्रति संवेदनशीलता का परिचय देना होगा। स्वास्थ्य सेवाओं और बुनियादी ढांचे में सुधार के साथ–साथ कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने पर फोकस करना होगा। इस बात पर भी विचार करना होगा कि यदि आज प्रकृति हमसे नाराज है तो इसका एकमात्र उपाय…






