बिहार शुरू से ही क्रांति और क्रांतिकारियों की भूमि रही है। देश को दशा और दिशा देने में बिहार पहले भी सबसे आगे रहा है। चाहे लोकतंत्र की प्रतिस्थापना की बात हो‚ या फिर उसकी रक्षा की। वैशाली का गणतंत्र और जेपी का क्रांति इसके उदाहरण हैं।
२३ जून‚ २०२३ भी भारत के इतिहास में याद किया जायेगा‚ क्योंकि इसी दिन भाजपा के बढ़ते रथ को रोकने के लिए बिहार में देश के प्रमुख गैर भाजपा राजनीतिक दलों का जुटान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई में उनके सरकारी आवास पर हुआ। बैठक में देश की १५ पार्टियों के २७ नेताओं ने शिरकत की। बैठक में शामिल होने वाले नेताओं में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके के नेता एमके स्टालिन‚ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी की नेता ममता बनर्जी‚ उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी‚ दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप नेता अरविंद केजरीवाल‚ पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान‚ राघव चeा‚ संजय सिंह‚ लेफ्ट से डी राजा‚ दीपंकर भ^ाचार्य‚ सीताराम येचुरी और पीडीपी की महबूबा मुफ्ती। कांग्रेस से मल्लिकार्जुन खडगे और राहुल गांधी‚ एनसीपी से शरद पवार‚ सुप्रिया सुले‚ जम्मू–कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला‚ सपा के अखिलेश यादव‚ शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के उद्धव ठाकरे‚ आदित्य ठाकरे‚ संजय राउत‚ जेएमएम के हेमंत सोरेन‚ जदयू से नीतीश कुमार‚ संजय झा‚ ललन सिंह और राजद के तेजस्वी यादव और लालू यादव मौजूद थे। इस बैठक का परिणाम आगे जो भी हो‚ लेकिन एक बात तो तय है कि नीतीश कुमार ने भाजपा के बढ़ते कदम को रोकने के लिए जमीन तैयार कर दी है। उन्होंने एक–दूसरे के धूर विरोधी दलों को एक मंच पर लाकर एक साथ बैठा ही नहीं दिया‚ बल्कि एक–दूसरे के बीच सार्थक संवाद भी कायम करवा दिया। अपने गिले– शिकवे दूर कर एक साथ भाजपा के खिलाफ २०२४ का लोकसभा चुनाव लड़़ने पर सभी दलों के नेता सहमत भी हो गये। कहा जा रहा था टीएमसी‚ लेफ्ट और कांग्रेस एक साथ नहीं आ सकती‚ लेकिन नीतीश ने इस मिथक को भी तोड़़ दिया। विपक्षी दलों की अगली बैठक शिमला में होगी‚ जहां आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की जायेगी।
वहीं बैठक में केंद्र सरकार द्वारा दिल्ली पर लाये गये अध्यादेश के खिलाफ ‘आप’ के संयोजक व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का समर्थन करने का ऐलान किया गया‚ जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर से धारा ३७० हटाने के मुद्े पर तथा अरविंद केजरीवाल के केंद्र सरकार के समर्थन को लेकर उन्हें घेरा भी। ममता बनर्जी‚ राहुल गांधी‚ मल्लिकार्जुन खड़़गे‚ शरद पवार‚ उद्धव ठाक रे‚ एमके स्टालिन‚ अन्य पार्टियां सहित लेफ्ट पार्टियों के नेताओं ने भी अपने आपसी मतभेद और स्वार्थ को तिलांजलि देकर भाजपा के खिलाफ एक होकर लड़़ने की बात कही। वैसे पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी आवास पर हुई विपक्षी दलों की बैठक का निहितार्थ जो भी हो‚ लेकिन बैठक में शामिल कई पार्टियों के आपसी स्वार्थ और मंसूबे एक दूसरे के आड़े़ आ सकते हैं। ममता जहां पश्चिम बंगाल से लेकर गोवा और उत्तर–पूर्वी राज्यों में पार्टी का विस्तार चाहती हैं‚ वहीं दिल्ली और पंजाब के बाद अरविंद केजरीवाल गुजरात‚ मध्य प्रदेश और राजस्थान में पार्टी को आगे करना चाहते हैं। इस सभी जगहों पर कांग्रेस का इन दलों और इनके नेताओं से टकराव हो सकता है। हालांकि पटना में हुई बैठक में सभी दलों के बीच इस बात पर भी सहमती बनी है कि लोकसभा चुनाव के दौरान प्रत्येक सीट पर भाजपा के खिलाफ विपक्ष का एक ही प्रत्याशी हो‚ विपक्षी दलों के लिए एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाया जाए‚ इसी के तहत सीटों का बंटवारा भी हो। यदि सबकुछ सही और ठीक चला दलों का स्वार्थ नहीं टकराया तो आगे आने वाले चुनाव में भाजपा को कड़़ी टक्कर मिलेगी।







