देश में एक बार फिर यूनीफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा शुरू हो गई है। चूंकि लॉ कमीशन ने आम लोगों से अगले तीस दिन में यूनीफॉर्म सिविल कोड को देश में लागू करने पर राय मांगी है, जिसके आधार पर लॉ कमीशन अपनी रिपोर्ट तैयार करके सरकार को देगा। जैसे ही लॉ कमीशन के इस कदम की जानकारी आई तो प्रतिक्रियाएं आनी शुरु हो गई।
सबसे पहले मौलानाओं ने, मुस्लिम नेताओं ने इस पर एतराज जताया। सबसे तीखी प्रतिक्रिया जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी की आई। मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि देश में किसी भी सरकार ने मुस्लिम पर्सनल लॉ को नहीं छेड़ा, लेकिन मौजूदा सरकार जानबूझकर ये कर रही है। मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि कुछ लोग मुसलमानों के हौसले को तोड़ना चाहते हैं, मुसलमानों के साथ दुश्मनी की मिसाल पेश करना चाहते हैं, देश इसे कभी भूलेगा नहीं।
दारुल उलूम फिरंगी महल के मौलाना सुफियान निजामी ने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड की कोई ज़रूरत नहीं है। समाजवादी पार्टी के MP शफीकुर रहमान बर्क ने कहा कि लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं, कई राज्यों के चुनाव करीब हैं, इसलिए बीजेपी इस तरह के मुद्दे उठा रही है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इल्जाम लगाया कि मोदी सरकार अपनी नाकामियों से ध्यान भटकाना चाहती है, ध्रुवीकरण करना चाहती है, इसलिए एक बार फिर यूनिफॉर्म सिविल कोड के मुद्दे को फिर से हवा दी जा रही है।
असल में नेताओं की परेशानी लॉ कमीशन के कदम से नहीं है। उनकी परेशानी ये है कि बीजेपी के एजेंडा में तीन बड़े मुद्दे थे
(1) अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण,
(2) जम्मू कश्मीर से आर्टिकल 370 को खत्म करना और
(3) देश मे कॉमन सिविल कोड लागू करना।
नरेन्द्र मोदी की सरकार राम मंदिर और आर्टिकिल 370 का वादा पूरा कर चुकी है। सिर्फ कॉमन सिविल कोड का मसला बचा है। चूंकि अगले साल चुनाव होना है इसीलिए विपक्ष को, मुस्लिम संगठनों को, मौलानाओं को लग रहा है कि सरकार अगले कुछ महीनों में कॉमन सिविल कोड लागू करगी और बीजेपी इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाएगी।
अगर नरेन्द्र मोदी की सरकार ने कॉमन सिविल कोड बिल चुनाव पहले पार्लिय़ामेंट में पेश कर दिया तो सबसे ज्यादा परेशानी कांग्रेस नेताओं को होगी, जो अभी अभी नए हिंदू हितैषी बने हैं, जिन्होंने मध्य प्रदेश में राम और हनुमान के नाम का जाप शुरू किया है। कांग्रेस के अलावा NCP, JD-U, RJD और उद्धव ठाकरे की शिवसेना जैसे तमाम दलों के सामने भी बड़ा कन्फ्यूजन होगा, जो बिल का विरोध करेगा उस पर हिन्दू विरोधी होने का टैग लगेगा, और अगर वो सपोर्ट में आए तो ओवैसी जैसे नेता कहेंगे कि सिर्फ वही मुसलमानों के हितों की बात करते हैं, वो कहेंगे कि कांग्रेस और दूसरे दल तो मुसलमानों के खिलाफ मोदी के साथ खड़े हैं, लेकिन अगर सरकार ने वाकई में यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू कर दिया तो ये बहुत बड़ा राजनीतिक कदम होगा और इसीलिए जैसे ही लॉ कमीशन ने कॉमन सिविल कोड पर पब्लिक की राय मांगी तो नेताओं ने शोर मचाना शुरू कर दिया है।
इस वक्त देश में गोवा अकेला ऐसा राज्य है जहां यूनीफॉर्म सिविल कोड लागू है, और उत्तराखंड ने कॉमन सिविल कोड लागू करने का एलान किया है। इसके लिए एक्सपर्ट्स की कमेटी इस महीने के अंत तक अपनी रिपोर्ट सरकार को दे देगी। इसके बाद पुष्कर धामी की सरकार यूनीफॉर्म सिविल कोड बिल लेकर आएगी।
बीजेपी के चुनावी वादों में से एक है समान नागरिक संहिता को लागू करना
समान नागरिक संहिता या यूनिफॉर्म सिविल कोड इकलौता कानून होगा जिसमें किसी धर्म, लिंग और लैंगिकता की परवाह किए बगैर फैसला लिया जाएगा. देश का संविधान कहता है कि राष्ट्र को अपने नागरिकों को ऐसे कानून मुहैया कराने की कोशिशें करनी चाहिए. समान नागरिक संहिता या यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) की मांग देश की आजादी के बाद से चलती रही है.
बीजेपी सरकार इस मुद्दे को वापस उठा रही है. बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश UCC पर चर्चा कर रहे हैं. राम मंदिर का निर्माण करना, कश्मीर से विशेष दर्जे को खत्म करने के अलावा समान नागरिक संहिता को लागू करना बीजेपी के चुनावी वादों में से एक रहा है .
बीजेपी संसद के शीतकालीन सत्र में कॉमन सिविल कोड से जुड़ा एक प्राइवेट बिल पेश कर चुकी है. वहीं, गुजरात से लेकर हिमाचल में बीजेपी के सीएम इसकी पहले ही वकालत कर चुके हैं.
साल 2022 के दिसंबर में उत्तराखंड में बीजेपी सरकार ने यूसीसी के कार्यान्वयन की जांच के लिए एक समिति का गठन किया था. अब 2024 के लोकसभा चुनावों के नजदीक आते ही फिर से इस पर चर्चा तेज हो गयी है.
अब सवाल उठता है कि क्या समान नागरिक कानून से लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी की राह आसान होगी.
राजनीती के विश्लेषक मानते है की यह कहना कि बीजेपी भावनाओं को भुनाने वाली पार्टी है, कोई अतिशयोक्ति नहीं. मंदिर, हिन्दुत्व, गाय, गंगा जैसे मुद्दों के सहारे ही कभी लोकसभा में दो सीटों पर सिमटी बीजेपी आज 303 सीटों तक पहुंची है. इसमें उसके आजमाए इन्हीं नुस्खों की भूमिका है.’ समान नागरिक संहिता का मुद्दा कोई नया नहीं है. आज अपने को समाजवादी कुनबे का अहम किरदार समझने वाले नेता भले इसका विरोध करें, पर महान समाजवादी राम मनोहर लोहिया ने दशकों पहले कहा था कि देश के लिए यह जरूरी है. किसी खास कौम को उसके परंपरागत रीति-रिवाज में बदलाव कभी पसंद नहीं आएगा. लेकिन जब देश की बात होगी तो इसे स्वीकारना ही पड़ेगा. यकीनन इस पर भारी विवाद या विरोध से इनकार नहीं किया जा सकता. ‘बीजेपी यही चाहेगी कि मुस्लिम इसके विरोध में खड़े हों और इससे हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण का अवसर मिल जाए, पर इसमें खतरे भी हैं. अब तक का अनुभव तो यही कहता है कि मुस्लिम आसानी से पोलराइज हो जाते हैं, पर हिन्दू नहीं. अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी को यह भारी भी पड़ सकता है.
कुछ मानते है की आजादी के बाद से लगातार सरकारें इन धार्मिक और प्रथागत कानूनों में संशोधन करने से डरती रही हैं. सरकारों को ये डर रहा है कि इससे हिंदू बहुसंख्यकों के साथ-साथ अल्पसंख्यक ईसाइयों और मुसलमान मतदाता नाराज हो जाएंगे. बीजेपी इस प्रस्ताव को 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले लागू करना चाह रही है. UCC की मांग उन तीन विवादास्पद मुद्दों में से आखिरी है, जिन्हें बीजेपी 1980 के दशक के मध्य से लगातार उठा रही है. अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण और जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने की मांगों के साथ समान नागरिक संहिता भी बीजेपी की रणनीति में था.
इस प्रस्ताव को आलोचक देश में बढ़ती मुस्लिम विरोधी भावना के रूप में देख रहे हैं. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यूसीसी को बीजेपी अपने हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने की योजना का एक हिस्सा बना रही है. बीजेपी का हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडा कई पिछले चुनावों में मददगार साबित हुआ है, चाहे वो राम मंदिर हो या आर्टिकल 370 को खत्म करना हो. चुनाव से पहले बीजेपी इस कानून की बात करके विपक्ष को मुद्दों से भटका रही है. बीजेपी की स्ट्रैटजी ‘दिखाओ कुछ और करो कुछ’ की है. ये कहना भी गलत नहीं होगा कि बीजेपी अभी अपना पूरा ध्यान विपक्ष को बेवकूफ बनाने में लगा रही है.
समान नागरिक संहिता पर कोर्ट का रुख
2014 और 2019 के अलावा समान नागरिक संहिता 1998 के चुनावों के लिए बीजेपी के घोषणापत्र का हिस्सा रही है. याद दिला दें कि नवंबर 2019 में नारायण लाल पंचारिया ने संसद में एक विधेयक पेश किया था, लेकिन विपक्ष के विरोध के कारण इसे वापस ले लिया गया. किरोड़ी लाल मीणा मार्च 2020 में फिर से बिल लेकर आए, लेकिन इसे संसद में पेश नहीं किया गया. विवाह, तलाक, गोद लेने और उत्तराधिकार से संबंधित कानूनों में समानता की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिकाएं भी आई हैं.
2018 के परामर्श पत्र में ये स्वीकार किया गया था कि भारत में विभिन्न परिवार कानून व्यवस्थाओं के भीतर कुछ प्रथाएं महिलाओं के खिलाफ भेदभाव करती हैं. उन्हें संसोधित करने की जरूरत है. 1985 में शाह बानो मामले में तलाक में एक मुस्लिम महिला के अधिकारों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “संसद को एक समान नागरिक संहिता की रूपरेखा को रेखांकित करना चाहिए. यही एकमात्र जरिया है जिससे कानून के समक्ष राष्ट्रीय सद्भाव और समानता की सुविधा प्रदान की जा सकेगी.
2015 में एबीसी बनाम दिल्ली राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ईसाई महिलाओं को ईसाई कानून के तहत अपने बच्चों के “प्राकृतिक अभिभावकों के रूप में मान्यता नहीं दी गई है. वहीं हिंदू अविवाहित महिलाएं अपने बच्चे की “प्राकृतिक अभिभावक” मानी जाती हैं. दोनों का उदाहरण देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था ‘ इसलिए ही समान नागरिक संहिता एक ऐसी संवैधानिक अपेक्षा है, जिस पर ध्यान दिया जाना चाहिए.
यूसीसी क्या है, समझिए
शादी, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के मामलों में भारत में अलग-अलग समुदायों में उनके धर्म, आस्था और विश्वास के आधार पर अलग-अलग कानून हैं. यूसीसी का मतलब प्रभावी रूप से विवाह, तलाक, गोद लेने, उत्तराधिकार, विरासत वगैरह से संबंधित कानूनों को सुव्यवस्थित करना होगा.
कानून को लेकर हो रहे विरोध की वजह क्या?
भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का विरोध करने वालों का तर्क है कि यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता और सांप्रदायिक सद्भाव के सिद्धांत का उल्लंघन करेगा. पर्सनल लॉ धार्मिक पहचान का एक अनिवार्य पहलू है. यूसीसी कानून ला कर सरकार सभी नागरिकों पर एक तरह का कानून थोपने की कोशिश कर रही है, जो भारतीय समाज की विविधता और बहुलवाद को कमजोर करेगा.
अब इस कानून पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को बड़ी आपत्ति जता रहा है.
कानून को अल्पसंख्यक विरोधी” कहा बताया जा रहा है.
यह निर्धारित किया जाना बाकी है कि क्या यूसीसी “मानवाधिकारों को प्रभावित करता है या नहीं”
लॉ कमीशन ने क्या कहा
भारत के 22वें विधि आयोग (एलसीआई) ने बुधवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) पर जनता और धार्मिक संगठनों की राय मांगी. आयोग द्वारा जारी एक सार्वजनिक नोटिस अनुसार, ‘बड़े पैमाने पर जनता’ और ‘मान्यता प्राप्त धार्मिक संगठन’ 30 दिनों के भीतर समान नागरिक संहिता पर अपने विचार भेज सकते हैं.
विधि आयोग के मुताबिक -सभी धर्मों के मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता में संतुलन बनाया जाए.
पारिवारिक मसलों से जुड़े पर्सनल लॉ को संसद कोडिफाई करने (लिखित रूप देने) पर विचार करें.
सभी समुदायों में समानता लाने से पहले एक समुदाय के भीतर स्त्री-पुरुष के अधिकारों में समानता लाने की कोशिश हो.
इससे करीब आठ महीने पहले केंद्र ने उच्चतम न्यायालय को बताया था कि संविधान में समान नागरिक संहिता का जिक्र है. सरकार ने कहा था कि अलग-अलग धर्मों और संप्रदायों के लोगों द्वारा विभिन्न संपत्ति और वैवाहिक कानूनों का पालन करना ‘राष्ट्र की एकता का अपमान’ है.
बीजेपी शासित राज्यों में यूनिफॉर्म सिविल कोड
उत्तराखंड
सीएम पुष्कर सिंह धामी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में राज्य में यूसीसी बनाने और उसे लागू करने का एलान किया था.
सरकार बनने के बाद अपनी पहली कैबिनेट बैठक में उन्होंने समान नागरिक संहिता के लिए विशेषज्ञ समिति के गठन का फैसला किया.
सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में गठित विशेषज्ञ समिति बनाई गई.
गुजरात
गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार ने समान नागरिक संहिता के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने का फैसला किया.
समिति का गठन हाई कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस की अध्यक्षता में किया जाएगा.
हिमाचल प्रदेश
बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने चुनावी घोषणा पत्र में समान नागरिक संहिता का वादा दिया.
चुनाव जीतने के बाद हिमाचल में यूनिफॉर्मसिविल कोड लागू करेंगे
किन किन देशों में लागू है यूनिफॉर्म सिविल कोड
पाकिस्तान
बांग्लादेश
मलेशिया
तुर्की
इंडोनेशिया
सूडान
मिश्र
फ्रांस
यूनाइटेड किंगडम
जापान
चीन
अमेरिका
ऑस्ट्रेलिया
जर्मनी
सिंगापुर







