दिल्ली में जंतर-मंतर पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और नीट समेत केंद्रीय परीक्षाओं में गड़बड़ी ठीक करने की मांग करते हुए बैठे समूह कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के साथ लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने जब अपनी भूख हड़ताल शुरू की तो उनके इस बयान से यही लगा कि वे कुछ आगे का सोच रहे हैं कि शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तो महज शुरुआत है। फिर उनसे खास तरह के एक्टिविस्ट और दलीय नेता भी मिलने आने लगे।
सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर पर चल रहे अभियान को राजनीतिक रंग देना शुरू किया। उन्हें अस्पताल ले जाए जाने के बाद सोमवार को उस समूह ने संसद की ओर मार्च किया। उसमें शामिल लोगों द्वारा पथराव में असंख्य पुलिस वाले घायल हो गए। यह सब संदेह पैदा करता है कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग के बहाने एक राजनीतिक आंदोलन चलाने की जुगत हो रही है यानी सत्ता परिवर्तन की कोशिश।
अपने आप में राजनीतिक आंदोलन करने या सत्ता बदलना चाहने में कुछ गलत नहीं है, किंतु शिक्षा क्षेत्र और छात्रों को इसका औजार बनाने में दोहरी गलती है। इससे शिक्षा जैसा गंभीर विषय दलीय राजनीति की भेंट चढ़ जाता है। जिस विषय को राजनीति से दूर रखकर सुधारना, संभालना आवश्यक है, वह न केवल उपेक्षित होकर यथावत रह जाता है, बल्कि और बिगड़ने की दिशा में चला जाता है।
वर्ष 1974 से ही अनेक बार देखा जा चुका है कि छात्रों, युवाओं को दलीय राजनीति के लिए इस्तेमाल किया गया। यदि सोनम वांगचुक और उनके साथियों का ऐसा इरादा नहीं था तो उन्हें शैक्षिक मुद्दे पर केंद्रित रहकर पूरा ध्यान उसके विभिन्न पहलुओं पर देना चाहिए था। उसे कड़ाई से दलीय राजनीति से अलग रखते हुए, शैक्षिक क्षेत्र के विशेषज्ञों से विचार करके बेहतरी की कोई रूपरेखा तैयार करनी चाहिए थी।
इससे नीति-निर्माताओं को सहायता भी मिलती। इसके बदले केवल शिक्षा मंत्री का इस्तीफा चाहना कई सवाल खड़े करता है। किसी सच्चे प्रयत्न की सार्थकता तभी होगी, जब शैक्षिक संस्थानों की पवित्रता, शैक्षिक सामग्री की गुणवत्ता, प्रतिभाओं को समुचित प्रोत्साहन, योग्य शिक्षकों को स्थान देना तथा गड़बड़ी के सभी बिंदुओं को दुरुस्त करने पर ध्यान दिया जाए।
इसके बदले एक इस्तीफे की जिद, तरह-तरह के लोगों का जमावड़ा, ऊल-जुलूल उत्तेजक बातें और राजनीतिक आंदोलन चलाने का खुला-छिपा संकेत, यह सब जाने-अनजाने भोले छात्रों-युवाओं को इस्तेमाल करने की मंशा दिखाता है। इसमें शिक्षा की भलाई नहीं है। इस पर गुरुदेव टैगोर ने गांधीजी तक को भी टोका था।
यदि शैक्षिक क्षेत्र को दुरुस्त करना एवं गुणवत्तापूर्ण बनाना है तो उसकी पहली शर्त उसे दलीय राजनीति से दूर रखना है, अन्यथा दलीय राजनीति और सत्ता परिवर्तन की चाह पूरा ध्यान दूसरी चीजों पर लगाएगी। मूल मुद्दा हाशिए पर चला जाएगा। यह पहले भी कई बार, कई स्थानों पर देश-विदेश में हो चुका है। यहां जेपी आंदोलन और अन्ना आंदोलन, दोनों का इतिहास यह साफ-साफ दिखाता है।
दोनों ने सामाजिक मुद्दे उठाए, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र और युवाओं को जोड़ा गया, जिनमें आदर्श की भावना अधिक होती है, किंतु दोनों बार केवल सत्ता की लालसा रखने वाले नेताओं ने आंदोलन का इस्तेमाल किया।
जेपी और अन्ना की पीठ पर चढ़कर मतलबी नेता आगे बढ़ गए। खुद जेपी और अन्ना हजारे भी जल्द ही पीछे छूट गए। उनसे भी पहले वह मुद्दा छूटकर कहीं किनारे हो गया। सत्ता पर नजर रखने वाले तत्वों ने उनका उपयोग कर अपनी मनचाही मुराद पूरी की। जबकि मूल मुद्दा जहां का तहां रह गया।
अन्ना हजारे ने 15 साल पहले इसी जंतर-मंतर पर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो आंदोलन शुरू किया था, उसका क्या हुआ?
क्या आज कोई कह सकता है कि तबसे अब तक भ्रष्टाचार में कुछ अंतर पड़ा? अन्ना आंदोलन इसलिए निष्फल साबित हुआ, क्योंकि किसी मुद्दे की विशिष्टता को गंभीरता से परखने, उसके समाधान की यथार्थ रूपरेखा बनाने आदि की चिंता के बदले केवल प्रचार, हल्ला, आवेश आदि पर ध्यान रहा, जिसका सधे हुए नेताओं ने इस्तेमाल कर लिया।
मुद्दा और अन्ना, दोनों पृष्ठभूमि में चले गए। क्या वांगचुक और उनके साथी इस निकट इतिहास से अनजान हैं? इसका उत्तर तो वही जानें, किंतु यह निश्चित है कि किसी भी सामाजिक-सांस्कृतिक विषय को दलबंदी से जोड़ना उसे बिगाड़ देना ही है। शिक्षा के साथ ऐसा होना और दुर्भाग्यपूर्ण होगा, क्योंकि इसमें हजारों भोले छात्रों के सरल विश्वास को चोट लगती है। फिर लगभग एक पूरी पीढ़ी निराशा में डूब जाती है, जब तक कि फिर अगली पीढ़ी आशा से खड़ी हो।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को ‘आरंभ’ बताकर राजनीतिक दलबंदी का संकेत देने के अलावा और कुछ नहीं। यदि सीजेपी को राजनीतिक दलबंदी करनी है तो शिक्षा को इसका औजार न बनाएं। यदि उसे सचमुच शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण और कदाचार रहित बनाने की चिंता है तो वैसे भड़काऊ समर्थकों को ‘नमस्कार’ कर लेना चाहिए, जो किसी न किसी बहाने केवल वर्तमान सरकार को अपदस्थ करना चाहते हैं।
जंतर-मंतर पर दूर-दूर से आए आदर्शवादी छात्रों, युवाओं के साथ ऐसे लोग भी थे, जो उत्तेजना फैलाने और पुलिस-प्रशासन से जानबूझकर टकराव पर आमादा थे। उत्तेजना और टकराव से प्रायः मुद्दा बदल जाने की आशंका रहती है। कुछ आंदोलनकारियों की चाह भी यह रहती है। वे केवल हेडलाइन बनाना और सरकार को डांवाडोल करना चाहते हैं। ऐसा उद्देश्य शिक्षा और छात्रों के हित से अलग है।
वस्तुत: वांगचुक और उनके साथियों ही नहीं, सभी जिम्मेदार नेताओं को यह समझना चाहिए कि शिक्षा का क्षेत्र गंभीर विषय है, जिससे सभी देशवासी निरपवाद रूप से प्रभावित होते हैं।
सत्ताधारी और विपक्ष, दोनों के विवेकशील नेताओं को शिक्षा को राष्ट्रीय विषय मान कर ही अपना व्यवहार रखना चाहिए, ताकि यह संकीर्ण स्वार्थों की चपेट से बचा रहे। अन्यथा यह देश के एक सबसे मूल्यवान स्रोत को ही दूषित करने जैसा है। इसके दुष्परिणाम सभी के लिए हानिकारक होंगे।







