देश के विपक्षी दलों को एकजुट करने में जुटे बिहार के सीएम नीतीश कुमार कामयाब होते हुए दिख रहे हैं। विपक्षी एकता की बैठक तीन बार टलने के बाद अब जगह और तारीख तय हो गई है। 23 जून को पटना में ये बैठक होगी। इसमें विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं का जुटान होगा।
लेकिन नीतीश कुमार की इस देशव्यापी कोशिश में राज्य के महागठबंधन में ही दरार पड़ती दिख रही है। बैठक से पहले ही बिहार में लोकसभा की सीटों पर घमासान मचने के आसार हैं। कभी नीतीश कुमार के साथ रहने की कसमें खाने वाले हम सुप्रीमो जीतन राम मांझी के बयान से लगातार इसके संकेत मिल रहे हैं।
पहले उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इस बार 5 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। इसके बाद अब उन्होंने ये बयान देकर राजनीतिक माहौल गर्म कर दिया है कि विपक्षी एकता की बैठक में उन्हें न्योता नहीं मिला है। दूसरी तरफ सरकार की दूसरी सहयोगी लेफ्ट भी 5 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पांच सीट हमारे लिए काफी कम हैं। हम सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। नीतीश कुमार अगर हमारी क्षमता के अनुसार सीटें देते हैं तो यह गठबंधन के लिए बहुत ही अच्छा होगा। अगर हमारी पार्टी को सम्मानजनक सीट नहीं मिलती है तो सभी जानते हैं कि हम जिधर रहेंगे, उधर जीतेंगे। -जीतन राम मांझी
नीतीश करेंगे समझौता या तेजस्वी करेंगे त्याग
बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। यहां अभी महागठबंधन में 7 दल शामिल हैं। लेफ्ट की दो पार्टियों को छोड़ दें तो 5 पार्टियां लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस तीनों बड़ी पार्टियां हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में जेडीयू जहां 17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। जबकि आरजेडी 19 सीटों पर लड़ी और कांग्रेस 9 सीटों पर। इस बार किसी भी सूरत में सीटों की ये संख्या नहीं रह सकती है। ये तय है कि नीतीश कुमार को विनिंग सीट से समझौता करना पड़ेगा या तेजस्वी यादव बड़ी लड़ाई के लिए त्याग कर नीतीश कुमार को आगे बढ़ाएंगे। हालांकि, अभी सीट बंटवारे पर किसी भी दल के नेता स्पष्ट बोलने से बच रहे हैं।
सीट बंटवारे के 3 फॉर्मूले को समझिए
1). लोकसभा में जेडीयू सबसे बड़ी पार्टी, इसलिए ज्यादा सीट के वे हकदार
महागठबंधन में नीतीश कुमार सबसे बड़ी पार्टी हैं। लोकसभा के हिसाब से अभी जेडीयू के पास सबसे ज्यादा 16 सीटें हैं। कांग्रेस के पास एक। इसके अलावा किन्हीं के पास एक भी सीट नहीं है। नीतीश कुमार विपक्षी एकता के चेहरा भी हैं। ऐसे में बिहार के सभी दल आपस में समझौता कर जेडीयू को सबसे ज्यादा सीट दें। इसके बाद बाकी बची सीटों में बंटवारा कर लें। हालांकि, इसके आसार कम हैं।
2). क्षेत्रीय दलों को तवज्जो मिले और पिछले बार नंबर-2 के आधार पर सीटों का बंटवारा हो
बंटवारे का एक आधार क्षेत्रीयता भी है। बिहार महागठबंधन में जेडीयू और राजद बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां हैं। ऐसे में उन्हें ज्यादा सीटें मिले। इसके बाद ये देखा जा सकता है कि पिछले चुनाव किस दल ने सबसे ज्यादा बीजेपी को चैलेंज दिया था और नंबर-2 पर रहेंगे। दोनों ही स्थिति में नीतीश कुमार को समझौता करना पड़ेगा।
3). विधानसभा में सीटों के आधार पर हो बंटवारा
अभी तक लोकसभा में सीटों का निर्धारण में विधानसभा में उपस्थिति को अहम माना जाता रहा है। 6 विधानसभा सीटों के बराबर एक लोकसभा सीट को माना जाता है। ऐसे में जेडीयू और आरजेडी को आपस में समझौता करना पड़ सकता है और दोनों बराबर सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। इस लिहाज से देखा जाए तो आरजेडी के कोटे में 14 और जेडीयू के कोटे में 8 सीटें बनती हैं। या फिर दोनों पार्टियों के सीटों को बराबर करेंगे तो 12-12 सीटों पर खुद लड़े। बाकी बची सीटें अन्य सहयोगियों को दिया जाए।
अभी से बयानबाजी केवल राजनीतिक सौदेबाजी, दबाव बनाने की कोशिश
बिहार में महागठबंधन के सभी दलों का लक्ष्य एक है। बीजेपी को सत्ता से बेदखल करना। ऐसे में एक साल पहले ही सीटों को लेकर बयानबाजी करना सिर्फ राजनीतिक सौदेबाजी है। सभी राजनीतिक दल चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा सीटों पर लड़ें, ताकि उनकी ताकत बढ़े। प्रवीण बागी कहते हैं कि महागठबंधन में समझौता एक कठिन विषय जरूर है, लेकिन एक बात ये भी है कि वहां लोकसभा के दावेदार कम हैं। यहां देखा ये जाएगा कि विधानसभा में किसको कितनी सीटें मिलेंगी।
वहीं, आरजेडी के मुख्य प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव का कहना है कि पॉलिटिकल पार्टियों के कार्यकर्ताओं और समर्थकों की अकांक्षा के अनुरूप अपनी मांग करते रहते हैं। ये कोई पहली बार नहीं है। हर घटक दल जो अलग-अलग दलों के साथ रहते हैं। उनकी अपनी मांग होती है। इसे गठबंधन में खींचतान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। महागठबंधन में न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत चीजें स्थापित होगी। जब बड़े लक्ष्य की तरफ आगे बढ़े हैं, तब सीट की संख्या मायने नहीं रखती है।
जेडीयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि नीतीश कुमार महागठबंधन में प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हैं। विपक्ष की आवाज हैं। इसकी धमक और असर देश के दूसरे राज्यों तक दिखाई पड़ रहा है। जेडीयू प्रवक्ता ने कहा कि जब 7 दलों की सरकार के मंत्रिपरिषद में कोई विवाद नहीं है तो सीटों का बंटवारा कोई समस्या नहीं होगी। महत्वपूर्ण लक्ष्य है कि क्षेत्रीय पार्टियों का वजूद बचेना है। सभी का समान उद्देश्य है, एक कॉमन लक्ष्य है कि नरेंद्र मोदी की सरकार को हटाना है। जेडीयू सीटों से समझौता कर लेगा। इस सवाल पर नीरज कुमार कहते हैं कि ये पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व तय करता है। भाजपा को केंद्र की सत्ता से हटाने के लिए जितना जतन करना होगा…नीतीश कुमार करेंगे।
भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल कहते हैं कि पिछली बार हम महागठबंधन का हिस्सा नहीं थे। राजद के साथ हमारा एक सीटों पर प्रतीकात्मक तालमेल था। आरा की सीट उन्होंने हमारे लिए छोड़ी थी और हमने उनके लिए पाटलिपुत्र की सीट छोड़ी थी। हम लोग चार सीटों पर चुनाव लड़े थे। सीवान, आरा, काराकाट और जहानाबाद। स्वाभाविक है कि कोई भी चाहेगा कि ज्यादा सीट हमको मिले। अभी तक सीटों को लेकर महागठबंधन के भीतर कोई बातचीत नहीं हुई है।
अब नीतीश के पाला-बदल से सीटों के समीकरण को समझिए…
2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 30 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इसमें 22 सीट जीतने में सफल रही थी। जबकि तब एनडीए में शामिल लोजपा 7 में 6 और रालोसपा 3 में 3 जीतने में कामयाब रही थी। यानी NDA 40 में 31 सीट जीतने में कामयाब रही थी। उस दौरान सबसे ज्यादा 38 सीटों पर जेडीयू ने चुनाव लड़ा था। इसमें मात्र दो सीट पर ही जीत मिली थी। कांग्रेस 12 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। उसे मात्र 2 सीटों पर जीत मिली थी। जबकि 27 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले राजद को मात्र 4 सीटों पर ही जीत हासिल हुई थी।
2019 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर जेडीयू एनडीए में शामिल हो गया था। जेडीयू और बीजेपी ने साथ चुनाव लड़ा था। लोजपा भी इसका हिस्सा थी। भाजपा और जेडीयू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इसमें बीजेपी 100 पर्सेंट 17 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। जबकी जेडीयू 16 सीट जीतने में कामयाब रही। वहीं, लोजपा भी अपने सभी 6 उम्मीदवारों को जीतानें में कामयाब रही थी।
वहीं, बात करें महागठबंधन की तो तब बिहार में महागठबंधन में 6 पार्टियां शामिल थीं। इसमें राजद ने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इनमें कांग्रेस-9, हम-3, वीआईपी-3 और रालोसपा-5 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। कांग्रेस के एक सीट छोड़कर सभी किसी भी दल का चुनाव में खाता तक नहीं खुला था।
विधानसभा चुनाव में जिसके साथ नीतीश, उसी ने बनाई सरकार
2015 में नीतीश-आरजेडी साथ आए, बीजेपी साफ हो गई
बात करें विधानसभा चुनाव की तो जिसके साथ नीतीश रहे विधानसभा में वही दल बहुमत में रही। 2015 के विधानसभा चुनाव में 20 साल के बाद पहली बार पहली बार नीतीश बीजेपी से अलग होकर आरजेडी से हाथ मिलाए थे।कांग्रेस भी महागबंधन का हिस्सा थी। महागठबंधन 178 सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही थी।
पार्टियों के प्रदर्शन की बात करें तो इस चुनाव में आरजेडी 101 सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसमें 71 सीटें जीतने में पार्टी कामयाब रही थी। वहीं जेडीयू 101 सीटों पर चुनाव लड़ी थी इसमें पार्टी को 80 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। जबकि कांग्रेस 41 में से 27 सीटें जीतने में कामयब रही थी। वहीं एनडीए की बात करें तो बीजेपी को 53 सीटों एलजेपी को 2 सीटें, हम को एक सीट और रालोसपा 2 सीट जीतने में कामयाब रही थी।
2020 में नीतीश फिर बीजेपी के साथ आए, एनडीए की सरकार बन गई
वहीं 2020 के विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार का गठबंधन एक बार फिर से बीजेपी के साथ हो गया था। उनके साथ हम और मुकेश सहनी की वीआईपी भी एनडीए का हिस्सा थी। बीजेपी 110 सीटों पर चुनाव लड़कर 74 सीटें जीती थी। वहीं जेडीयू 115 सीटों पर चुनाव लड़ीं थी इसमें 43 सीटें जीतने में ही कामयाब हुई थी। वहीं वीआईपी 11 में 4 और हम 7 में 4 जीतने में सफल रही थी।
वहीं इस चुनाव में पहली तेजस्वी यादव ने टिकट बंटवारे से लेकर सीटों के चयन तक का निर्णय लिए थे। ये पहला चुनाव था जब लालू यादव पूरी चुनाव प्रक्रिया से दूर थे। ऐसे में राजद 144 सीटों पर चुनाव लड़ी और 75 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी। विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी भी बनी थी, जबकि कांग्रेस 70 में 19, भाकपा(माले) 19 में 12, सीपाआई 6 में 2 और भाकपा(एम) 4 में से 2 सीटें जीतने सफल रही थी।







