नए संसद भवन के उद्घाटन (New Parliament Building Inauguration) को लेकर विवाद पहले से चल रहा था. अब इसमें राजदंड ‘सेंगोल’ (Golden Sceptre Sengol) का एंगल भी जुड़ गया है. केंद्र ने ऐलान किया है कि नए संसद भवन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ऐतिहासिक सेंगोल (राजदंड) स्थापित करेंगे, जिसे तमिलनाडु के 20 से अधिक अधीनम (मठ) प्रमुखों ने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को दिया था. अब कांग्रेस ने शुक्रवार को बीजेपी के इस दावे पर सवाल उठाया कि 1947 में अंग्रेजों से भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर सेंगोल का इस्तेमाल किया गया था.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा, “इस बात के कोई दस्तावेजी सबूत नहीं हैं कि लॉर्ड माउंटबेटन, सी राजगोपालाचारी और पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस राजदंड ‘सेंगोल’ को अंग्रेजों से भारत को सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक माना था. राजगोपालाचारी के दोनों जीवनीकारों में से किसी ने भी इस बारे में बात नहीं की है.” उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार और उसके ‘ढोल बजाने वाले’ तमिलनाडु में अपने राजनीतिक अंत के लिए औपचारिक राजदंड का इस्तेमाल कर रहे हैं. इस बारे में जो भी दावे किए जा रहे हैं, वे सब फर्जी हैं.
केंद्र ने दावा किया है कि अंग्रेजों से भारतीयों को सत्ता के हस्तांतरण को चिह्नित करने के लिए ‘सेंगोल’ को तत्कालीन पीएम नेहरू को सौंप दिया गया था. सरकार और बीजेपी के नेताओं ने अपने दावों में तमिलनाडु के मैगजीन ‘तुगलक’ से लेकर अमेरिका के ‘टाइम’ मैगजीन तक कई समाचार रिपोर्टों का हवाला दिया है. बीजेपी ने कांग्रेस पर पवित्र ‘सेंगोल’ को ‘सोने की छड़ी’ कहकर हिंदू परंपराओं का अपमान करने और इसे म्यूजियम में रखने का आरोप भी लगाया है. माना जाता है कि ‘सेंगोल’ इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में नेहरू के पैतृक घर आनंद भवन में था. आनंद भवन से बाद में इसे इलाहाबाद म्यूजियम में भेज दिया गया था.
पीएम मोदी 28 मई को नई संसद भवन का उद्घाटन करेंगे. इसके बाद पीएम इस ‘सेंगोल’ को लोकसभा अध्यक्ष के आसन के पास स्थापित करेंगे. कांग्रेस सहित 20 विपक्षी दलों ने नए संसद भवन के उद्घाटन कार्यक्रम का बहिष्कार करने का ऐलान किया है.
वहीं, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेता टीकेएस एलंगोवन ने बताया, ‘सेंगोल ‘राजशाही का प्रतीक था न कि लोकतंत्र का. यह राजनीतिक दलों द्वारा नहीं बल्कि मठ द्वारा दिया जाता है. उन्होंने उस समय भारत को आजादी मिलने पर एक सेंगोल दिया था. इन चीजों का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है. ये राजशाही का प्रतीक है”.
गृहमंत्री अमित शाह ने ‘सेंगोल’ के इतिहास और विरासत के बारे में बताते हुए कहा था कि 1047 के बाद ‘सेंगोल’ को कमोबेश भुला दिया गया था. शाह ने कहा, “1971 में एक तमिल विद्वान ने एक किताब में इसका जिक्र किया. हमारी सरकार ने 2021-22 में इसका जिक्र किया. 96 वर्षीय तमिल विद्वान 1947 में सेंगोल सौंपे जाने के समय मौजूद थे. वो अब नए संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किए जाने के मौके पर भी उपस्थित रहेंगे.”
रविवार को नई संसद के उद्घाटन में भाग लेने के लिए 24 से अधिक अधिनम के प्रमुख (मूल रूप से शैव मठ) पहले ही राष्ट्रीय राजधानी में पहुंच चुके हैं. इस मामले से वाकिफ लोगों के मुताबिक उद्घाटन समारोह में वैदिक परंपराएं और तमिल रीति-रिवाज भी होंगे.
दक्षिण भारतीय राजनीति के विशेषज्ञ और लेखक सुगाता श्रीनिवासराजू ने कहा, “सेंगोल की कहानी सुर्खियां बटोर रही है. यह कई तत्वों के साथ एक नैरेटिव है. लेकिन अगर इसमें सिर्फ जांच-पड़ताल होती है, तो इसकी भव्य कथा, इसके अतीत और महत्व से कोई फायदा नहीं होगा.”
उन्होंने कहा, “विपक्ष को मेगा, प्रामाणिक, जैविक, सांस्कृतिक कहानियों की जरूरत है. इसकी उन्होंने पिछले 9 वर्षों में परवाह नहीं की. परिणामस्वरूप हर बार एक सांस्कृतिक कहानी को लाया जाता है. चाहे वो झूठ हो या सच… फिर भी विपक्ष सिर्फ इसके जाल में फंस कर रह जाता है.”
टाइम मैगजीन की ग्राउंड रिपोर्ट में क्या है?
”जैसे ही बड़ा ऐतिहासिक दिन करीब आता गया, भारतीयों ने अपने-अपने ईश्वर को धन्यवाद देना शुरू किया और विशेष पूजा प्रार्थना, भजन आदि सुनाई देने लगे… भारत के पहले प्रधानमंत्री बनने से पहले शाम को जवाहरलाल नेहरू धार्मिक अनुष्ठान में व्यस्त रहे। दक्षिण भारत में तंजौर से मुख्य पुजारी श्री अंबलवाण देसिगर स्वामी के दो प्रतिनिधि आए थे। श्री अंबलवाण ने सोचा कि प्राचीन भारतीय राजाओं की तरह, भारत सरकार के पहले भारतीय प्रमुख के रूप में नेहरू को पवित्र हिंदुओं से सत्ता का प्रतीक और अथॉरिटी हासिल करनी चाहिए। पुजारी के प्रतिनिधि के साथ भारत की विशिष्ट बांसुरी की तरह के वाद्य यंत्र नागस्वरम को बजाने वाले भी आए थे। दूसरे संन्यासियों की तरह इन दोनों पुजारियों के बाल बड़े थे और बालों में कंघी नहीं की गई थी… उनके सिर और सीने पर पवित्र राख थी… 14 अगस्त की शाम को वे धीरे-धीरे नेहरू के घर की तरफ बढ़े…।
पुजारियों के नेहरू के घर पहुंचने के बाद नागरस्वम बजता रहा। इसके बाद उन्होंने पूरे सम्मान के साथ घर में प्रवेश किया। एक संन्यासी ने पांच फीट लंबा सोने का राजदंड लिया हुआ था जिकी मोटाई 2 इंच थी। उन्होंने तंजौर से लाए पवित्र जल को नेहरू पर छिड़का और उनके माथे पर पवित्र भस्म लगाया। इसके बाद उन्होंने नेहरू को पीतांबर ओढ़ाया और उन्हें गोल्डन राजदंड सौंप दिया। उन्होंने नेहरू को पके हुए चावल भी दिए, जिसे तड़के दक्षिण भारत में भगवान नटराज को अर्पित किया गया था। वहां से प्लेन से दिल्ली लाया गया था।”
क्या है सेंगोल?
सेंगोल संस्कृत शब्द “संकु” से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है “शंख”। हिंदू धर्म में शंख को काफी पवित्र माना जाता है। यह चोला साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। पुरातन काल में सेंगोल को सम्राटों की शक्ति और अधिकार का प्रतीक माना जाता था। इसे राजदंड भी कहा जाता था। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो इस सेंगोल को अंग्रेजों से सत्ता मिलने का प्रतीक माना गया। अब नए संसद भवन में सेंगोल को स्थापित किया जाएगा। शाह ने बताया है कि अभी तक इस सेंगोल को इलाहाबाद के संग्रहालय में रखा गया था।







