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संघवाद के नाम पर एकजुटता,……..

UB India News by UB India News
May 26, 2023
in Lokshbha2024, दिल्ली, ब्लॉग
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संघवाद के नाम पर एकजुटता,……..
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केद्रशासित प्रदेश दिल्ली में अफसरों की नियुक्ति का अधिकार केंद्र सरकार द्वारा अध्यादेश के जरिए केजरीवाल सरकार से लेकर एलजी यानी उपराज्यपाल को फिर सौंप देने से छिड़े राजनीतिक विवाद के बीजेपी बनाम विपक्ष की राजनीतिक शक्ल लेना तय है। आप सुप्रीम कोर्ट सहित सड़क से संसद तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व बीजेपी से विपक्षी सहयोग के बूते जोर आजमाइश करना चाहती है।

एलजी की बजाय दिल्ली की निर्वाचित केजरीवाल सरकार को अफसरों की नियुक्ति का अधिकार बीती ११ मई को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सौंपा था। पीठ के सर्वसम्मत फैसले में प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ सहित कुल पांच न्यायाधीश शामिल थे। दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार के विरुûद्ध सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की है। आप संयोजक अरविंद केजरीवाल द्वारा अध्यादेश को कानूनी जामा पहनाने से राज्य सभा में रोकने की दरख्वास्त को कांग्रेस के अलावा विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं का समर्थन मिल रहा है। समर्थन जुटाने की मुहिम में केजरीवाल बिहार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों नीतीश कुमार एवं ममता बनर्जी से मिल चुके हैं। केजरीवाल अब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान सहित मुंबई में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार एवं यूबीटी शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से मिलने गए हैं। हालांकि देश के सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस का समर्थन जुटाने के लिए आप ने अभी तक उसके किसी भी पदाधिकारी से मुलाकात का समय नहीं मांगा है। कांग्रेस द्वारा केजरीवाल की मुहिम को अभी तक समर्थन नहीं देने का स्पष्टीकरण भी दिया जा चुका है। कांग्रेस आलाकमान से उसकी दिल्ली एवं पंजाब इकाई के प्रमुख नेताओं ने आप को किसी भी मुद्दे पर समर्थन नहीं देने की अपील की है। गौरतलब है कि दिल्ली सहित पंजाब एवं गुजरात में भी कांग्रेस को आप ने सत्ता के हाशिये पर बैठा दिया है। राजस्थान‚ मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में भी आप ने आगामी विधानसभा चुनाव जोरशोर से लड़ने का ऐलान किया है। जाहिर है कि गुजरात की तरह आप इन राज्यों में जितने भी मत हासिल करेगी उससे सत्ता पाने में बीजेपी को फायदा और कांग्रेस का नुकसान तय है। यूं भी राष्ट्रीय दल का दर्जा मिलने के बाद आप के हौसले बुलंद हैं‚ और कांग्रेस तथा बीजेपी उसे अपना प्रबल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानकर उसकी रोकथाम में सक्रिय हैं। इसके बावजूद केजरीवाल विपक्षी समर्थन बटोरने की मुहिम में जुटे हैं। उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का साफ आदेश था कि उपराज्यपाल को दिल्ली सरकार की सलाह पर काम करना होगा। अध्यादेश लाकर बीजेपी ने दिल्ली वालों से छल किया है।

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सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अफसरों की नियुक्ति एवं तबादले के आदेश आगे से केंद्रशासित प्रदेश की निर्वाचित सरकार को जारी करने थे उन पर एलजी को अपने अधिकारों के अनुसार कार्रवाई करनी थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कुछ देर बाद ही केजरीवाल सरकार ने सेवा सचिव आशीष मोरे को उनके पद से हटाने का आदेश एलजी को भेज दिया था। एलजी ने इस तबादला आदेश पर प्रतिक्रिया नहीं जताई जिसे आप ने रोक लगाने के रूप में प्रचारित किया। हालांकि बाद में मोरे ने केजरीवाल सरकार की बात मान ली मगर सुप्रीम कोर्ट से अधिकार मिलने के बाद मुख्यमंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कथित नाकाबिल और भ्रष्ट अफसरों को हटाने का ऐलान करके केंद्र से फिर अदावत ले ली। उन्होंने कहा कि और‚ ईमानदारों को प्रमुख पदों पर नियुक्त किया जाएगा मगर एलजी की शह पर दिल्ली की निर्वाचित सरकार के काम बिगाड़ू अफसरों को केंद्र सरकार मझधार में कैसे छोड़ देतीॽ सुप्रीम कोर्ट के ११ मई के फैसले से पहले‚ सेवा विभाग को दिल्ली के उपराज्यपाल स्वतंत्र रूप में चला रहे थे जिसके खिलाफ ही आप की सरकार सर्वोच्च अदालत से न्याय मांगने गई थी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने साफ कहा कि अफसरों पर निर्वाचित सरकार का नियंत्रण न हो तो उनकी जवाबदेही कैसे तय होगी। अदालत ने कानून–व्यवस्था‚ पुलिस और जमीन के अलावा उपराज्यपाल से सभी मामलों में निर्वाचित सरकार की सलाह के अनुसार चलने को कहा था। आदेश के अनुसार अधिकारी यदि मंत्रियों को रिपोर्ट करना बंद कर दें या हुक्मउदूली करें तो फिर उनकी जवाबदेही के नियम बेमानी हो जाएंगे। इसलिए अधिकारियों की नियुक्त एवं तबादले का अधिकार निर्वाचित सरकार को देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया।

केजरीवाल सरकार और एलजी के बीच अधिकारों पर तनातनी पिछले नौ साल से केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से ही जारी है। अध्यादेश लाने के साथ ही केंद्र सरकार ने भी सुुप्रीम कोर्ट में फैसले की समीक्षा के लिए पुनर्विचार याचिका लगा दी है। फैसला तब भी कायम रहा तो केंद्र सरकार क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करके नये सिरे से दलील पेश कर सकती है। केंद्र के अध्यादेश में दिल्ली सरकार में अफसरों की नियुक्ति के मामले में एलजी के निर्णय को ही अंतिम बताया गया है। दिल्ली में सिविल सर्विसेज बोर्ड बना कर उसमें मुख्यमंत्री और दो वरिष्ठ नौकरशाहों के नामांकन का प्रावधान किया है। बोर्ड में बहुमत से हुआ फैसला ही मान्य होगा मगर विवाद होने पर एलजी निर्णायक होंगे।

अध्यादेश को केजरीवाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनकी शिकायत है कि नियुक्ति एवं तबादले का अधिकार एलजी के पास होने से अफसर उनके मंत्रियों की एक नहीं सुनते। अपने चुनावी वायदे पूरे करने तथा प्रशासन को अपने एजंडे पर चलाने के लिए निर्वाचित सरकार को कम से कम ऐसे अफसर तो चाहिए जो उसकी प्राथमिकताओं को समझें! जनहित के फैसलों में भी नौकरशाही अड़चन डालती है। देखना है कि गर्मी की छुट्टियों के बाद सुप्रीम कोर्ट केंद्र और दिल्ली सरकार की याचिकाओं पर क्या रुख अपनाएगा। वैसे सर्वोच्च अदालत ने कुछ मामलों में अपने फैसले को उलटने वाले विधायी उपायों को पहले भी खारिज किया है। कुल मिलाकर बीजेपी की मोदी सरकार ने अध्यादेश लाकर संघवाद की रक्षा के मुद्दे पर विपक्ष को एकजुट होने का नया बहाना दे दिया है।

 

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