नई दिल्ली में आयोजित जी–२० और क्वाड़ की बैठकों से भारत की स्वतंत्र विदेश नीति के फिसलने के संकेत मिल रहे हैं। इन दोनों बैठकों से कूटनीतिक हलकों में निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबाव के सामने घुटने टेक दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और जयशंकर की विदेश नीति में यह भटकाव तात्कालिक है अथवा दूरगामी यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। विदेश नीति में यह बदलाव जयशंकर ने अपने स्तर पर किया है या इसके पीछे स्वयं प्रधानमंत्री मोदी का निर्देश है‚ यह कहना मुश्किल है। फिलहाल इतना साफ है कि रूस विदेश नीति में आई इस कमजोरी से खुश नहीं है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने रायसीना ड़ॉयलॉग के मंच से अपनी नाराजगी भी जाहिर कर दी। रूस में बहुत से समीक्षक भारत पर अहसानफरामोशी या कृतघ्नता का आरोप लगा रहे हैं। भारत को समय रहते अपने भरोसेमंद दोस्त रूस के साथ विश्वास का संबंध रखना होगा।
विदेश मंत्री जयशंकर ने इन बैठकों के अवसर पर एक के बाद एक कई गलतियां कीं। पहली गलती तो जी–२० विदेश मंत्री बैठक के अवसर पर क्वाड़ की बैठक आयोजित करना थी। एक परिपक्व राजनयिक के रूप में जयशंकर को इस बात का भान होना चाहिए था कि अमेरिका और पश्चिमी देश जी–२० बैठक में पलीता लगाना चाहते हैं। साथ ही क्वाड़ बैठक के जरिये भी पश्चिमी देश चीन से अधिक रूस को कठघरे में खड़़ा करने की फिराक में हैं।
जयशंकर की दूसरी गलती क्वाड़ बैठक के बाद जारी संयुक्त बैठक में यूक्रेन का उल्लेख किया जाना है। क्वाड़ चीन–प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थायित्व पर केंद्रित है। उसमें यूक्रेन संघर्ष का जिक्र किए जाने का कोई औचित्य नहीं था। भारतीय विदेश मंत्री की तीसरी गलती संयुक्त वक्तव्य में यूक्रेन संघर्ष के सिलसिले में रूस की कथित परमाणु धमकी की ओर संकेत किया जाना है। भारत में अभी तक किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर रूस की कथित परमाणु धमकी का जिक्र नहीं किया था। इस बारे में ऐसा क्यों किया गया इसका जवाब जयशंकर को देना होगा। जयशंकर की चौथी गलती रायसीना ड़ॉयलॉग में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन और ऑस्ट्रेलिया व जापान के विदेश मंत्रियों के साथ मंच साझा करना था। इसमें चर्चा का विषय ‘क्वाड़–स्क्वाड़’ (क्वाड़ दस्ता) की भूमिका था। जयशंकर को इस बात का जवाब देना होगा कि विचार विमर्श का एक मंच क्वाड़ एकाएक ‘दस्ता’ कैसे बन गया। रूस और चीन में यह आशंका बलवती हो सकती है कि दस्ता आगे चलकर गैंग (गिरोह) बन सकता है।
कहने के लिए जयशंकर और अन्य विदेश मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि क्वाड़ एक सैन्य गठबंधन नहीं है‚ लेकिन अमेरिका‚ ऑस्ट्रेलिया और जापान क्वाड़ को अघोषित रूप से सैन्य गठबंधन बनाने का मंसूबा रखते हैं। जयशंकर की पांचवीं गलती यह है कि वह इस बात के लिए तैयार हुए कि क्वाड़ के समुद्री सुरक्षा संबंधी कार्यदल की बैठक वाशिंगटन में शीघ्र आयोजित होगी। जयशंकर ने यह स्पष्ट नहीं किया कि समुद्री सुरक्षा से तात्पर्य क्या है।
रायसीना ड़ॉयलॉग का आयोजन एक पश्चिम परस्त थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडे़शन (ओआरएफ) ने किया था। आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय विदेश मंत्रालय भी इसका सह–आयोजक था। उसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिभागियों का बोलबाला था। रूस के विदेश मंत्री लावरोव को अपना पक्ष रखने का मौका मिला‚ लेकिन मंच संचालक के अल्पज्ञान और कूटनीतिक नासमझी के कारण यह वाकयुद्ध में बदल गया। वास्तव में रायसीना ड़ॉयलॉग नौटंकी बनकर रह गया। रूसी विदेशी मंत्री लावरोव ने आयोजकों को खरी–खोटी सुनाई। मास्को लौटने के बाद लावरोव राष्ट्रपति पुतिन को भारत में अपने कटु अनुभव की जानकारी अवश्य देंगे। रूस ने भारत कोे रियायती मूल्य पर कच्चे तेल की आपूर्ति करके अरबों–खरबों रुपये की मदद की है। रूस ने यूक्रेन संघर्ष के बावजूद भारत को एस–४०० मिसाइल कवच की कई खेप सौंपी है। परिस्थितियों का तकाजा है कि भारत क्वाड़ के दल–दल में न फंसे। पश्चिमी देशों में चीन के विरुद्ध भारत को फ्रंट लाइन बनाने का मंसूबा बनाया जा रहा है। एशिया का यूक्रेन बनना भारत के हित में नहीं है।
रूस कम से कम इतना तो अवश्य चाहेगा कि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और राजनीतिक स्वायत्तता कायम रखे। परिस्थितियों का तकाजा है कि भारत क्वाड़ के दल–दल में न फंसे। पश्चिमी देशों में चीन के विरुद्ध भारत को फ्रंट लाइन बनाने का मंसूबा बनाया जा रहा है। एशिया का यूक्रेन बनना भारत के हित में नहीं है…………






