आज पश्चिमी चंपारण में केंद्रीय गृहमंत्री शाह के रैली स्थल से 400 किलोमीटर से कुछ अधिक दूर पूर्णिया में महागठबंधन की रैली है‚ जिसमें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव हिस्सा लेंगे। इसमें महगठबंधन के कांग्रेस और वाम दल जैसे सहयोगी भी शामिल होंगे। इस बीच‚ महागठबंधन में शामिल उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने भाजपा पर निशाना साधा। तिवारी ने आरोप लगाया‚ ‘पूर्णिया रैली में भाजपा को सत्ता बाहर करने की लड़़ाई के लिए बिगुल बजेगा। अमित शाह के दौरे से कुछ खास असर नहीं पड़़ेगा। गृह मंत्री के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास करने की संभावना है जो २०२४ के चुनावों में भाजपा के लिए एकमात्र उम्मीद है।
बिहार में आज महागठबंधन की महारैली है। इसे महागठबंधन की तरफ से 2024 लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत भी माना जा रहा है। इससे भी अहम सियासी गलियारे में चर्चा इस बात की भी है कि महागठबंधन के सभी दल यहां से नीतीश कुमार को बिहार में लोकसभा चुनाव के लिए अपना नेता चुनेंगे।
ऐसे में महागठबंधन ने महारैली के लिए सीमांचल को ही क्यों चुना? क्या ये महागठबंधन का बीजेपी को पलटवार है? महागठबंधन की रणनीति क्या है?
सबसे पहले समझिए महागठबंधन ने महारैली के लिए सीमांचल क्यों चुना ?
पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं कि महागठबंधन बीजेपी को यहां से जवाब देना चाहता है कि बिहार में महागठबंधन की ताकत बीजेपी से ज्यादा है। इसलिए रैली के लिए पूर्णिया की उसी रंगभूमि मैदान को चुना गया है, जहां से पिछले साल सितंबर में बीजेपी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह ने महागठबंधन सरकार को ललकारा था।
महागठबंधन पूर्णिया से अपने कोर वोट बैंक मुस्लिम वर्ग को भी संदेश देना चाहता है कि राज्य में उनके असली हितैषी वही हैं। इस रैली से कांग्रेस को भी मैसेज देने की तैयारी है कि जदयू और आरजेडी के बिना बिहार में कुछ नहीं हो सकता।

MY पर नजर, AIMIM फिर से ताकतवर न बन जाए
सीमांचल की राजनीति पर गौर करें तो लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल का दबदबा लंबे समय तक रहा है। आरजेडी के MY समीकरण को यहां से ताकत मिलती रही, लेकिन ओवैसी ने आरजेडी की ताकत को यहां कमजोर कर दिया।
नतीजा यह हुआ कि अमौर सीट से अख्तरुल ईमान, बायसी से सैयद रुकनुद्दीन अहमद, जोकीहाट से शाहनवाज आलम, कोचाधामन से मोहम्मद इजहार असफी, बहादुरगंज से मोहम्मद अंजार नईमी चुनाव जीते। तेजस्वी यादव ने इसका बदला लिया और अख्तरुल ईमान को छोड़ बाकी चारों विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। आरजेडी फिर से सबसे बड़ी पार्टी बन गई। इस रैली के माध्यम से महागठबंधन AIMIM का सीमांचल में प्रभाव को भी कम करने की कोशिश करेगा।
शहाबुद्दीन प्रकरण के बाद मुस्लिम वर्ग में आरजेडी से है नाराजगी
सियासी गलियारे में एक चर्चा इस बात की भी है कि शहाबुद्दीन प्रकरण के बाद मुस्लिम वर्ग आरजेडी से नाराज हो गया है। शहाबुद्दीन की मौत के बाद उनके समर्थक उनकी पत्नी हिना शहाब को राज्यसभा भेजने की मांग कर रहे थे, लेकिन उन्हें पार्टी की तरफ से राज्यसभा नहीं भेजा गया।
इसके बाद इसकी चर्चा होने लगी कि आरजेडी केवल वोट बैंक के रूप में मुस्लिम वर्ग का इस्तेमाल किया जाता है। जब चुनाव आता है तभी उनकी याद आती है। जरूरत के समय छोड़ देते हैं। इस पूरे प्रकरण के बाद शहाबुद्दीन की पत्नी ने भी इशारों-इशारों में बोल दिया है कि उन्होंने राजद छोड़ दिया है। हालांकि फिलहाल वो किसी पार्टी को जॉइन नहीं की है।
राज्य में सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी सीमांचल में, उन्हें साधने की कोशिश
सीमांचल राज्य का एक ऐसा इलाका है, जहां राज्य की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी निवास करती हैं। राज्य भर में मुस्लिमों की आबादी 2011 की जनगणना के मुताबिक 16% है। सीमांचल के 4 लोकसभा क्षेत्रों में 30 से लेकर 70 प्रतिशत आबादी इसी समुदाय की है। सबसे ज्यादा लगभग 70% वोटर्स केवल एक लोकसभा क्षेत्र किशनगंज में है। वहीं दूसरे स्थान पर कटिहार है, जहां मुस्लिम वोटर्स की संख्या 40 फीसदी, अररिया में 35 फीसदी, पूर्णिया में 33 फीसदी है।
सीमांचल में 24 में से 15 विधायक महागठबंधन के, 3 सांसद भी
सीमांचल में मुख्य रूप से 4 जिलें हैं। अररिया, पूर्णिया, किशनगंज, कटिहार। यहां लोकसभा की 4 और विधानसभा की 24 सीटें हैं। इस पर फिलहाल महागठबंधन की पार्टियों का दबदबा है। 4 में से 2 सांसद जेडीयू के और 1 कांग्रेस के हैं। मात्र 1 सांसद बीजेपी के हैं। वहीं बात करें विधायकों की तो यहां महागठबंधन के फिलहाल 15 विधायक हैं। जिनमें आरजेडी 6, जेडीयू के 4,कांग्रेस के 4 और लेफ्ट के 1 विधायक हैं। बीजेपी के यहां कुल 8 विधायक हैं, जबकि एक विधायक एआईएमआईएम के हैं।
अब समझिए महागठबंधन की क्या है रणनीति
बीजेपी के उम्मीदवार के खिलाफ एक उम्मीदवार उतारने की तैयारी
महागठबंधन बीजेपी को बिहार, झारखंड में 40 सीटों पर नुकसान पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इसके लिए वे इन तीनों राज्यों के 96 लोकसभा सीटों में बीजेपी के साथ सीधा मुकाबला करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। यानी बीजेपी के उम्मीदवार के खिलाफ महागठबंधन का 1 उम्मीदवार हो। इन्हें जीताने की जिम्मेदारी महागठबंधन के हर नेता की हो।
बिहार के सीएम नीतीश कुमार के अहम सिपहसालार और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह कई मौकों पर इस बात को सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए बिहार, झारखंड और बंगाल ही काफी है। उनका कहना है कि इन राज्यों से अगर बीजेपी के 40 सीट कम कर दिए जाएं तो केंद्र में सरकार बनाना उनके लिए मुश्किल हो जाएगा।
अब समझिए इन 40 सीटों का गणित, अभी यहां से बीजेपी की 46 सीटें
बिहार(40), बंगाल (42) और झारखंड (14) में कुल 96 लोकसभा की सीटें हैं। इनमें फिलहाल बीजेपी का बिहार में 16, बंगाल में 18 और झारखंड में 11 सीटों पर कब्जा है। इन नंबर्स के साथ सदन में बीजेपी के पास कुल 303 सीटें हैं। ऐसे में अगर इन राज्यों से बीजेपी को 40 सीटों का नुकसान होता है तो अपने दम पर बहुमत से दूर हो जाएगी। ऐसे में उन्हें अपनी सहयोगी पार्टी पर निर्भर होना होगा। यही कारण ही कि महागठबंधन अपनी इस नीति को कामयाब बनाने की कोशिश में जुट गया है।
महागठबंधन के सामने हैं ये चुनौतियां
केवल बिहार में महागठबंधन, झारखंड बंगाल के नेता ने बनाई दूरी
महागठबंधन अभी केवल बिहार में ही दिखाई दे रहा है। एक सप्ताह पहले भाकपा माले विपक्ष के नेताओं का शक्ति प्रदर्शन करना चाहता था। इसमें झारखंड के सीएम को भी आमंत्रण दिया गया था, लेकिन वे शामिल नहीं हुए। बंगाल की सीएम ममता बनर्जी पहले ही इस गठबंधन से दूरी बना ली है। कांग्रेस भी खुल कर साथ की बात नहीं कर रहा है। ऐसे में ये महागठबंधन केवल बिहार तक ही सीमित दिखाई दे रहा है।
सीट बंटवारे पर अटक सकता है पेंच
बिहार में अभी कैबिनेट में एक मंत्री पद को लेकर महागठबंधन में शामिल कांग्रेस और अन्य पार्टियों के बीच तनातनी की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं कि चुनाव के दौरान सीट बंटवारे में बड़ा पेंच फंस सकता है। महागठबंधन में सांसद के हिसाब से अभी जेडीयू सबसे बड़ी पार्टी है तो विधायक के लिहाज से आरजेडी।
लेफ्ट का एक भी सांसद नहीं हैं। कांग्रेस एक सांसद होने के बाद भी बड़ी दावेदारी पेश करेगी। दैनिक भास्कर ने सभी पार्टियों से सीट बंटवारे पर बात करने की कोशिश की, लेकिन फिलहाल किसी भी दल के नेता इस पर कुछ भी बोलने से इनकार कर रहे हैं।
कांग्रेस अभी तक क्लियर नहीं किया है स्टैंड
महागठबंधन में कांग्रेस शामिल होगा कि नहीं अभी तक ये स्पष्ट नहीं हो पाया है। एक संशय तो इस रैली में शामिल होने को लेकर भी बना है। यही कारण है कि महागठबंधन के इस रैली के पोस्टर से कांग्रेस को आउट कर दिया गया है।
भाकपा माले की रैली में नीतीश कुमार ने दो टूक कहा था कि वे कांग्रेस के जवाब का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कांग्रेस की तरफ से कोई रिप्लाई नहीं आया है। महागठबंधन में कांग्रेस के नेता शामिल होंगे या नहीं अभी इस पर भी संशय बना हुआ है। ऐसे में बिना कांग्रेस के बिना महागठबंधन की नीति बिहार में कारगर नहीं हो सकती है।
महागठबंधन के अंदर चल रहा चेक एंड बैलेंस
महागठबंधन के अंदर की राजनीति में इसकी चर्चा नई सरकार के गठन के बाद से ही होती रही है कि नीतीश केंद्र की राजनीति करेंगे। प्रदेश तेजस्वी संभालेंगे। विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने की मुहिम में नीतीश कुमार को लालू प्रसाद का साथ चाहिए। लालू प्रसाद भी चाहते हैं कि तेजस्वी मुख्यमंत्री बनें।
आरजेडी के कई विधायक कई बार तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर चुके हैं। महागठबंधन के अंदर कांग्रेस के साथ खास तौर से आरजेडी ने उपचनावों में क्या किया यह किसी से छिपा नहीं है। अब लोकसभा चुनाव कांग्रेस किस तरह से रिएक्ट करती है इसका इंतजार करना पड़ेगा।
राहुल गांधी अपनी यात्रा के जरिए खुद को और कांग्रेस को मजबूत कर चुके हैं। बिहार कांग्रेस में नया प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को बनाया जा चुका है। धन-बल से मजबूत एक धाकड़ नेता की छवि इनकी है। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस और माले लगातार कॉर्डिनेशन कमेटी बनाने की मांग करती रही और आरजेडी सहित जेडीयू इसको क्यों अनसुना करती रही। ये कांग्रेस और माले खूब समझती हैं। ओवर ऑल यह कि महागठबंधन के अंदर ही चेक एंड बैलेंस का खेल चल रहा है।







