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बिहार में सियासी बिसात बिछनी शुरू……….

UB India News by UB India News
February 22, 2023
in खास खबर, पटना, बिहार
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बिहार में सियासी बिसात बिछनी शुरू……….
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लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अभी भले वक्त है, लेकिन बिहार में सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। कौन किसके साथ और कौन विरोध में है, इसकी लकीर उभरने लगी है। सात महीने पहले बिहार में महागठबंधन के 7 दलों के मुकाबले भाजपा अकेले थी, लेकिन अब वह अपनी ब्रिगेड तैयार कर ली है।

पहले आरसीपी सिंह और अब उपेंद्र कुशवाहा ने सत्ताधारी जदयू की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कभी सीएम नीतीश के खास रहे दोनों नेता अब भाजपा के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। भाजपा को इस बात की खुशी है कि दोनों बागी नेता आने वाले चुनाव में महागठबंधन की राह में रोड़ा अटका सकते हैं।

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जदयू से अलग होकर कुशवाहा ने नई पार्टी बना ली है। दूसरे दिन ही बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने उपेंद्र कुशवाह के घर जाकर उनसे मुलाकात की। दोनों नेताओं की बंद कमरे में हुई मुलाकात ने सियासी पारा चढ़ा दिया। कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले चुनावों में कुशवाहा एनडीए का हिस्सा रहेंगे।

सत्ता में साझेदार 7 दल, खिलाफ में भी 7 पार्टियां

बिहार में महागठबंधन की सरकार का 7वां महीना चल रहा है। जब इसका गठन हुआ तब साझेदार दलों का कॉन्फिडेंस काफी हाई था। महागठबंधन के सभी दलों का एक ही कहना था कि भाजपा अकेले पड़ गई। महागठबंधन में कुल सात दल शामिल हैं। इसमें नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड, लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर), सीपीआई, सीपीआई-एम और सीपीआई-एमएल शामिल हैं। 4 दल सरकार में हैं और तीनों वाम दल बाहर से समर्थन दे रहे हैं।

सरकार गठन के 7 महीनों में समीकरण काफी बदले हुए नजर आ रहे हैं। एक ओर 7 पार्टियों के समर्थन से चल रही महागठबंधन सरकार के खिलाफ भी अब 7 दल खड़े नजर आ रहे हैं।

हर दल नीतीश-तेजस्वी सरकार की राह में रोड़े डालने का प्रयास कर रहा है। नीतीश-तेजस्वी ने जिस तरह 7 दलों को साथ कर भाजपा के खिलाफ चक्रव्यूह रचा था। अब उसका जवाब भी सरकार को वैसे ही मिल रहा है। आगे जानते हैं किन 7 ‘दलों’ ने नीतीश-तेजस्वी सरकार के खिलाफ तैयार किया चक्रव्यूह..

भारतीय जनता पार्टी : निश्चित तौर पर मौजूदा समय में नीतीश-तेजस्वी सरकार के लिए सबसे बड़ी मुसीबत भाजपा है। भाजपा बिहार पर एकछत्र राज के लिए बार-बार कसमसा कर रह जाती है। 2015 में भाजपा इसी प्रयास में बिखर गई थी, लेकिन हर चुनाव में भाजपा प्रयास करती रही है। सरकार से अलग होने के बाद वह बिहार में जाति समीकरण को साधने की भरपूर कोशिश में है।

बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष विजय सिन्हा को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर बिठाया। विजय सिन्हा भूमिहार जाति से आते हैं। विधान परिषद में नेता विपक्ष की कुर्सी पर कोइरी समाज के आने वाले सम्राट चौधरी को बिठाया।

सम्राट चौधरी राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। इनके पिता शकुनी चौधरी पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष, स्वास्थ्य मंत्री के साथ-साथ सांसद भी रहे हैं। ऐसे में विजय सिन्हा और सम्राट चौधरी को आगे करके भाजपा ने एक मैसेज देने का काम किया है।

पहले विधानसभा के स्पीकर रहे विजय सिन्हा को नेता प्रतिपक्ष बनाकर भाजपा ने प्रमुख अगड़ी जाति को साधने की कोशिश की है।
पहले विधानसभा के स्पीकर रहे विजय सिन्हा को नेता प्रतिपक्ष बनाकर भाजपा ने प्रमुख अगड़ी जाति को साधने की कोशिश की है।

लोजपा (रामविलास) : नीतीश-तेजस्वी की दूसरी सबसे बड़ी मुश्किल खुद को पीएम मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग पासवान की अगुवाई वाली लोजपा (रामविलास) है। 2020 के चुनाव में चिराग पासवान ने नीतीश कुमार को बिहार में तीसरे नंबर पर धकेल दिया। चिराग पासवान ने 2020 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को एक ओर समर्थन किया, वहीं जेडीयू के खिलाफ उम्मीदवार देकर नीतीश कुमार की मुश्किलें बढ़ा दीं।

चिराग के चलते नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को कई सीटों पर करारी हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी में टूट के बाद भी चिराग पासवान का जलवा कम नहीं हुआ। उपचुनावों में नीतीश-तेजस्वी दोनों के उम्मीदवारों को हरवाने में इनकी अहम भूमिका रही। यही वजह रही है कि सरकार से अलग होने के बाद बीजेपी चिराग पासवान के प्रति सॉफ्ट हुई। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इन्हें जेड कैटेगरी की सुरक्षा दे दी है।

चिराग पासवान पार्टी में टूट के बाद भी बिहार में काफी एक्टिव हैं।
चिराग पासवान पार्टी में टूट के बाद भी बिहार में काफी एक्टिव हैं।

रालोजपा (पारस गुट) : चिराग पासवान से अलग होने के बाद पशुपति कुमार पारस गुट वाली रालोजपा के पास भले ही कोई विधायक नहीं है, लेकिन पांच सांसदों के साथ रालोजपा बिहार से लोकसभा में तीसरे नंबर की पार्टी है। चिराग से अलग होने के बाद एनडीए की मुखर सहयोगी है और उम्मीद है कि आगे भी महागठबंधन के खिलाफ ही रहेगी।

पशुपति पारस अभी केंद्र में मंत्री है और लगातार नीतीश-तेजस्वी सरकार पर हमलावर हैं।
पशुपति पारस अभी केंद्र में मंत्री है और लगातार नीतीश-तेजस्वी सरकार पर हमलावर हैं।

राष्ट्रीय लोक जनता दल : उपेंद्र कुशवाहा की इस नई पार्टी के पास कितनी ताकत है, इसका पता अभी नहीं चल सकता। ये तो आने वाले दिनों में ही पता चलेगा। कुशवाहा का दावा है कि जदयू से कई लोग उनकी पार्टी में आगे शामिल होंगे। ऐसे में उनकी असली ताकत चुनाव में पता चलेगी। लेकिन इतना तो तय है कि इनकी ताकत जितनी भी हो, नीतीश-तेजस्वी के खिलाफ ही रहेगी।

जेडीयू से अलग होने की घोषण के दौरान तेजस्वी और लालू परिवार पर हमलावर नजर आए। उनका साफ कहना है कि जिसके खिलाफ जेडीयू लड़कर सरकार में आई अब उस पार्टी के साथ वो नहीं रह सकते हैं। उन्होंने यहां तक कह डाला कि जेडीयू में अब कुछ बचा नहीं है, नीतीश कुमार पड़ोसी के घर में अपना उत्तराधिकारी खोज रहे हैं। कुशवाहा का यह बयान सीधे तौर पर लालू परिवार और तेजस्वी के खिलाफ ही था।

रामचंद्र प्रसाद सिंह : जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। तब से लगातार वे नीतीश-तेजस्वी के खिलाफ मुहिम चलाए हुए हैं। पूरे बिहार में घूम-घूमकर नीतीश कुमार को अक्षम बता रहे हैं। आरसीपी कोई नया दल बनाएंगे या किसी दूसरे दल में शामिल होंगे, इसका खुलासा तो अभी तक नहीं किया है। लेकिन इतना तय है कि रहेंगे नीतीश-तेजस्वी के खिलाफ।

कभी नीतीश कुमार के बेहद करीबी रहे आरसीपी सिंह अब पूरे बिहार में घूम-घूमकर उन्हें अक्षम बता रहे हैं।
कभी नीतीश कुमार के बेहद करीबी रहे आरसीपी सिंह अब पूरे बिहार में घूम-घूमकर उन्हें अक्षम बता रहे हैं।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) : 2020 के चुनाव में तेजस्वी यादव को सीएम की कुर्सी तक पहुंचने से रोक देने में अगर एनडीए का बड़ा योगदान था, तो हैदराबाद के असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को भी कम नहीं आंका जा सकता है। एआईएमआईएम ने जीत तो सिर्फ 5 सीटों पर दर्ज की थी, लेकिन दर्जन भर ऐसी सीटों को प्रभावित किया, जहां अल्पसंख्यक वोटरों की अच्छी खासी संख्या थी।

जाहिर सी बात है ये वोटर कहीं न कहीं महागठबंधन के पक्ष में ही गोलबंद होते। हालांकि ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के 5 में से 4 विधायक अब राजद में शामिल हो चुके हैं। लेकिन एआईएमआईएम ने अभी हार नहीं मानी है। 2022 में हुए 3 उपचुनावों में अगर महागठबंधन की हार हुई तो उसमें भी बड़ा फैक्टर एआईएमआईएम के उम्मीदवारों का रहा है। भले ही एआईएमआईएम और बीजेपी का गठबंधन नहीं हो सकता, लेकिन वोटों का ध्रुवीकरण होने की स्थिति में भाजपा को ही फायदा होगा। दूसरे मुस्लिम वोट महागठबंधन का कटेगा।

अख्तरुल ईमान अभी बिहार में ओवैसी की पार्टी के एकमात्र विधायक हैं।
अख्तरुल ईमान अभी बिहार में ओवैसी की पार्टी के एकमात्र विधायक हैं।

प्रशांत किशोर : कभी नीतीश कुमार के ड्राइंग रूम में उनके लिए नीतियां बनाने वाले चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर अब उनके खिलाफ हैं। वह जन सुराज पदयात्रा कार्यक्रम में नीतीश-तेजस्वी सरकार को पानी पी-पी कर कोस रहे हैं।

बिहार में खुद को स्थापित करने के लिए पदयात्रा पर निकले प्रशांत किशोर ने अभी तक कोई राजनीतिक दल नहीं बनाया है, लेकिन यह कह दिया है कि दल बनेगा तो उसका नाम जन सुराज ही होगा। यानी उनका भी राजनीति में आना तय है, लेकिन सक्रिय राजनीति में आने से पहले प्रशांत किशोर जेडीयू के मुखिया नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के खिलाफ ताल ठोंक चुके हैं।

पीके फिलहाल हर मुद्दे को लेकर बिहार सरकार पर हमलावर नजर आ रहे हैं।
पीके फिलहाल हर मुद्दे को लेकर बिहार सरकार पर हमलावर नजर आ रहे हैं।

विकासशील इंसान पार्टी: इन सबके बीच खुद को सन ऑफ मल्लाह बताने वाले मुकेश सहनी की भी चर्चा हो रही है। 2020 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन से अलग होने के बाद सहनी एनडीए में शामिल हो गए थे। चुनाव में मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी से 4 विधायक चुने गए, लेकिन कुछ दिन बाद ही इनके विधायकों का मोहभंग हो गया और सभी ने बीजेपी का दामन थाम लिया। ऐसे में उन्हें मंत्री पद से भी इस्तीफा देना पड़ा था।

कयास है कि आने वाले दिनों में सहनी एक बार फिर एनडीए में शामिल हो सकते हैं।
कयास है कि आने वाले दिनों में सहनी एक बार फिर एनडीए में शामिल हो सकते हैं।

हालांकि, बिहार उपचुनाव में सहनी ने खुद उम्मीदवार उतारकर महागठबंधन और एनडीए को मैसेज दिया कि वो भी किसी से कम नहीं है। अब बिहार में हालत बदल चुके हैं। सहनी को केंद्रीय गृह मंत्रालय से वाई कैटेगरी की सुरक्षा मिली है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में सहनी एक बार फिर एनडीए में शामिल हो सकते हैं।

मुकेश सहनी को Y+ सुरक्षा के मायने समझिए

विकासशील इंसान पार्टी (VIP) सुप्रीमो मुकेश सहनी को मंगलवार को वाई प्लस सिक्योरिटी दी गई हैं। उन्हें ये सिक्योरिटी केंद्रीय सुरक्षा समिति की अनुशंसा पर मुहैया कराई गई है। इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के आधार पर गृह मंत्रालय की तरफ से पूर्व मंत्री की सुरक्षा बढ़ाने का निर्णय लिया गया। इस निर्णय के तहत अब मुकेश सहनी के साथ कम से कम 11 सुरक्षाकर्मी रहेंगे। इसमें CISF के जवान शामिल होंगे। साथ ही दो पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर उनके साथ 24 घंटे घूमेंगे।

केंद्र के इस निर्णय को बिहार में सुरक्षा से ज्यादा सियासत के नजरिए से देखा जा रहा। राजनीति के जानकार कहते हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी छोटे-छोटे दलों को अपने साथ लाने में जुट गई है। 2014 में वो इसका सफल प्रयोग कर चुकी है। तब उनके साथ उपेंद्र कुशवाहा, मुकेश सहनी, चिराग पासवान के अलावा जीतन राम मांझी जैसे नेता थे।

बीजेपी 2024 में एक बार फिर से यही गठजोड़ तैयार करना चाहती है, लेकिन अभी तक उनके समर्थन में केवल लोजपा (रामविलास) के चिराग पासवान हैं। उपेंद्र कुशवाहा भी JDU से अलग होने के बाद बीजेपी के सुर में सुर मिलाते हुए दिख रहे हैं।

मुकेश सहनी की सुरक्षा को पॉलिटिकल एक्सपर्ट एक पॉलिटिकल प्रलोभन के तौर पर देख रहे। कुछ महीने पहले चिराग पासवान को भी केंद्र की तरफ से Z प्लस सुरक्षा दी गई थी।

मुकेश सहनी 2014 से बीजेपी के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ बीजेपी को अपना समर्थन दिया था।
मुकेश सहनी 2014 से बीजेपी के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने महागठबंधन का साथ छोड़ बीजेपी को अपना समर्थन दिया था।

VIP ने कहा-इसे बस सुरक्षा के लिहाज से देखिए

वहीं, VIP इसे सिर्फ सुरक्षा का मामला मान रही है। VIP के राष्ट्रीय प्रवक्ता देव ज्योति ने दैनिक भास्कर को बताया कि ये पूरी तरह केंद्र का निर्णय है। सुरक्षा समिति के बाद पार्टी सुप्रीमो की सुरक्षा बढ़ाने का निर्णय लिया गया।

उन्होंने न ही इसके लिए आवेदन दिया था और न ही उनकी फिलहाल किसी पार्टी के साथ कोई डील चल रही। वे लगातार नक्सल प्रभावित इलाकों में सभा कर रहे थे। इसके कारण उनकी सुरक्षा बढ़ाने का निर्णय लिया गया होगा।

3 साल पहले मांगी थी सुरक्षा, तब नहीं मिली थी

6 अक्टूबर 2020 को VIP पार्टी ने केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर मुकेश सहनी के लिए सुरक्षा की मांग की थी। इस पत्र में उन्होंने कहा था कि मुकेश सहनी की जान को खतरा हैं।

पार्टी के नेता छोटे सहनी ने लिखा था कि महागठबंधन से अलग होने के बाद वे अलग-अलग इलाकों में जा रहे। यहां उनके साथ कोई अप्रिय घटना घट सकती है,लेकिन तब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनकी इस मांग को खारिज कर दिया था।

मुकेश सहनी का करियर भाजपा ने बनाया फिर बिगाड़ा

मुकेश सहनी बिहार की सियासत से फिलहाल पूरी तरह आउट हैं। उनकी पार्टी का फिलहाल किसी सदन में कोई नेता नहीं है, जबकि 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने कोटे में आई 121 सीट में से 11 सीट VIP को दी थी। इनमें से चार सीट पर VIP को जीत भी मिली।

इस जीत ने सहनी को बिहार की सियासत में नई ताकत दी थी। इतना ही नहीं सरकार बनने के बाद मुकेश सहनी को बिहार सरकार में मंत्री भी बनाया गया, लेकिन उन्होंने उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ कुछ सीटों पर अपने प्रत्याशी उतार दिए। इससे भाजपा खफा हो गई।

दो साल के अंदर 2022 में बीजेपी ने मुकेश सहनी को अर्श से फर्श पर लाकर खड़ा कर दिया। उनके सभी विधायकों को अपने पाले में कर लिया। सहनी को मंत्री पद के साथ विधान पार्षद पद से भी इस्तीफा देना पड़ा था।

सीट भले न जीतें, लेकिन वोट का बिखराव रोक सकते हैं मुकेश सहनी

मुकेश सहनी की ताकत को BJP अच्छी तरह से जानती है। मुकेश सहनी ने बिहार में अपनी पहचान सन ऑफ मल्लाह के रूप में बनाई है। बिहार में इनकी आबादी लगभग 5 फीसदी से ज्यादा है। ऐसे में पॉलिटिकल एक्सपर्ट की मानें तो भले वे सीट नहीं जीते, लेकिन लगभग 10 लोकसभा सीटों पर वे बीजेपी के वोटों का बिखराव रोक सकते हैं। ऐसा उन्होंने पिछले चुनावों में साबित भी किया है।

अब जान लीजिए, बिहार में किस नेता के पास किस तरह की सुरक्षा

नीतीश और तेजस्वी को Z प्लस सुरक्षा

बिहार के सीएम नीतीश कुमार, डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव, राज्यपाल, पूर्व सीएम जीतन राम मांझी, लालू यादव और राबड़ी देवी को Z प्लस सुरक्षा मिली हुई है, जबकि चिराग पासवान, ललन सिंह, शाहनवाज हुसैन, अशोक चौधरी और शत्रुघ्न सिन्हा को z श्रेणी की सुरक्षा दी गई है।

बिहार में इनके पास Y श्रेणी की सुरक्षा

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, मंत्री तेज प्रताप यादव, बीजेपी के सांसद राधा मोहन सिंह, रवि शंकर प्रसाद, नित्यानंद राय, राजीव प्रताप रूडी, केंद्रीय मंत्री पशुपति पारस, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह, पूर्व सांसद मीरा कुमार आदि नेताओं को बिहार में Y श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है।

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