राजनेता आखिर कब अपनी गलतियों से सबक लेकर जनता की जान दांव पर लगाना छोड़ेंगे। अगर तीन दिन पहले हुए हादसे से सबक ले लिया होता तो रविवार को आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती के पास गुंटूर में तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) के कार्यक्रम में भगदड़़ में तीन और मासूम महिलाओं की जान न जाती। इन महिलाओं की मौत उपहार लेने की होड़़ के दौरान भगदड़़ में हो गई थी। तीन दिन पहले नेल्लोर में इसी तरह के एक कार्यक्रम के दौरान मची भगदड़़ में आठ लोगों की जान चली गई थी। गुंटूर में हुई जनसभा में तेदेपा प्रमुख एन चंद्रबाबू नायड़ू के आयोजन स्थल से जाने के बाद आयोजकों ने साडि़़यों सहित अन्य उपहार बांटने शुरू किए‚ वहां उमड़़ी भीड़़ बेकाबू हो गई और हादसा हो गया। हादसे के बाद तेदेपा और इसके प्रमुख चंद्रबाबू नायडू़ सभी के निशाने पर आ गए हैं। विश्लेषकों का कहना है कि तेदेपा उपहार वितरण का आश्वासन देकर लोगों को रिझाने के लिए पिछले १० दिनों से प्रचार कर रही थी। आरोप है कि नायड़ू के प्रचार के जुनून में तीन लोगों की बलि चढ गई। विरोधियों का कहना है कि नायड़ू को मौतों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। ऐसे हादसे देश में गरीबी के हालात को सामने लाते हैं। इन रैलियों में शामिल होने के लिए लिए गरीब जनता को टोकन दिए गए थे और टोकन रखने वालों को साडि़़यां और अन्य उपहार देने का वादा किया गया था। हादसे के बाद मुआवजा और अनुग्रह राशि को ही राजनेता अपने कर्तव्यों की पूर्ति मान लेते हैं। आंध्र प्रदेश अकेला राज्य नहीं है जहां लोगों ने उपहारों के फेर में जान गंवाई है। उत्तर प्रदेश में भी वर्षों पहले ऐसा हादसा हो चुका है। नायडू़ अर्से से राज्य की सत्ता से बाहर हैं और अपनी खोई जमीन पाने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। राज्य में सत्ता पर काबिज वाईएसआर कांग्रेस का आरोप है कि नायड़ू ने जानबूझकर संकरी गलियों में रैली रखी थी ताकि ड्रोनों के जरिये लिये जाने वाले फुटेज में भारी भीड़़ दिखाई जा सके। सोचने की बात है कि जब एक रैली में हादसा हो चुका था तो ऐसी ही दूसरी रैली क्यों की गईॽ यह राज्य प्रशासन की भी लापरवाही है। इस तरह की रैलियों पर रोक लगाए जाने की जरूरत है। चुनाव आयोग को भी इस दिशा में कड़े़ निर्देश देने होंगे ताकि न राजनीतिक दल उपहार बांटकर गरीबी का मजाक बना सकें और न ही किसी और मासूम की जान दांव पर लगे।
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