इस बीच एक बडे बिजनेस हाउस ने एक कथित उदारवादी मीडिया हाउस के शेयरों को खरीद लिया। जब मालिक बदलते हैं तो ऐसे संस्थानों को चलाने वाले भी बदलते हैं और ऐसे में जो बाहर आते हैं‚ अगर वे प्रोफेशनल है तो अपने निष्कासन को सहजता से लेते हैं‚ लेकिन जो प्रोफेशनल नहीं होते‚ वे रोते हैं‚ और प्रलाप करते रहते हैं। उस मीडिया हाउस के साथ यही हुआ है। मालिक बदलता है‚ तो सुर भी बदलता है!
यों मीडिया बाजार में ऐसी खबरें उडती ही रहती थीं कि वह मीडिया हाउस बिकने वाला है कि कोई खरीदने वाला है। और चंूकि इस मीडिया हाउस के चैनल आज भी सत्ता के बरक्स अपने को आलोचक की तरह पेश करते थे और अपने को जनतंत्र के पहरूए बताते थे‚ अब वही ‘सिम्पेथी’ के पात्र बनने की जुगत में हैं। कई मानते हैं कि यह हाउस जनतंात्रिाक मूल्यों का रखवाला था। इसलिए निशाने पर था और इसीलिए उसे देश के एक बडे बिजनेस हाउस ने खरीद लिया। बहुत से लोग मानते हैं कि यह मीडिया हाउस अपनी अलग पहचान रखता था। चौदह के बाद सभी मीडिया हाउस झुक गए मगर यह नहीं झुका‚ लेकिन आज उसके शेयर खरीदे जा चुके हैं। इसलिए मीडिया में यह शोक की घडी है। ऐसे अनेके लोग हैं जो मानते हैं कि सन दो हजार चैदह के बाद मीडिया की आजादी पर आंच आई है। देश में तानाशाही है। विरोधी स्वरों को टारगेट किया जाता है‚ और कई तो इस स्थिति की तुलना हिटलर के फासिज्म से करते हैं‚ और अपने को फासिज्म का मुकाबला करने वाले जनतांत्रिक रणबांकुरे की तरह पेश करते हैं‚ और कई इनाम भी झटक लेते हैं।
ऐसे लोग न फासिज्म के ‘फा’ को जानते हैं‚ न हिटलर के ‘ह’ को जानते हैं। अगर फासिज्म होता तो कोई इतनी चूं–चपड भी न कर पाता जितना उस मीडिया हाउस के कुछ ‘प्रलापी’ कर रहे हैं। यों‚ सन चौदह के बाद कुछ बदलाव तो साफ दिखते हैं लेकिन यह भी तो सच है कि जब सत्ता बदलती है‚ तो बहुत कुछ बदलता है‚ और जब बहुत सी प्रस्थापनाएं बदलती हैं‚ तो और कुछ बदलता है। एजेंडा बदलता है‚ टारगेट बदलते हैं। लेकिन कुछ सोचते हैं कि एक सत्ता ‘लिबरल’ होती है‚ दूसरी ‘तानशाह’ होती है‚ तो ऐसे विचार को सिर्फ ‘भ्रम’ ही कहा जा सकता है क्योंकि सत्ता क्या हैॽ इसका अर्थ ऐसे लोग जानते ही नहीं। ‘लेनिन’ ने अपनी किताब ‘स्टेट एंड रिवोल्यूशन’ में कहा है कि हर राज्य सत्ता शासक वर्ग की तानाशाही होती है। ऊपर से भले वह जनतंत्र का लबादा ओढे‚ लेकिन स्वभाव से तानाशाही ही होती है। वह तभी तक जनंतत्र के नाटक को चलने देती है‚ जब तक ‘जनतंत्र’ और ‘आजादी’ शासक वर्ग को नुकसान नहीं पहुंचाते। जैसे ही कोई नुकसान पहुंचाता है‚ सत्ता के बघनखे निकल आते हैं‚ और वह अपने असली रूप में आ जाती है। इस पैमाने से आज हम किसी भी सत्ता को देख सकते हैं‚ और समझ सकते हैं कि लिबरल से लिबरल सत्ता भी वक्त पडने पर तानाशाहीपूर्ण व्यवहार करने लगती है जैसा कि इंदिरा गांधी ने एक वक्त में ‘आपातकाल’ लगा के किया।
जहां तक ‘आजादी’ की बात है‚ तो हम आज के सोशल मीडिया को देखें तो वहां कौन–कौन क्या–क्या नहीं बकता रहता‚ लेकिन सत्ता उसे दूर तक सहती रहती है‚ और कई बार नहीं भी सहती‚ लेकिन सोशल मीडिया अब भी आलोचना की एक बडी जगह की तरह दिखता है। जहां तक किसी मीडिया हाउस के खरीदने की‚ बिकने की बात है‚ वह आम बात है। अगर आप ऐसे मीडिया हाउस के मालिक हैं जिसके शेयर मारकेट में खरीदे–बेचे जाते हैं‚ तो आप शेयर मारकेट के खरीद–फरोख्त के नियम से नहीं बच सकते। आज आप मालिक हैं‚ कल कोई ओर हो सकता है‚ और परसों कोई और।
इसलिए अगर आज उक्त मीडिया हाउस के एक बडे हिस्से के नये मालिक आ गए तो आश्चर्य क्याॽ एक मालिक बेचता है‚ दूसरा खरीदता है। ऐसी स्थिति में अगर कोई नौकर यानी पत्रकार अपने को ही खुदा समझने लगे कि वही इस मीडिया संसार को चला रहा था‚ तो यह उसकी बाल–सुलभ खुशफहमी भर है। हर समय मैं–मैं करने वाले ऐसे कई मानसिक रोगियों को अपना रोग कभी समझ नहीं आता। इसीलिए वे प्रलाप करते रहते हैं। यहां भी ऐसे कई प्रलापी हैं‚ जो अब अपने प्रलाप में ही खुश हैं। ऐसे लाग पत्रकार कम‚ प्रलापी अधिक हैं।







