गुजरात विधानसभा चुनाव रोचक मोड़ पर पहुंच चुका है। सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा इस बार आम आदमी पार्टी एवं आल इंडिया इत्तेहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) भी मैदान में है। कुछ और भी छोटे–मोटे दल अपना भाग्य आजमा रहे होंगे‚ लेकिन ऐसा लगता नहीं कि चुनाव परिणाम पिछले ढाई दशक से कुछ अलग आएंगे।
इसके भी अपने कारण हैं। इनमें पहला कारण है गुजरात की कानून–व्यवस्था। नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री के रूप में गुजरात की सत्ता संभालने के बाद से जिस गुजरात ने कफ्र्यू का मुंह तक नहीं देखा‚ उसी गुजरात में उससे पहले महीनों कफ्र्यू का ही साम्राज्य देखा जाता रहा है। दंगे तो जैसे वहां के मासिक उत्सव हुआ करते थे। निंदनीय गोधरा कांड के बाद हुए गुजरात के भीषण दंगे भले किसी क्रिया की प्रतिक्रिया में हुए हों‚ लेकिन उससे पहले भी गुजरात के विभिन्न हिस्सों में अक्सर छोटे–मोटे दंगे होते ही रहते थे। अहमदाबाद की छूरेबाजी भी कुख्यात थी। ऐसी घटनाओं के बारे में तो अब नई पीढ़ी न तो जानती है‚ न जानना चाहती है। कानून–व्यवस्था में इस खराबी का नुकसान गुजरात के सभी वर्गों को उठाना पड़ता था। आज नहीं उठाना पड़ता। जिसके परिणामस्वरूप किसी भी वर्ग का व्यवसायी चैन से अपने धंधे–व्यापार में व्यस्त है‚ और कमा खा रहा है। यहां तक कि जिस मुस्लिम वर्ग को असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेता भड़काकर गुजरात में अपनी दाल गलाने का स्वप्न देख रहे हैं‚ वह भी इस सुधरी कानून–व्यवस्था का कायल हो चुका है।
वह नहीं चाहता कि गुजरात की शांति में कोई खलल पड़े‚ और उसके धंधे–व्यापार पर फिर कोई संकट आए। बात गुजरात के मुस्लिम वर्ग की चल रही है‚ तो यह भी याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि बीते दो दशकों में उसे यह अहसास भी हो गया है कि भाजपा का शासन वास्तव में वैसा है नहीं‚ जैसा बताकर उसे अब तक भड़काया जाता रहा है। इस शासन में वह पहले से ज्यादा सुरक्षित और निश्चिंत है। उसके कामकाज में कोई बाधा नहीं आ रही है। व्यावसायिक प्रगति भी हो रही है। इस निश्चिंतता और प्रगति ने उसे उन दलों की ओर से उदासीन बना दिया है‚ जो उसे भड़काकर वोट लिया करते थे। इस उदासीनता के कारण उनमें यह बदलाव आया है कि अब वे सिर्फ भाजपा को रोकने के लिए मतदान की कतार में नहीं लगते। बल्कि उम्मीदवार की अच्छाई–बुराई देखकर आकलन करते हैं। विपक्षी दलों के लिए यही चिंता का विषय है। क्योंकि इसी के दम पर तो वे उन्हें अपना वोट बैंक बनाए बैठे थे। दरअसल‚ गुजरात के मुस्लिमों का यही ‘मॉडल’ देश के अन्य हिस्सों में प्रचलित होने लगा है। जिसके कारण मुस्लिम बहुल इलाकों में भी भाजपा उम्मीदवारों की जीत होने लगी है। विपक्षी दलों‚ खासकर कांग्रेस के लिए यह चिंता का विषय है। गुजरात में भाजपा के ‘अजेय’ रहने का एक और बड़ा कारण है वहां का विकास और प्रगति। जिन लोगों ने गुजरात का भूकंप देखा है वे ‘तब’ और ‘अब’ में फर्क आसानी से समझ सकते हैं। २६ जनवरी‚ २००१ की सुबह–सुबह आए विनाशकारी भूकंप ने आधे से ज्यादा गुजरात को तहस–नहस कर दिया था।
इस भूकंप में लगभग कच्छ का पूरा इलाका तबाह हो गया था। उस समय की जलती हुई सामूहिक चिताओं की यादें आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं। उस प्राकृतिक त्रासदी के बाद ही गुजरात की कमान नरेन्द्र मोदी को सौंपी गई थी। उसके बाद तो मोदी के नेतृत्व में गुजरात का जो कायाकल्प शुरू हुआ‚ वह सबके सामने है। देश का पश्चिमी राज्य गुजरात समृद्ध तो पहले से था‚ लेकिन बुनियादी ढांचा वहां भी कमजोर था। ऊपर से भूकंप में हुई तबाही ने रही–सही कसर भी पूरी कर दी थी‚ मगर भूकंप के बाद केंद्र की तत्कालीन वाजपेयी सरकार एवं गुजरात की मोदी सरकार ने मिलकर जिस तरह से गुजरात के नवनिर्माण की योजनाएं बनाइ‚ और मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जिस तरह से उनपर अमल होना शुरू हुआ‚ उसने लोगों की आंखें खोल दीं। भूकंप के समय सौराष्ट्र और कच्छ में पेयजल की दिक्कत आम थी। पीने का पानी तीसरे–चौथे दिन टैंकरों से मिला करता था।
आज नर्मदा का जल कच्छ तक पहुंच चुका है। जो न सिर्फ पीने के काम आ रहा है‚ बल्कि खेतों की सिंचाई में भी मददगार सिद्ध हो रहा है। गुजरात की जिस आम जनता ने ये बदलाव अपनी आंखों से होते हुए देखे हैं‚ उन्हें कांग्रेस की अकर्मण्यता और केजरीवाल के सपने क्यों भाएंगे भलाॽ गुजरात के गांव–गांव में पहुंची पक्की सड़कें और घर–घर तक पहुंचा नल से जल लोगों को जो सुविधाएं दे रहे हैं‚ उसकी कोई काट विपक्षी दलों के पास तो दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि २०१७ के विधानसभा चुनाव में अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस के भी अनेक विधायक चुनाव के कुछ ही दिनों बाद उसका साथ छोड़कर भाजपा में जा मिले थे। भाजपा का एक और मजबूत पक्ष है गुजरात में उसका सांगठिनक ढांचा। कहना अतिशयोक्ति न होगी‚ इस सांगठिनक ढांचे को गढ़ने और रचने में बहुत बड़ी भूमिका स्वयं नरेन्द्र मोदी की रही है।
अपनी युवावस्था में गांव–गांव तक न सिर्फ उन्होंने इस ढांचे को खड़ा किया‚ बल्कि आज भी वह अपने गढ़े लोगों के संपर्क में रहते हैं। सोने पर सुहागा यह कि अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह इसी सांगठिनक ढांचे का उपयोग कर भाजपा को अब तक की सबसे अधिक सीटें दिलवाने का दावा कर रहे हैं। यदि वे ऐसा कर दिखाएं तो कतई ताज्जुब नहीं होना चाहिए। क्योंकि उनके नाम २०१७ में मृत प्राय उत्तर प्रदेश भाजपा को बुलंदियों पर पहुंचाने का गौरव दर्ज है। ऐसे अनेक राज्यों में वह भाजपा को सफलता दिलवा चुके हैं‚ जहां के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। फिर गुजरात तो उनका अपना राज्य है।
दरअसल‚ गुजरात के मुस्लिमों का यही ‘मॉडल’ देश के अन्य हिस्सों में भी प्रचलित होने लगा है‚ जिसके कारण मुस्लिम बहुल इलाकों में भाजपा उम्मीदवारों की जीत होने लगी है। विपक्षी दलों‚ खासकर कांग्रेस के लिए यह चिंता का विषय है। गुजरात में भाजपा के ‘अजेय’ रहने का एक और बड़ा कारण है वहां का विकास और प्रगति। जिन लोगों ने गुजरात का भूकंप देखा है वे ‘तब’ और ‘अब’ में फर्क आसानी से समझ सकते हैं…..







