अक्सर खुद से भागने का दिल करता है। इतनी दूर जहां कभी खुद से भी खुद की मुलाकात न हो। न कोई ईद गिर्द दिखे‚ न किसी से बात हो। जानता हूं कि ये सब संभव नहीं। समाज के बीच रहते हुए‚ समाज से या खुद से ही भाग पाना इतना आसान नहीं। चाहते न चाहते हुए भी सामाजिकता तो निभानी ही पड़ेगी। समाज के बीच रहते हुए यह सवाल प्रायः मेरे मन में आता है कि समाज को होता क्या जा रहा हैॽ यह इतना जहरीला और असंवेदनशील पहले तो न था! अब कुछ ज्यादा ही हो गया है। या कहूं‚ सोशल मीडिया की लत ने इसे ऐसा बना दिया है। जिधर देखो उधर कुछ न कुछ ऐसा घट रहा है‚ जो संबंधों‚ रिश्तों और विश्वास के तारों को तोड़ रहा है। सब कुछ इतना कमजोर हो गया है कि हल्की सी फूंक से ही भरभरा कर गिर पड़ता है।
आश्चर्य तब अधिक होता है जब दिन रात फेसबुक और व्हाट्सएप के स्टेटस पर बड़ी–बड़ी ज्ञान और सम्मान की बातें डालने वाले खुद ही दोगले निकलते हैं। उस कहावत की तरह कि ‘हाथी के दांत दिखाने के अलग‚ खाने के अलग!’ उनकी जुबान पर उगलने को इतना जहर होता है‚ इतना तो सांप में भी न होता होगा शायद।
असहमति और आलोचना का दायरा निरंतर सिमटता जा रहा है। मैं यह बात लेखकीय या राजनीतिक समाज के संदर्भ में ही नहीं‚ आम लोगों के बाबत भी कह रहा हूं। यहां तारीफ की दरकार हर किसी को है किंतु आलोचना की नहीं। मुझे खूब याद है‚ बचपन में जिस मुहल्ले में हम रहा करते थे‚ वहां गली का कोई भी बड़ा या बुजुर्ग हमें यों ही डांट जाता था। तब न कभी हम बुरा मानते थे न मां–बाप। बल्कि समझाते थे कि उन्होंने कुछ गलत देखा होगा तभी तुम्हें डांटा। अब माहौल यह है कि आप अपने बच्चे को नहीं डांट सकते। किसी के गलत को गलत नहीं कह सकते। समझाना भी अब लोगों को चुभने सा लगा है।
ठहर कर कोई सोचना–समझना नहीं चाहता। आलोचना के खिलाफ यहां तुरंत ही फतवा जारी हो जाता है। सोशल मीडिया पर विकसित हो रही मूर्खता का चलन आम लोगों के बीच भी खासा बढ़ गया है। हर एक को हर मुद्दे पर लिखना या बोलना है; चाहे समझ आया हो या नहीं। अभी हाल आफताब निधि प्रकरण सामने आने के बाद से सोशल मीडिया से लेकर समाज (घरों तक) में जहर का प्रतिशत और अधिक बढ़ गया है। एक होड़ सी लगी है कि कौन किस हद तक नीचे गिर सकता है। कभी निधि के चरित्र‚ कभी लिवइन के दुष्प्रभाव पर जो मन में आ रहा है‚ बोले व लिखे चला जा रहा हैं। कितनों ने इसे धर्म से जोड़कर एक अलग ही एंगल दे दिया है। इन बेहूदगियों को कितना ही इग्नोर करने की कोशिश कीजिए‚ मगर किसी न किसी मध्य से सामने आ ही जाती हैं। लगता है कि समाज ने अपनी सोचने–समझने शक्ति ही खो दी है।
यह कोई नया या अनोखा मामला नहीं। इससे पहले भी जाने कितनी लड़कियां–्त्रिरयां दहेज व अन्य कारणों से मार दी गई हैं। कुछ दिन हल्ला हुआ फिर सब शांत हो गए। लेकिन समाज ने अपना आचरण नहीं बदला। वो स्त्री के प्रति कल भी क्रूर था‚ आज भी है‚ और आगे भी इसमें सुधार की संभावना कम ही दिखती है। प्यार‚ इश्क‚ मोहब्बत मानो खेल से हो गए हैं। किसी को किसी के जज्बात की फिक्र ही नहीं। एक दूसरे पर एतबार नहीं। रिश्तों की गाड़ी को जबरन खींचा जा रहा है। आजकल प्यार फेसबुक या व्हाट्सएप से शुरू होकर कहीं और ही जाकर खत्म होता है। इस पर तरह–तरह की चिंताएं सबके पास हैं‚ मगर सुधार की गुंजाइश बहुत कम।
डिजिटल होने की आंधी के बीच सामाजिक तानाबाना गड़बड़ा गया है। बच्चों के हाथों में मोबाइल थमाकर मां–बाप ने खुद को स्वतंत्र कर लिया है। शिक्षा घर से कम गूगल और यूट्यूब से ज्यादा मिल रही है। एकल होते परिवार साथ रहने की परंपरा को ही भूल गए हैं। शादी के कुछ दिनों में ही रिश्ते टूट रहे हैं। जो सहन नहीं कर पा रहे‚ वे आत्महत्या की ओर रु ख कर रहे हैं। भीतर से यह समाज (हम सब) इतना कमजोर और खोखला हो चुका है कि हर दवाई फिलहाल बेअसर है।
हैरानी इस बात की है कि समाज के संभलने–सुधरने की कोई राह नजर नहीं आती। जानता हूं‚ मुझे इतना निराश भी नहीं होना चाहिए। पर क्या करूं‚ जिस समाज को अभी मैं देख रहा हूं‚ वो अपनी सामाजिकता खो चुका है। असर सोशल मीडिया का भी है पर इसे बनाया तो हम–आप ने ही है।
तकलीफ इसलिए भी अधिक होती है कि जिस दौर को गुजार कर हम आगे बढ़े हैं‚ कम से कम वो इतना गया–बीता तो न था। जुबान लोगों की कठोर पहले भी थी‚ रिश्तों में टूटन भी थी‚ मगर फिर भी मसले साथ बैठकर सुलझा लिया करते थे। समाज के पास धैर्य था। आलोचना को बर्दाश्त करने की शक्ति थी। अब तो हर ओर जहर और गुस्सा ही दिखाई एवं सुनाई पड़ता है। अगर ऐसा ही रहा तो कहीं का नहीं रहेगा यह समाज।
तकलीफ इसलिए भी अधिक होती है कि जिस दौर को गुजार कर हम आगे बढ़े हैं‚ कम से कम वो इतना गया–बीता तो न था। जुबान लोगों की कठोर पहले भी थी‚ रिश्तों में टूटन भी थी‚ मगर फिर भी मसले साथ बैठकर सुलझा लिया करते थे। समाज के पास धैर्य था। आलोचना को बर्दाश्त करने की शक्ति थी







