ADVERTISEMENT
Wednesday, July 29, 2026
No Result
View All Result
  • Login
  • Register
No Result
View All Result
UB INDIA NEWS
No Result
View All Result

ये कहा आ गए हम …………..

UB India News by UB India News
November 20, 2022
in खास खबर, टेक्नोलॉजी, समाज
0
ये कहा आ गए हम …………..
  • Facebook
  • X
  • WhatsApp
  • Telegram
  • Email
  • Print
  • Copy Link

अक्सर खुद से भागने का दिल करता है। इतनी दूर जहां कभी खुद से भी खुद की मुलाकात न हो। न कोई ईद गिर्द दिखे‚ न किसी से बात हो। जानता हूं कि ये सब संभव नहीं। समाज के बीच रहते हुए‚ समाज से या खुद से ही भाग पाना इतना आसान नहीं। चाहते न चाहते हुए भी सामाजिकता तो निभानी ही पड़ेगी। समाज के बीच रहते हुए यह सवाल प्रायः मेरे मन में आता है कि समाज को होता क्या जा रहा हैॽ यह इतना जहरीला और असंवेदनशील पहले तो न था! अब कुछ ज्यादा ही हो गया है। या कहूं‚ सोशल मीडिया की लत ने इसे ऐसा बना दिया है। जिधर देखो उधर कुछ न कुछ ऐसा घट रहा है‚ जो संबंधों‚ रिश्तों और विश्वास के तारों को तोड़ रहा है। सब कुछ इतना कमजोर हो गया है कि हल्की सी फूंक से ही भरभरा कर गिर पड़ता है।

आश्चर्य तब अधिक होता है जब दिन रात फेसबुक और व्हाट्सएप के स्टेटस पर बड़ी–बड़ी ज्ञान और सम्मान की बातें डालने वाले खुद ही दोगले निकलते हैं। उस कहावत की तरह कि ‘हाथी के दांत दिखाने के अलग‚ खाने के अलग!’ उनकी जुबान पर उगलने को इतना जहर होता है‚ इतना तो सांप में भी न होता होगा शायद।

RELATED POSTS

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच वैश्विक संकट पर पीएम मोदी ने बुलाई अहम बैठक,

BJP विधायक राजू सिंह की सजा पर हाईकोर्ट में क्यों लगी रोक?

असहमति और आलोचना का दायरा निरंतर सिमटता जा रहा है। मैं यह बात लेखकीय या राजनीतिक समाज के संदर्भ में ही नहीं‚ आम लोगों के बाबत भी कह रहा हूं। यहां तारीफ की दरकार हर किसी को है किंतु आलोचना की नहीं। मुझे खूब याद है‚ बचपन में जिस मुहल्ले में हम रहा करते थे‚ वहां गली का कोई भी बड़ा या बुजुर्ग हमें यों ही डांट जाता था। तब न कभी हम बुरा मानते थे न मां–बाप। बल्कि समझाते थे कि उन्होंने कुछ गलत देखा होगा तभी तुम्हें डांटा। अब माहौल यह है कि आप अपने बच्चे को नहीं डांट सकते। किसी के गलत को गलत नहीं कह सकते। समझाना भी अब लोगों को चुभने सा लगा है।

ठहर कर कोई सोचना–समझना नहीं चाहता। आलोचना के खिलाफ यहां तुरंत ही फतवा जारी हो जाता है। सोशल मीडिया पर विकसित हो रही मूर्खता का चलन आम लोगों के बीच भी खासा बढ़ गया है। हर एक को हर मुद्दे पर लिखना या बोलना है; चाहे समझ आया हो या नहीं। अभी हाल आफताब निधि प्रकरण सामने आने के बाद से सोशल मीडिया से लेकर समाज (घरों तक) में जहर का प्रतिशत और अधिक बढ़ गया है। एक होड़ सी लगी है कि कौन किस हद तक नीचे गिर सकता है। कभी निधि के चरित्र‚ कभी लिवइन के दुष्प्रभाव पर जो मन में आ रहा है‚ बोले व लिखे चला जा रहा हैं। कितनों ने इसे धर्म से जोड़कर एक अलग ही एंगल दे दिया है। इन बेहूदगियों को कितना ही इग्नोर करने की कोशिश कीजिए‚ मगर किसी न किसी मध्य से सामने आ ही जाती हैं। लगता है कि समाज ने अपनी सोचने–समझने शक्ति ही खो दी है।

यह कोई नया या अनोखा मामला नहीं। इससे पहले भी जाने कितनी लड़कियां–्त्रिरयां दहेज व अन्य कारणों से मार दी गई हैं। कुछ दिन हल्ला हुआ फिर सब शांत हो गए। लेकिन समाज ने अपना आचरण नहीं बदला। वो स्त्री के प्रति कल भी क्रूर था‚ आज भी है‚ और आगे भी इसमें सुधार की संभावना कम ही दिखती है। प्यार‚ इश्क‚ मोहब्बत मानो खेल से हो गए हैं। किसी को किसी के जज्बात की फिक्र ही नहीं। एक दूसरे पर एतबार नहीं। रिश्तों की गाड़ी को जबरन खींचा जा रहा है। आजकल प्यार फेसबुक या व्हाट्सएप से शुरू होकर कहीं और ही जाकर खत्म होता है। इस पर तरह–तरह की चिंताएं सबके पास हैं‚ मगर सुधार की गुंजाइश बहुत कम।

डिजिटल होने की आंधी के बीच सामाजिक तानाबाना गड़बड़ा गया है। बच्चों के हाथों में मोबाइल थमाकर मां–बाप ने खुद को स्वतंत्र कर लिया है। शिक्षा घर से कम गूगल और यूट्यूब से ज्यादा मिल रही है। एकल होते परिवार साथ रहने की परंपरा को ही भूल गए हैं। शादी के कुछ दिनों में ही रिश्ते टूट रहे हैं। जो सहन नहीं कर पा रहे‚ वे आत्महत्या की ओर रु ख कर रहे हैं। भीतर से यह समाज (हम सब) इतना कमजोर और खोखला हो चुका है कि हर दवाई फिलहाल बेअसर है।

हैरानी इस बात की है कि समाज के संभलने–सुधरने की कोई राह नजर नहीं आती। जानता हूं‚ मुझे इतना निराश भी नहीं होना चाहिए। पर क्या करूं‚ जिस समाज को अभी मैं देख रहा हूं‚ वो अपनी सामाजिकता खो चुका है। असर सोशल मीडिया का भी है पर इसे बनाया तो हम–आप ने ही है।

तकलीफ इसलिए भी अधिक होती है कि जिस दौर को गुजार कर हम आगे बढ़े हैं‚ कम से कम वो इतना गया–बीता तो न था। जुबान लोगों की कठोर पहले भी थी‚ रिश्तों में टूटन भी थी‚ मगर फिर भी मसले साथ बैठकर सुलझा लिया करते थे। समाज के पास धैर्य था। आलोचना को बर्दाश्त करने की शक्ति थी। अब तो हर ओर जहर और गुस्सा ही दिखाई एवं सुनाई पड़ता है। अगर ऐसा ही रहा तो कहीं का नहीं रहेगा यह समाज।

तकलीफ इसलिए भी अधिक होती है कि जिस दौर को गुजार कर हम आगे बढ़े हैं‚ कम से कम वो इतना गया–बीता तो न था। जुबान लोगों की कठोर पहले भी थी‚ रिश्तों में टूटन भी थी‚ मगर फिर भी मसले साथ बैठकर सुलझा लिया करते थे। समाज के पास धैर्य था। आलोचना को बर्दाश्त करने की शक्ति थी

  • Facebook
  • X
  • WhatsApp
  • Telegram
  • Email
  • Print
  • Copy Link
UB India News

UB India News

Related Posts

‘नारी शक्ति वंदन सम्मेलन’: नया इतिहास रचने जा रहा भारत, होगा 21वीं सदी का महत्वपूर्ण निर्णय- पीएम मोदी

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच वैश्विक संकट पर पीएम मोदी ने बुलाई अहम बैठक,

by UB India News
July 28, 2026
0

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार शाम को प्रमुख मंत्रालयों के सचिवों के साथ एक बैठक की अध्यक्षता करेंगे. बताया जा रहा...

BJP विधायक राजू सिंह की सजा पर हाईकोर्ट में क्यों लगी रोक?

BJP विधायक राजू सिंह की सजा पर हाईकोर्ट में क्यों लगी रोक?

by UB India News
July 28, 2026
0

बिहार के पूर्व बीजेपी विधायक राजू कुमार सिंह को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत मिली. हाईकोर्ट ने साल 2018 के चर्चित...

प्रधान के इस्तीफे पर वर्ल्ड मीडिया…….

प्रधान के इस्तीफे पर वर्ल्ड मीडिया…….

by UB India News
July 27, 2026
0

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया है। NEET पेपर लीक केस में उनके इस्तीफे की मांग करते हुए...

2029 के लोकसभा चुनाव में उतरेंगे Gen-Z?

2029 के लोकसभा चुनाव में उतरेंगे Gen-Z?

by UB India News
July 27, 2026
0

नीट पेपर लीक मामले को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवा पीढ़ी यानी जेन-जी के प्रदर्शन के बाद पूरे देश...

पेपर लीक पर बढ़ते बवाल के आगे झुकी सरकार, धर्मेंद्र प्रधान ने दिया इस्तीफा………………….

इस्तीफे अक्सर राजनीतिक संदेश होते हैं, करियर का अंत नहीं………………

by UB India News
July 27, 2026
0

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के आंदोलन के बाद अंतत: शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना...

Next Post
आफताब जैसों को छोड़ क्यों नहीं पातीं लड़कियां?

आफताब जैसों को छोड़ क्यों नहीं पातीं लड़कियां?

प्रचंड क्यों राष्ट्रपति प्रणाली चाहते हैं?

प्रचंड क्यों राष्ट्रपति प्रणाली चाहते हैं?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

  • front
  • Home
Contect Us - ubindianews@gmail.com

© 2020 ubindianews.com - All Rights Reserved ||

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password? Sign Up

Create New Account!

Fill the forms below to register

All fields are required. Log In

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In
No Result
View All Result
  • front
  • Home

© 2020 ubindianews.com - All Rights Reserved ||

Send this to a friend