पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने दशकों पुराने जेल मैनुअल में युगांतकारी बदलाव करते हुए समूचे देश के समक्ष एक बड़ी नजीर पेश की है। बदलाव की इस आहट से देश के दूसरे हिस्सों में भी क्रांतिकारी बदलाव की अपेक्षा है। जेल प्रतिबंधों में ढील देते हुए सजायाफ्ता महिला कैदियों को स्वाभिमान और स्वतंत्रता से जीने का हक दिया जाना निश्चित ही स्वागत योग्य और प्रशंसनीय है। नये बदलावों के तहत अब महिलाएं न केवल मंगलसूत्र पहन सकेंगी‚ बल्कि सजा के दौरान पैदा हुए अपने बच्चों के जन्म पर उनका नामकरण संस्कार भी कर सकेंगी। १९४१ में बने इस जेल मैनुअल में राजे–राजवाड़ों के समय से जुड़ी सभी व्यवस्थाओं को खत्म करते हुए कुछ और भी साहसी कदम उठाए गए हैं। मसलन‚ सजा के दौरान मनपसंद कपड़े पहनने‚ बालों में शैंपू करने‚ मन चाहा हेयर स्टाइल बनाने‚ साड़ी की जगह सलवार–सूट पहनने‚ बच्चों के लिए क्रेच और चिल्ड्रन पार्क शुरू करने‚ बच्चों को शैंपू और नारियल तेल देने‚ खाना पकाने के लिए रिफाइंड तेल देने‚ बेकरी और लॉन्ड्री की व्यवस्था‚ दांतों की सफाई के लिए टूथ पेस्ट आदि जैसे बड़े कदमों ने कुपरंपराओं की वषाç पुरानी संकीर्ण व्यवस्था को ध्वस्त किया है। उत्तर प्रदेश सरकार की आधुनिक और सकारात्मक सोच ने अन्य जेलों के लिए नये रास्ते तैयार किए हैं। निश्चित ही सालों से कारावास काट रहीं मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुकी महिलाओं की बेहतरी के लिहाज से वर्षों पहले ऐसे कदमों पर विचार किया जाना चाहिए था। बहरहाल‚ देर आयद‚ दुरु स्त आयद। जेलों के आधुनिकीकरण से हर स्तर पर सुधार होने की संभावना है। अगर देश भर की जेलों में महिला कैदियों की मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो उनकी स्थिति बड़ी दयनीय नजर आती है। सजायाफ्ता गर्भवती महिला कैदियों से लेकर सामान्य महिला कैदियों की स्थिति भी असंतोषजनक है। राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत की १‚३३९ जेलों में १‚७३२ महिला कैदी अपने १‚९९९ बच्चों के साथ रह रही हैं। इन महिला कैदियों में १‚३७६ अंडरट्रायल हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश में कुल महिला जेलों की संख्या केवल २४ हैं। कई राज्यों में तो एक महिला जेल से ही काम चलाया जा रहा है‚ जहां बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। रिपोर्ट बताती है कि २०१८–१९ में पूरे देश में कैदियों पर १‚७७६ करोड़ रु पये खर्च किए गए जो कुल खर्च का ३३.६१ प्रतिशत ही है। स्पष्ट है कि कारावासों में महिला कैदियों की जरूरतें और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं लचर वित्त प्रबंधन की शिकार हैं। महिला कैदी किसी प्रकार की कुव्यवस्था की शिकार न हों और सम्मान से जेलों में समय बिताएं‚ इसके लिए देश भर की जेलों में व्यवस्था परिवर्तन की तत्काल जरु रत है। विषेशकर गर्भवती महिलाओं के लिए तत्काल काम किए जाने की आवश्यकता है। बेहतर होगा कि दूसरे राज्य भी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर अपने पुराने जेल मैनुअल में बदलाव लाएं और महिला कैदियों की मुश्किलें आसान करें। राज्य बाल संरक्षण आयोग उनके बच्चों की पढ़ाई–लिखाई और भरण–पोषण का जिम्मा उठाएं। मानसिक पीड़ा से गुजर रहीं महिला कैदियों की बेहतरी के लिए बेहतर परामर्शदाताओं की व्यवस्था और अन्य समेकित प्रयासों से उनकी स्थिति में सुधार लाया जा सकता है। आखिर‚ वे भी उतनी ही सुविधा और लाभ पाने की हकदार हैं‚ जितने देश के अन्य सामान्य नागरिक।
अमेरिका-ईरान तनाव के बीच वैश्विक संकट पर पीएम मोदी ने बुलाई अहम बैठक,
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