पर्यावरण को लेकर देश की सबसे एक्टिव‚ सख्त और संवेदनशील संस्था राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) अपने हालिया कार्रवाई को लेकर चर्चा में है। पिछले हफ्ते ही (३ सितम्बर) को प्राधिकरण ने पश्चिम बंगाल सरकार पर ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन में विफल रहने के कारण ३‚५०० करोड़ रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया। प्राधिकरण ने दलील दी कि पश्चिम बंगाल सरकार ने शहरी क्षेत्रों में ठोस और मलजल उपचार संयंत्रों को प्राथमिकता देने में खास पहल नहीं की है। इसके ठीक दो दिन बाद ही प्राधिकरण ने फिर कड़़ा रुख दिखाया और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का दोषी करार देते हुए महाराष्ट्र सरकार पर १२‚००० करोड़़ का जुर्माना लगाया है। देखना है कि महाराष्ट्र सरकार दो महीने के भीतर इस जुर्माने की राशि को जमा करा पाती है या नहीं।
इन दो घटनाओं से देश में पर्यावरण को लेकर सरकार और विशेष तौर पर पर्यावरण को लेकर गठित संस्थाओं की सतही भूमिका का पता चलता है। हालांकि प्राधिकरण के खाते में कमोबेश हर दूसरे हफ्ते जुर्माना लगाया जाता है‚ मगर न तो सरकार को पर्यावरण की पड़़ी है न संस्थाओं को। उल्टे प्राधिकरण के एक्शन पर उनकी प्रतिक्रिया शिथिल रहती है। यही वजह है कि आज देश से लेकर दुनियाभर में प्रदूषण और मौसम के विकराल स्वरूप चर्चा के केंद्र में हैं। चाहे अमेजन के जंगल में आग लगने की घटना हो या बेंगलुरू–हैदराबाद–केरल में भारी बारिश और भीषण बाढ़ जैसे हालात हों। विश्व भर में चाहे वह मनुष्य हों या जीव–जंतु; मौसम के एकाएक बदलते तेवर ने सभी को हलकान कर रखा है। जीव–जंतुओं से लेकर पक्षी जगत हर कोई अपने अस्तित्व की लड़़ाई लड़़ रहा है। प्राधिकरण की इस बात से भी किसी को फर्क नहीं पड़़ता है कि स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों से लापरवाही नाकाबिले बर्दाश्त है। साथ ही प्रदूषण मुक्त वातावरण राज्य और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है।
एक तरफ गणपति उत्सव समेत कई अन्य पर्व–त्योहारों में पर्यावरण बचाने की अपील की जाती है‚ वहीं सरकारी तंत्र पर्यावरण की रत्ती भर भी परवाह नहीं करते हैं। ऐसे में एनजीटी का भारी–भरकम जुर्माना लगाना भी एकतरफा कार्रवाई होकर रह जाता है। क्या इस लापरवाह आचरण से पर्यावरण को शुद्ध और साफ रखा जा सकता हैॽ चिंताएं तो कई सारी हैं‚ मगर इससे बाहर निकलना किसी को नहीं सूझ रहा है।







