विरोधियो! भूले से ही सही‚ कभी तो मोदी जी का भी समर्थन कर देते! अब बताइए‚ मोदी जी सेंट्रल विस्टा तोड़कर दोबारा बनवाए‚ तो भाई लोगों तो तोड़कर नया बनवाने पर आपत्ति थी। कहते थे कि यह तो फिजूलखर्ची है–कोविड के टैम में तो सौ टका फिजूलखर्ची है। और अब राजपथ को नाम बदलकर‚ करीब–करीब मुफ्त में कर्तव्यपथ कराए हैं‚ तो भाई लोगों को उस पर भी आब्जेक्शन है। गुलामी की एक निशानी मिटाने पर भी हुज्जत–कहते हैं कि गुलामी की निशानी तो अंगरेजी का किंग्सवे था‚ बेचारा हिंदी का राजपथ गुलामी की निशानी कैसे हो गया!
खैर! इन विरोधियों के आब्जेक्शन करने से मोदी जी रुकने वाले नहीं हैं। ७५वीं सालगिरह पर लाल किले से वह तो बाकायदा एलान भी कर चुके हैं कि गुलामी की कोई निशानी अब नहीं छोड़ेंगे। गुलामी की एक–एक निशानी को चुन–चुनकर वैसे ही देा से बाहर निकालेंगे‚ जैसे शाह जी ने कभी बांग्लादेशी घुसपैठियों को चुन–चुनकर निकालने का एलान किया था! नाम बदलकर‚ हिंदी के नामों की ओट में छुपने की कोशिश कर रही गुलामी की निशानियों को भी बख्शा नहीं जाएगा। सेंट्रल एसेंबली गुलामी की निशानी थी‚ नाम बदलकर संसद भवन का नाम रखवा लिया‚ फिर भी मोदी जी की पैनी नजरों से छुप नहीं पाईः मोदी जी नई संसद बनवा रहे हैं कि नहीं। सेंट्रल हाल का तो खैर‚ नामो–निशान ही मिटा दिया। जार्ज पंचम की छतरी ने जार्ज पंचम की मूर्ति हटवाकर‚ खाली छतरी बनकर बचने की कोशिश की‚ पर बच नहीं पाई। जार्ज पंचम की छतरी के नीचे सुभाष बाबू बसाए जा चुके हैं। फिर भला नाम बदलकर राजपथ कर लेने की आड़ में‚ गुलामी का निशान रहा किंग्सवे‚ मोदी जी के गुलामी निशान मिटाओ अभियान से कैसे बच जाता। वह तो डॉ. आंबेडकर के नाम ने पंगा डाल दिया‚ वर्ना मिटाई जाने वाली गुलामी की निशानियों की लिस्ट में संविधान भी कब चढ़ जाना था। खैर‚ पूरा संविधान न सही‚ सेकुलरिज्म‚ फेडरलिज्म‚ डेमोक्रेसी वगैरह; गुलामी से लड़ाई की निशानियां तो मिटाई ही जा रही हैं। आखिर‚ निशानियां तो ये भी गुलामी की ही हुइ! और प्लीज यह कोई न कहे कि राजपथ का नाम कर्तव्यपथ करने में ही‚ मोदी जी अपने कर्तव्य की इति मान लेंगे। कर्तव्य–पथ बनाया है‚ कर्तव्य–स्मारक नहीं।







