इंसान का सबसे वफादार जानवर माना जाता है। इसलिए कई घरों में वो परिवार के सदस्य की तरह पलता है। शहरी संस्कृति बढ़ने के साथ कुत्ता पालने का शौक भी परवान चढ़ा है। महानगरों की रिहायशी सोसाइटीज में तो यह स्टेटस सिंबल बन चुका है। श्वान प्रेम में तो कुछ लोग इस कदर डू़ब जाते हैं कि उन्हें इंसान से ज्यादा तरजीह देने लगते हैं। हाल की दो घटनाएं सुर्खियों में है।
पहली घटना लखनऊ में घटी‚ जहां जुलाई में ‘पिटबुल’ नस्ल के कुत्ते ने घर की मालकिन (८०) की जान ले ली। इसके बावजूद महिला के बेटे का कुत्ते के प्रति लगाव हैरान करने वाला था। बेटे ने कुत्ते को नगर निगम से वापस लाने के लिए सभी प्रयास किए। वहीं दूूसरी घटना गाजियाबाद की है‚ जहां लिफ्ट में एक कुत्ता बच्चे को काट लेता है। इसके बावजूद कुत्ते की मालकिन संवेदनहीन बनी रहती है। वीडि़यो वायरल होने के बाद इस घटना की बेहद तीखी प्रतिक्रिया हुई। महिला के खिलाफ रिपोर्ट भी दर्ज हुई। लगातार ऐसी घटनाओं के बाद कुत्ता पालने को लेकर कई सवाल भी उठ खडे हुए हैं। दरअसल‚ समस्या जिम्मेदारी और नियम के उलट चलने के कारण पैदा हुई है। जागरूकता की कमी भी कह सकते हैं। उदाहरण के लिए; कुत्ते का पंजीकरण‚ जिससे लोग अमूमन अनजान रहते हैं और निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करते। इसकी वजह से कुत्ते दूसरों के लिए समस्या बन जाते हैं। सार्वजनिक जगहों पर उनके द्वारा की गई गंदगी असहज करती है। विवाद भी होते हैं। दुर्भाग्य से नियम–कायदे की अनदेखी नागरिक समाज का अटूट हिस्सा बन चुकी है। यह आदत कुत्ते पालने में भी दिखती है। बहरहाल‚ गाजियाबाद की घटना के बाद कुत्ता पालने वाले लोगों पर निगरानी जरूरी है। हमारे आसपास जो लोग हैं उन्हें पालतू जानवरों के रखरखाव की कानूनी प्रक्रिया के बारे में बताना हर किसी की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद अगर संबंधित व्यक्ति ध्यान नहीं दे रहा तो उसकी शिकायत करने में पीछे नहीं हटना चाहिए। इसके अलावा आरडब्ल्यूए द्वारा सख्त निगरानी सबसे अहम है। पालतू जानवरों के मालिकों को भी दूसरों की सहूलियत का ध्यान रखने की जरूरत है। थोड़़ी सी जानकारी उन्हें किसी अप्रिय स्थिति से बचा सकती है। आखिर में यह बात ध्यान रखने योग्य है कि किसी जानवर से लगाव अच्छी बात मगर इंसानी भाव को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। गाजियाबाद जैसी घटनाएं बताती हैं कि इंसान विकास क्रम में एक पायदान नीचे आया है।







