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ममता, नीतीश, केजरीवाल… विपक्ष की मजबूती ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी!

UB India News by UB India News
September 5, 2022
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ममता, नीतीश, केजरीवाल… विपक्ष की मजबूती ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी!
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2024 लोकसभा चुनाव के लिए पक्ष-विपक्ष की जोर-आजमाइश जारी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार विपक्षी एकता की मुनादी कर रहे हैं। वो हाल ही में पक्ष से विपक्ष में गए हैं। बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार गिराकर नीतीश ने राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस पार्टी एवं वाम दलों के साथ मिलकर नई सरकार बनाई है। एनडीए की जनक बीजेपी का कहना है कि नीतीश के अंदर फिर से प्रधानमंत्री का बनने का ख्वाब जगा है इसलिए उन्होंने फिर से पलटी मारी है। उधर, विपक्ष की सबसे मुखर नेता ममता बनर्जी उप-राष्ट्रपति चुनाव के वक्त से ही अलग रूप में दिख रही हैं। विपक्ष की झंडेबरदार की भूमिका निभाने को आतुर ममता ने अचानक रणनीति बदलकर सबको चौंका दिया है। अब वो विपक्ष में भी ‘एकला चलो रे’ की नीति पर आगे बढ़ती दिख रही हैं। खुद को कांग्रेस से अलग रखने की मंशा तो वह पहले से दिखा ही रही थीं। उधर, दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के घर सीबीआई का छाप पड़ा तो आम आदमी पार्टी (AAP) दावे करने लगी कि 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अरविंद केजरीवाल से कड़ी टक्कर मिलने वाली है, इसलिए हमारा मनोबल तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे में लगता नहीं है कि तमाम प्रयासों के बावजूद इस बार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष का कोई संयुक्त उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारा जा सकेगा। तो सवाल है कि क्या चुनाव बाद परिस्थितियां बनीं तब भी विपक्षी कुनबा एकजुट हो पाएगा? याद कीजिए वर्ष 1996-97 में संयुक्त मोर्चा का जन्म तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के बहुमत परीक्षण में फेल होने के कारण पैदा हुई परिस्थितियों में ही हुआ था।

पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष की दो बातों से विपक्ष परेशान
प. बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी भी बाकी विपक्षी दलों की तरह मानती हैं कि बीजेपी भारत को विपक्ष मुक्त बनाने में जुटी है। केंद्रीय एजेंसियों की जांच की आंच उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी और बहु रुचिरा बनर्जी तक पहुंची हुई है। पार्टी के दिग्गज नेता और ममता की खासमखास पार्थ चटर्जी नोटों के भंडार मिलने के बाद जेल में हैं। उधर, महाराष्ट्र, बिहार से लेकर दिल्ली तक, हर जगह विपक्ष में बैठे क्षेत्रीय दलों के कई बड़े नेता या तो जेल में हैं या उन्हें जेल का डर सता रहा है। फिर क्षेत्रीय दलों की ही बात क्यों, छह दशक से ज्यादा देश पर राज करने वाली कांग्रेस पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी और पार्टी के पूर्व प्रमुख राहुल गांधी की प्रवर्तन निदेशालय (ED) में पेशी हो चुकी है। विपक्षी नेताओं पर जांच एजेंसियों के कसते फंदे के बीच सत्ता पक्ष के दो शीर्ष नेताओं के बयानों ने विपक्षी खेमे में खास खलबली मचा रखी है। याद कीजिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्रचीर से ऐलान किया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उनका अभियान जोर पकड़ेगा। दूसरा बयान बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा (जेपी नड्डा) की तरफ से बिहार की राजधानी पटना में आया था। उन्होंने कहा, ‘सभी क्षेत्रीय दल खत्म हो जा रहे हैं। जो नहीं खत्म हुए, वो जल्द ही खत्म हो जाएंगे। बचेगी तो सिर्फ भारतीय जनता पार्टी।’

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विपक्ष मुक्त बनाम बीजेपी मुक्त भारत की तैयारी
विपक्ष इन बयानों पर ऐतबार नहीं करे तो क्यों? आखिर जमीन पर ऐसा ही होता दिख भी रहा है। 2019 में मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के बाद से ही विपक्षी दल अपने ऊपर हर वक्त लटकती तलवार महसूस कर रहे हैं। वहीं, कर्नाटक, मध्य प्रदेश से होकर अभी झारखंड तक पहुंचा ऑपरेशन लोटस भी नड्डा की कथनी का ही प्रमाण दे रहा है। आखिर बिहार में भी नीतीश कुमार ने तो इसी ऑपरेशन लोटस का हवाला देकर ही तो पलटी मारी। उन्होंने दावा किया कि केंद्र में मंत्री रहे रामचंद्र प्रसाद सिंह (आरसीपी सिंह) के जरिए उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड (JDU) को ही तोड़ने की कोशिश हो रही थी। नीतीश ही नहीं, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी कहा कि नड्डा ने बीजेपी की मंशा जता दी, क्षेत्रीय दलों के सफाये का अभियान चल रहा है जिसमें केंद्रीय एजेंसियों की मदद ली जा रही है। टीएमसी नेता सुखेंदु शेखर राय ने शनिवार को कहा कि विपक्षी दलों ने एकजुट होकर ‘बीजेपी मुक्त भारत’ का अभियान नहीं चलाया तो ‘विपक्ष मुक्त भारत’ करने में बीजेपी को दिन-ब-दिन सफलता मिलती रहेगी। उनका कहना है कि केंद्रीय एजेंसियां और ऑपरेशन लोटस के दो हथियारों से एक-एक कर समूचे विपक्ष का कत्लेआम हो जाएगा। हालांकि, टीएमसी पीएम कैंडिडेट को लेकर विपक्षी दलों के साथ एकजुटता दिखाएगी, इसकी संभावना नहीं के बराबर ही दिख रही है।

अंदरूनी उठापटक में उलझी कांग्रेस
जहां तक बात कांग्रेस पार्टी की है तो उसमें अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए भी घमासान मचा है। कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद समेत अनेक दिग्गज नेताओं के पार्टी छोड़ने के बीच पार्टी चीफ के चुनाव के लिए मतदाता सूचि सार्वजनिक करने की मांग जोर पकड़ रही है। शशि थरूर ने बाकायदा पत्र लिखकर इस मांग का समर्थन किया है। अंदरूनी अनबन के बीच कांग्रेस अपनी ताकत जुटाने की कोशिश करती दिखना चाहती है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी से ईडी की पूछताछ के वक्त देशभर में कांग्रेसियों के प्रदर्शन ने पार्टी नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया था। देशभर में संदेश गया कि पार्टी अब गांधी परिवार के हित साधन का औजार बनकर रह गई है, अगर उसे आम जनता की फिक्र होती तो महंगाई, बेरोजगारी जैसे सुलगते सवालों पर भी सड़कों पर आंदोलन होते ना कि जुबानी जमा खर्च किया जाता। इस धारणा को मिटाने की ही कोशिश के तहत ही सही, लेकिन पार्टी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में महंगाई के खिलाफ बड़ी रैली का आह्वान किया है। उधर, राहुल गांधी ‘भारत जोड़ो अभियान’ की सफलता का मजबूत आधार बनाने में जुटे हैं।

विपक्षी एकता दूर की कौड़ी
ये सब तो ठीक है, लेकिन सवाल फिर घूम-फिरकर वहीं आ जाता है कि क्या विपक्ष एकजुट हो पाएगा? हमारे सहयोगी अखबार द इकनॉमिक टाइम्स (ET) में छपी खबर के मुताबिक, ममता बनर्जी संदेश दे रही हैं कि वो 2024 का लोकसभा चुनाव अकेले दम पर लड़ेंगी क्योंकि वो प्रधानमंत्री बनने की लंबे समय से पल रही महत्वाकांक्षा को अब और नहीं दबाना चाहतीं। उधर, राजनीति के जानकार भी बीजेपी के इस दावे का समर्थन करते हैं कि नीतीश के अंदर खुद के पीएम मैटेरियल होने का भाव फिर से उफान मारने लगा, इसलिए ही उन्होंने पाला बदला है। ऐसा है तो निश्चित तौर पर नीतीश कुमार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है वो ममता बनर्जी या किसी और शख्सियत के आगे करके खुद पीछे खड़े होंगे। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) तो मोदी विरोधी खेमे का नेतृत्व करने से नहीं हिचक रहे, लेकिन उनके सामने उहापोह की ऐसी स्थिति है कि आखिर वो करें तो क्या। एक तो खुद उनके अंदर भी पीएम कैंडिडेट बनने की प्रबल भावना है। अगर वो अपने नाम पर सहमति नहीं बनते देखकर उदारता भी बरतें तो किसका पक्ष लें? यही वजह है कि पटना में नीतीश से मुलाकात के बाद मीडिया के सवालों पर केसीआर ने नीतीश को समर्थन देने की बात नहीं की। उन्होंने सवाल पूछने वाले पत्रकार से ही पूछ डाला, ‘मैं कौन होता हूं पीएम कैंडिडेट की घोषणा करने वाला?’ नीतीश भी केसीआर के इस रुख से खुश नहीं होंगे, लेकिन एक मंझे नेता के तौर पर उन्हें केसीआर की असमंजस भी समझ आ रही होगी। फिर, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजीरवाल की दावेदारी भी तो है। विपक्षी एकता की राह में ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल के रूप में दो अड़ंगे तो अभी साफ-साफ दिख रहे हैं।

संयुक्त मोर्चा बनने की नौबत आए तब तो
तो क्या विपक्ष चुनाव से पहले एकजुट नहीं भी हुआ तो बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खेल बिगाड़ने में सफल हो पाएगा? अगर उसने एनडीए और मुख्य रूप से बीजेपी को 272 का जादुई आंकड़ा लाने से रोकने में सफलता पा ली तो क्या चुनाव बाद गठबंधन (Post poll alliance) की संभावना बनेगी? आप कह सकते हैं कि बच्चा हुआ नहीं, उससे पहले खिलौने के चयन पर बहस हो रही है। राजनीति संभावनाओं का खेल है, इसलिए विचारों के घोड़े हर दिशा में दौड़ाने पड़ते हैं। नेता भी हर संभावित परिस्थिति की कल्पना करते हैं, इसलिए सटीक आकलन के लिए भविष्य की संभावनाओं पर हर तरह से विचार करना लाजिमी है। नीतीश के विपक्षी खेमे में जाने के बाद दावा किया जा रहा है कि बीजेपी को आगामी लोकसभा चुनाव में 2019 के मुकाबले अच्छा-खासा झटका लगेगा। जेडीयू अध्यक्ष ललन सिंह ने तो यहां तक दावा किया कि बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल, इन तीन राज्यों में ही बीजेपी की 40 सीटें घट जाएंगी। उनके दावों को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। मसलन, महाराष्ट्र में बीजेपी की सीटें बढ़ने के पूरे आसार हैं और वहां लोकसभा की 48 सीटें हैं। उधर, बीजेपी दक्षिण के द्वार खोलने पर भी पूरा जोर दे रही है। खैर, क्या होगा, क्या नहीं, वह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन विपक्ष के सामने सवाल है कि क्या जो नेता चुनाव से पहले एकजुट नहीं हो पाएंगे, वो ‘बीजेपी मुक्त भारत’ के बड़े लक्ष्य के लिए चुनाव बाद अपनी-अपनी महत्वकांक्षाओं को दरकिनार कर देंगे?

चुनाव बाद मौका मिला तब भी एकजुट होगा विपक्ष?
दरअसल, 1996 की संयुक्त मोर्चा सरकार का उदाहरण इस बात की आस जगाता है कि चुनाव पूर्व गठबंधन बन पाने में नाकामयाबी भी चुनाव बाद कामयाबी में बदल सकती है। याद कीजिए 1996 में बीजेपी 161 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। अटल बिहार वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ भी ले ली, लेकिन बहुमत परीक्षण में पास नहीं हो पाए। उनकी सरकार 13 दिनों में ही गिर गई। तब जनता दल के एचडी देवगौड़ा को कांग्रेस और वाम दलों ने बाहर से समर्थन देकर नई सरकार बनवा दी। समाजवादी पार्टी (सपा), द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके), असम गण परिषद (एजीपी), तमिल मनीला कांग्रेस (टीएमसी), तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) जैसी पार्टियां भी संयुक्त मोर्चे का हिस्सा थीं। वह अलग बात है कि कांग्रेस तुरंत रूठ गई और देवगौड़ा को हटाकर इंद्र कुमार गुजराल (आईके गुजराल) को पीएम बनाया गया। उनका कार्यकाल भी महज एक साल ही रहा और 1998 में लोकसभा चुनाव हो गया। तब अटल बिहारी की 13 महीने की सरकार चली थी। फिर सुब्रमण्यन स्वामी के प्रयासों से सोनिया गांधी और एआईएडीएमके की तत्कालीन प्रमुख जे. जयललिता के बीच बैठक में ऐसा सियासी खेल हुआ कि वाजपेयी सरकार महज एक वोट के अंतर से विश्वास मत हार गई।

क्या इस बार खुल जाएगा विपक्ष की किस्मत का ताला?
यह कहना नहीं होगा कि 2024 में संयुक्त मोर्चा जैसा गठबंधन बनने की संभावना तभी बन सकती है जब बीजेपी अकेले दम पर 272 के आसपास नहीं पहुंच सके। तो क्या यह संभव है? आइए इसकी भी पड़ताल कर लेते हैं। दरअसल, 2019 के पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अकेले दम पर 37.38% मत मिले जिसने उसे 303 सीटें दिलाईं। 2014 के चुनाव के मुकाबले बीजेपी को मत प्रतिशत के मामले में 6.38 जबकि सीटों के आंकड़े में 21 का इजाफा हुआ था। तो क्या इस बार बीजेपी की स्थिति 2014 से भी खराब हो जाएगी? विपक्षी दलों को लगता है कि बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी की समस्या गंभीर रूप धारण कर रही है जिससे आम जनता का मन बदलने लगा है। हालांकि, ये मुद्दे राज्य विधानसभा के चुनावों में बहुत हावी होते नहीं दिख रहे। विपक्ष को लगता है कि उसकी संयुक्त ताकत बीजेपी के करीब-करीब ढाई गुना है। बीजेपी को अधिकतम करीब 38% वोट 2019 के चुनाव मे मिले हैं। अब एनडीए का कुनबा लगभग बिखर चुका है। महाराष्ट्र में रामदास आठवले की रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) और उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल का अपना दल जैसे सीमित जनाधार वाली पार्टियां ही एनडीए में बच गई हैं। मतलब साफ है कि करीब-करीब 60% मतदाताओं ने बीजेपी या एनडीए का समर्थन नहीं किया था। यही उम्मीद विपक्ष को बार-बार एकजुटता की याद दिलाता है, लेकिन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं हर बार इस बड़े लक्ष्य पर हावी हो जाती हैं। ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और अरविंद केजरीवाल के रूप में कम-से-कम तीन ध्रुव तो विपक्ष में दिख ही रहे हैं। इस पर कांग्रेस का रुख अपने आप में एक बड़ा सवाल है। सवाल यह कि क्या वह राहुल गांधी के सिवा किसी को प्रधानमंत्री स्वीकार कर पाएगी? फिलहाल तो यही लग रहा है कि ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल के रूप में विपक्ष की मजबूती ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी हैं।

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