इस बात में कोई शक–शुबहा नहीं है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस वक्त अपने सबसे खराब दौर में है। एक के बाद एक कई वरिष्ठ नेता पार्टी से ‘हाथ’ छुड़़ाकर दूसरी राजनीतिक पार्टी का दामन थाम रहे हैं। खासकर पिछले ५० वर्ष से पार्टी की सेवा करने वाले गुलाम नबी आजाद के पार्टी त्यागने के बाद अब यक्ष प्रश्न यही है कि क्या पार्टी फिर से वर्षों पुराना ओज और संकल्प शक्ति वापस पा सकेगीॽ सवाल बहुतेरे हैं‚ मगर जवाब मिलना शायद ज्यादा कठिन है। गांधी परिवार की होकर रह गई कांग्रेस को अब गैर गांधी परिवार से उसका अध्यक्ष मिलने की उम्मीद तो बंधी है‚ मगर इसमें भी कई किंतु–परंतु है। कांग्रेस कार्यसमिति की रविवार को हुई बैठक में सिर्फ अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर चर्चा हुई। १७ अक्टूबर को चुनाव की तरीख का ऐलान हुआ और १९ को नये अध्यक्ष के ऐलान की बात बताई गई। गांधी परिवार ने पहले ही यह कह रखा है कि वो अध्यक्ष का चुनाव नहीं लड़ेंगे। यानी यह तो तय है कि आने वाला अध्यक्ष गांधी परिवार से नहीं होगा। हां‚ दो वरिष्ठ नेताओं क्रमशः आनंद शर्मा और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। शर्मा ने जहां प्रदेशों में ब्लाक‚ जिला और राज्य स्तर पर एआइसीसी प्रतिनिधियों की सूची को लेकर शिकायतों का मुद्दा उठाया वहीं चव्हाण ने ‘कठपुतली अध्यक्ष’ यानी पर्दे के पीछे से पार्टी चलाने की किसी भी कोशिश को लेकर आशंका जाहिर की। साफ तौर पर अब पार्टी में नेतृत्व के खिलाफआवाज उठाने वाले सामने आने लगे हैं। हालांकि वरिष्ठ नेताओं की इस ‘आक्रामकता’ को आलाकमान किस नजरिये से देखता है‚ यह आने वाला समय ही बताएगा। खास बात यह है कि करीब २१ वर्ष के बाद पार्टी के अध्यक्ष पद को लेकर चुनाव होने जा रहा है। २००१ में जितेंद्र प्रसाद ने सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़़ा था। एक नाम राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का चर्चा में है। देखना है‚ गहलोत या गांधी परिवार इसे लेकर कितनी गंभीर है। कुल मिलाकर कांग्रेस की २०१४ के बाद की सुस्ती और चुनाव–दर–चुनाव शिकस्त खाने के कारण पार्टी का आत्मविश्वास लस्त–पस्त हो गया है। देखना है‚ दिवाली से पहले नया अध्यक्ष पाने के बाद देश पर वर्षों शासन करने वाली पार्टी का खेवनहार कौन होता हैॽ
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