बिहार वालो‚ इतनी चीटिंग भी ठीक नहीं है। मोदी जी ने अमृतकाल के हिस्से के तौर पर क्विट इंडिया की जरा सी उंगली क्या पकड़ा दी‚ भाई लोगों ने क्विट–क्विट करते–करते‚ बेचारों को बिहार सरकार से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब बताइए‚ कहां फिरंगियोंवाला क्विट इंडिया और कहां भगवाइयों वाला क्विट बिहार और वह भी अमृतकाल में। है दोनों में कोई समानताॽ पर बिहारियों में समानता देखने का धीरज कहां। बस क्विट–क्विट सुना और आव देखा न ताव भगवाइयों से क्विट बिहार सरकारे करा दिया। नीतीश बाबू से ये उम्मीद नहीं थी!
माना कि बिहार वाले क्विट इंडिया को कुछ ज्यादा ही भाव देते हैं। अंगरेजों के टैम वाले क्विट इंडिया में बिहार वाले सबसे आगे जो थे। ‘करो या मरो’ की पुकार करने के बाद नेता तो जेलों में बैठा दिए गए‚ पर पब्लिक नेताओं को छुड़ाने से ज्यादा जोरों से अंगरेजी राज से देश छुड़ाने में जुट गई। खासतौर पर बिहारियों और तब के यूपी के पुरबियों ने तो महीनों अंगरेजों की नाक में दम किए रखा। अंगरेजों से फौरन भारत भले ही नहीं छुड़ाया जा सका हो‚ पर बिहारियों ने उन्हें दौड़ा–दौड़ाकर‚ उनका दम फुलवा दिया। अब बेचारे भगवाइयों को इस सब हिस्ट्री का पता होता भी तो कैसेॽ वे बेचारे तो तब अंगरेजों को अच्छा बच्चा बनकर दिखाने में लगे हुए थे। उनके चचा वीर सावरकर तो तब लीग के साथ बंगाल‚ सिंध‚ एनएफडब्ल्यूपी में सरकार चलाने में बिजी थे। और तब तो बेचारों के पास ट्रोल सेना भी नहीं थी। उन्हें कैसे पता चलता कि बिहारी क्विट इंडिया को अब तक दिल से लगाए बैठे होंगे; क्विट इंडिया वाले दिनों पर यूं पगला जाएंगे।
जैसे तब छोड़ो–छोड़ो कर अंगरेजों के पीछे पड़े थे‚ तब अंगरेजों का साथ देने वालों से अब अमृतकाल में बिहार सरकार ही छुड़वाएंगे। क्या इन बिहारियों ने क्विट–क्विट करने के सिवा और कुछ सीखा ही नहीं हैॽ अंगरेजों का दिया आपस में लड़ो और मरो का मंत्र भी नहीं! बेचारे भगवाई तो हिंदुओं को बचाने के लिए नीतीश कुमार को सीएम के दफ्तर से क्विट कराने में लगे थे‚ पर बिहारियों ने तो उन्हें ही सरकार से क्विट करा दिया। उस पर तुर्रा ये है कि क्विट बिहार तो शुरुआत है‚ आगे क्विट इंडिया तब जाएंगे।







