स्वतंत्रता के अमृत वर्ष में एक आदिवासी महिला‚ द्रौपदी मुर्मू का भारत का राष्ट्रपति चुना जाना‚ न सिर्फ बहुत ही उपयुक्त है बल्कि भारतीय जनतंत्र की प्रतिष्ठा को भी बढ़ाता है। उनका चुनाव भारतीय जनतंत्र के समावेशीपन को दिखाता है‚ जहां अपनी सारी भिन्नता तथा विकास के मामले में पिछड़ेपन के बावजूद‚ आदिवासी समुदाय की एक महिला‚ देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच सकती है। पिछले कुछ वर्षो में भारतीय जनतंत्र के समावेशीपन के संबंध में जिस तरह के सवाल उठते रहे हैं‚ उन्हें देखते हुए‚ इस तरह के संदेश की इस समय बेशक जरूरत थी। मुर्मू की राष्ट्रपति पद के चुनाव में जीत तो‚ उनके एनडीए द्वारा उम्मीदवार बनाए जाने के साथ ही लगभग तय हो गई थी। बाद में ओडिसा‚ झारखंड तथा आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी पार्टियों समेत‚ एनडीए के बाहर की कई पार्टियों के समर्थन की घोषणा करने के बाद‚ राष्ट्रपति चुनाव‚ मुकाबले के बजाए औपचारिकता ही ज्यादा रह गया था। इसके बाद भी‚ औपचारिक रूप से उनका समर्थन न कर रही पार्टियों के भी अनेक सांसदों व विधायकों का भी समर्थन उन्हें मिला है। इसने सुश्री मुर्मू की जीत को न सिर्फ उम्मीद से भी बढ़कर प्रभावशाली बनाया है बल्कि उनकी राजनीतिक विभाजनों से उपर‚ सब के राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार्यता को भी आसान बनाया है। राष्ट्रपति की यह सर्वस्वीकार्यता‚ भारतीय जनतांत्रिक व्यवस्था के सुचारू रूप से काम करने के लिए बहुत जरूरी है। यही आखिरी दरवाजा है जिसे अपनी शिकायतें लेकर‚ विपक्षी दलों से लेकर आम नागरिक तक खटखटा सकते हैं। आम तौर पर जो यह समझा जाता है कि भारत के राष्ट्रपति का पद सिर्फ शोभा के लिए है‚ केवल इसी हद तक सच है कि भारत में कार्यपालिका का मुखिया‚ प्रधानमंत्री है‚ लेकिन राष्ट्रपति को सरकार बनाने की प्रक्रिया के अलावा भी‚ सरकार को परामर्श देने‚ समझाने–बुझाने का महत्वपूर्ण अधिकार होता है। इसलिए‚ आशा की जाती है कि नये राष्ट्रपति के रूप में मुर्मू स्वतंत्रता के इस अमृतकाल में भारतीय संविधान तथा उसके जरिए स्थापित धर्मनिरपेक्ष‚ जनतंत्र की हिफाजत के लिए और सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने के लिए‚ अपने प्रभाव का उसी प्रकार प्रयोग करेंगी‚ जैसे झारखंड के राज्यपाल पद पर रहते हुए उन्होंने आदिवासियों के भूमि अधिकारों के मामले में किया था। इस धारणा को झूठा साबित किया जाना ही चाहिए कि किसी दलित या आदिवासी के राष्ट्रपति पद पर पहुंचने से भी इन तबकों की वंचितता में कोई फर्क नहीं पड़ सकता है।
धरना-प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर की जगह कोई और स्थान हो?
सुप्रीम कोर्ट में आज दाखिल एक याचिका में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का मुद्दा भी उठ गया. दरअसल, याचिका में अपील...







