इसे कैसा लोकतंत्र मानेंगे आप? जहां आज के हालात में देश के किसी भी सदन में देश के सबसे बड़े और सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से अल्पसंख्यक वर्ग का एक भी प्रतिनिधि नहीं है।
मुख्तार अब्बास नकवी का राज्य सभा कार्यकाल खत्म होते ही संसद के दोनों सदनों में बीजेपी का एक भी मुस्लिम प्रतिनिधि नहीं रहा। इतना ही नहीं, वर्तमान में देश की किसी विधानसभा में बीजेपी का एक भी मुस्लिम सदस्य नहीं है। लोक सभा में तो पहले ही बीजेपी का कोई मुस्लिम प्रतिनिधि नहीं था, लेकिन राज्य सभा में कुल मिलाकर तीन मुस्लिम प्रतिनिधि थे।
इनमें से पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर का कार्यकाल 29 जून को और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद जफर इस्लाम का कार्यकाल चार जुलाई को समाप्त हो गया। मुख्तार अब्बास नकवी का कार्यकाल सात जुलाई को समाप्त हो गया। अब बीजेपी के पास पूरे देश में एक भी मुस्लिम सांसद या विधायक नहीं बचा है।
पार्टी के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है। यद्यपि मुस्लिमों को चुनावों में टिकट न देने की पार्टी की कोई घोषित और आधिकारिक नीति नहीं है। बीजेपी के पास इस समय 396 सांसद और 1,379 विधायक हैं, और इनमें से कोई भी मुस्लिम नहीं है।
वर्ष 2014 के लोक सभा चुनाव में पार्टी ने सात मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से कोई भी चुनावी सफलता पाने में विफल रहा था। 2019 के लोक सभा चुनाव में पार्टी ने छह मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। इनमें से भी कोई जीत नहीं पाया। मुस्लिम सांसदों और विधायकों के मामले में अन्य पार्टयिों का रिकॉर्ड भी काफी खराब है, लेकिन बीजेपी पर ज्यादा ध्यान इसलिए जाता है क्योंकि जनप्रतिनिधियों की संख्या के हिसाब से यह देश की सबसे बड़ी पार्टी है।
देश में करीब 15 फीसद यानी लगभग 20 करोड़ मुसलमान रहते हैं। यह देश का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय है। संसद में मुस्लिम सदस्यों का प्रतिनिधित्व 1970 और 1980 के दशक में नौ फीसद से ऊपर था। 2021 में यह घटकर पांच फीसद ही रह गया।
सत्ताधारी दल होने के नाते भाजपा की यह महती जिम्मेदारी है कि वह लोकतंत्र की भागेदारी में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व बढ़ाए। अब तो इस समुदाय में भी पार्टी की स्वीकार्यता बढ़ रही है। पिछले चुनावों में भाजपा की सफलता इस बात की तस्दीक करती है।







