कई महीनों से भीषण संकट और आवश्यक वस्तुओं की कमी का सामना कर रहे श्रीलंका के नागरिकों का धैर्य आखिरकार, शनिवार को जवाब दे गया। राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के इस्तीफे की मांग कर रहे उग्र प्रदर्शकारियों ने बैरिकेडिंग और सुरक्षा बलों की घेराबंदी तोड़ते हुए राष्ट्रपति भवन पर धावा बोल दिया। सुरक्षा बलों ने उग्र भीड़ पर आंसू गैस के गोले दागे लेकिन उग्र भीड़ पीछे नहीं हटी और उसने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर लिया। उग्र भीड़ और सुरक्षा बलों के बीच झड़प में अनेक लोग घायल हुए। इस बीच राष्ट्रपति गोटबाया राष्ट्रपति भवन छोड़कर भाग निकले।
बताया गया है कि उन्होंने सेना मुख्यालय में शरण ली है, जहां से सूचना भिजवाई कि 13 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। देर शाम उग्र लोगों ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के आवास को आग लगा दी। इससे कुछ घंटे पहले ही विक्रमसिंघे पद से इस्तीफा देने की पेशकश कर चुके थे। गोटबाया की तरह उनके बड़े भाई और तत्कालीन प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को भी उग्र विरोध के चलते मई महीने में अपना आवास छोड़कर भागना पड़ा था। उन्होंने भी सैन्य अड्डे में शरण ली थी। बाद में गोटबाया ने उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटा कर हालात संभालने के लिए विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री नियुक्त किया था।
दरअसल, अनेक कारक रहे जिनके चलते आज श्रीलंका का हाल बेहाल हो गया है। बीते एक दशक के दौरान उसने जमकर कर्ज लिया और उसका दुरुपयोग किया। लोकप्रिय सरकार बनने के फेर में कर कटौती की जिससे अर्थव्यवस्था की कमाई में 30 फीसद से ज्यादा की गिरावट आई। कोरोना महामारी के दौरान श्रीलंका का पर्यटन क्षेत्र बुरी तरह चरमरा गया। पर्यटन श्रीलंका का विदेशी मुद्रा अर्जन करने वाला तीसरा सबसे बड़ा क्षेत्र है।
राजनीतिक भ्रष्टाचार ने भी अर्थव्यवस्था की जटिलताएं बढ़ा दीं। 2021 में खेती आग्रेनिक करने के फेर में रासायनिक खाद के इस्तेमाल पर रोक लगा देने से एकाएक कृषि उत्पादन गिर गया। कह रहे हैं कि चीन के कर्ज श्रीलंका पर भारी पड़ा, लेकिन यह आंशिक तथ्य है क्योंकि श्रीलंका पर कुल विदेशी कर्ज का 10 फीसद ही चीन से लिया गया है। गोटबाया एक समय बेहद लोकप्रिय नेता थे लेकिन एकाएक खलनायक बन गए। इसलिए कि जनता लोकलुभावन फैसलों से भले ही कुछ समय भ्रमित पड़े लेकिन उसके लिए महत्त्वपूर्ण यह होता है कि भ्रष्टाचार से दूर रहते हुए सरकार उससे किए विकास के वादों को पूरा करे।







