अगले महीने होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए सियासी गहमागहमी तेज हो गई है। ज्ञातव्य है कि राष्ट्रपति का चुनाव 18 जुलाई को होना है। एक तरफ भाजपा ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के घटक दलों के साथ विपक्षी दलों से उम्मीदवार के संबंध में उम्मीदवार तय करने के लिए राजनाथ सिंह और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को अधिकृत किया है वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 15 जून को विपक्षी पार्टियों की बैठक बुलाई है।
हालांकि ममता की इस बैठक को लेकर खींचतान देखी जा रही है। आम आदमी पार्टी और शिवसेना ने बैठक को लेकर कोई खास संजीदगी नहीं दिखाई है। इसकी एक वजह 15 जून को ही कांग्रेस द्वारा विपक्षी दलों की बैठक का बुलाया जाना भी है। दरअसल, कांग्रेस और ममता बनर्जी में पिछले महीने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान उपजी कड़वाहट अभी भी बरकरार है।
भाजपा के लिए राहत की बात भी यही है। विपक्षी एकता में दरार का फायदा निश्चित तौर पर भाजपा उठाना चाहेगी। बढ़त के बावजूद राजग खेमे को कुछ दलों को अपने पाले में करने की जद्दोजहद करनी होगी। इसमें बीजू जनता दल (बीजद) और वाईएसआर कांग्रेस की भूमिका सबसे अहम होगी क्योंकि ये दोनों पार्टियां न तो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) का हिस्सा हैं न राजग का। अलबत्ता, कांग्रेस द्वारा बुलाई गई बैठक के बाद सही तस्वीर निकल कर आएगी। वैसे भी किसी भी पक्ष की तरफ से राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी का नाम का ऐलान नहीं हुआ है।
हालांकि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस की तरफ से खुद सोनिया गांधी ने जरूर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के प्रमुख शरद पवार के नाम पर सहमत होती दिख रही है। इस सिलसिले में आप नेता संजय सिंह ने शरद पवार से एक दिन पहले मुलाकात भी की है। इन सब कवायद के बावजूद अभी बहुत कुछ पर्दे के पीछे है। सियासी गोलबंदी का खुलकर प्रदर्शन एकाध दिनों बाद ही होगा। पवार का नाम जिस तरह से आगे आया है, उससे भाजपा को भी अपनी रणनीति बनाने या उसमें बदलाव करने को जरूर मजबूर किया है। वैसे उम्मीदवार तय करने से ज्यादा जरूरी उन दलों को अपने पाले में करने की होगी, जिनकी एक चाल से किसी भी गठबंधन का खेल बिगड़ या बन सकता है। फिलहाल इस हाईप्रोफाइल चुनाव का रोमांच बरकरार है।







