बिहार सरकार के अपने यहां जाति आधारित सामाजिक–आर्थिक सर्वेक्षण कराने के फैसले से देश में मंद पड़़ चुकी जातिगत जनगणना की बहस फिर शुरु हो गई। इसकी मांग करने वाला तबका जहां इसे प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी के सवाल से जोड़़ रहा है‚ वहीं विरोधी पक्ष इसे जाति की राजनीति से जोड़़ कर सख्त मजम्मत कर रहा है। बिहार ने यह कदम केंद्र द्वारा जातिगत जनगणना पर उदासीनता दिखाए जाने के बाद लिया है।
२०११ में तमाम दबावों के बावजूद केंद्र ने जातिगत जनगणना से इनकार कर दिया था। देश में अखिरी जातिगत जनगणना अंग्रेजीकाल में १९३१ में हुई थी। आजादी के बाद से समाज के दो सबसे कमजोर तबकों आदिवासियों और दलितों की गणना मुख्य जनगणना के साथ होती है। बिहार में मुख्य विपक्षी दल राजद द्वारा लगातार दबाव बनाए जाने के बाद अन्य दलों को भी साथ आना पड़़ा। दरअसल‚ गलत–सही लंबे विमर्श का विषय है। मूल सवाल यह है कि जो राजनीतिक एकता और तत्परता इस मसले पर दिखी वही गर्मजोशी विकास के मुद्दे पर क्यों नहीं दिखतीॽ ‘जाति तोड़ो अभियान’ चलाने वाले दिग्गज समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के शिष्यों के हाथ में बिहार का नेतृत्व बीते तीन दशकों से है। इसके बावजूद विकास के अधिकतर मानकों पर बिहार फिसड्ड़ी है। इसकी जिम्मेदारी किसकी बनती हैॽ ताजा पहल को इसी असफलता को छिपाने के तौर पर भी देखा जा रहा है। आकलन है कि इस मुद्दे को हिंदुत्व की राजनीति के काट के तौर पर इस दशक में इस्तेमाल किया जा सकता है। नब्बे के दशक की मंड़ल–कमंड़ल की राजनीति के तर्ज पर। भले सामाजिक न्याय की दुहाई देते हुए इसके पैरोपकार जो तर्क दें‚ लेकिन नीयत विशुद्ध राजनीतिक है। रोटी का आकार कैसे बड़़ा हो‚ यह चिंतन कहीं नहीं दिखता। रोटी के बंटवारे पर ही सारी ऊर्जा खर्च की जाती है। सर्वेक्षण के नतीजे आने के बाद राजनीतिक दलों का रवैया गौर करने वाला होगा। सामाजिक न्याय का सिद्धांत तो यही कहता है कि पिछड़े़–दलितों में जो अगड़े़ हो चुके हैं उन्हें बाकियों को आगे आने का मौका देना चाहिए। जातिगत जनगणना के नतीजे जटिल ना हों और समाज में पहले से व्याप्त विभाजन की रेखाएं चौड़़ी न हों; यह सबकी जिम्मेदारी है। करीब नब्बे साल बाद फिर से जाति गिनना समझदारी नहीं कही जा सकती। फिर भी एक आम राजनीतिक सहमति के बाद यह चीज हो रही है यह राहत की बात है।







