सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला आवारा कुत्तों के जीवन के लिए सार्थक साबित होगा‚ जिसके तहत उसने बृहस्पतिवार को अपना ही वह अंतरिम आदेश वापस ले लिया‚ जिसके तहत आवारा कुत्तों को खिलाने के अधिकार के संबंध में दिल्ली उच्च न्यायालय के २०२१ के फैसले पर रोक लगा दी गई थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने २०२१ में अपने फैसले में कहा था कि आवारा कुत्तों को भी भोजन का अधिकार है और नागरिकों को उन्हें (कुत्तों को) खिलाने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक गैर–सरकारी संगठन ‘ह्यूमन फाउंड़ेशन फॉर पीपल एंड़ एनिमल्स’ की याचिका पर इस फैसले पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इससे आवारा कुत्तों से आम लोगों के लिए खतरों की आशंका बढ़ेगी। न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित‚ न्यायमूर्ति एस. रवीन्द्र भट तथा न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया की पीठ ने इन दलीलों पर ध्यान दिया कि उच्च न्यायालय का आदेश एक दीवानी मामले में सुनाया गया था‚ जिसमें दो निजी पक्षकार आमने–सामने थे और एनजीओ को इस मुकदमे में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं था। पीठ के समक्ष यह तथ्य लाया गया था कि असली मुकदमे के दोनों पक्षकारों के बीच विवाद का निस्तारण हो चुका था‚ इसलिए तीसरे पक्ष के इशारे पर मुकदमे को जारी रखने की जरूरत नहीं थी। अदालत ने यह बात मान ली। अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने उल्लेख किया कि यह विशेष अनुमति याचिका दिल्ली उच्च न्यायालय के २४ जून २०२१ के फैसले के आधार पर दायर की गई है। चूंकि मूल वाद के दोनों पक्षकारों ने मामला सुलझा लिया था और मसला दो निजी पक्षों के बीच विवाद को लेकर था‚ इसलिए एक एनजीओ को एसएलपी दायर करने की अनुमति मांगने का कोई अधिकार नहीं था। इसलिए याचिका का निस्तारण करने के साथ ही अंतरिम आदेश वापस लिया जाता है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसले में कहा था कि आवारा कुत्तों को भी भोजन का अधिकार है और नागरिकों को सामुदायिक कुत्तों को खिलाने का अधिकार है। फैसला आवारा कुत्तों और इस काम में संलग्न पशुप्रेमियों के लिए अच्छा है‚ लेकिन यह भी सच है कि सभी लोग आवारा कुत्तों को पसंद नहीं करते। ऐसे दोनों पक्षों में कोई तनातनी न हो‚ यह सुनिश्चित करना होगा।
धरना-प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर की जगह कोई और स्थान हो?
सुप्रीम कोर्ट में आज दाखिल एक याचिका में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का मुद्दा भी उठ गया. दरअसल, याचिका में अपील...







