रंगों के त्योहार होली का सभी को इंतजार रहता है। इस पर्व पर दुश्मन भी गले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं। होली का त्योहार यूपी, बिहार सहित देश के कई राज्यों में धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के मथुरा में होली का पर्व कई दिन पहले से शुरू हो जाता है। लोग कभी फूलों की होली, अबीर-गुलाल व लठमार होली खेलते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। हालांकि इस साल लोगों के बीच होलिका दहन व होली की तारीख को लेकर असमंजस है। जानें क्या कहते हैं ज्योतिषाचार्य-
भद्राकाल में होलिका दहन नहीं करना चाहिए। इसके लिए भद्राकाल समाप्त होने का इंतजार करना चाहिए। होलिका दहन के लिए भद्रामुक्त पूर्णिमा तिथि जरूरी है। हिंदू धर्म में भद्रा को अशुभ माना जाता है। इस दौरान शुभ कार्यों की मनाही होती है।
ज्योतिषाचार्य के अनुसार, पूर्णिमा तिथि17 मार्च को दोपहर 01 बजकर 29 मिनट से शुरू होकर 18 मार्च दोपहर 12 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। भद्राकाल 17 मार्च को दोपहर 01 बजकर 20 मिनट से प्रारंभ हो जाएगा और देर रात 12 बजकर 57 मिनट तक रहेगा। भद्रा के समय होलिका दहन नहीं किया जा सकेगा। ऐसे में रात 12 बजकर 57 मिनट के बाद ही होलिका दहन संभव हो सकेगा।
होली 2022 कब है?
इस बार पूर्णिमा तिथि 17 मार्च से शुरू होकर 18 मार्च की दोपहर 12 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इसके बाद प्रतिपदा तिथि शुरू होगी। प्रतिपदा तिथि 19 मार्च को दोपहर 12 बजकर 13 मिनट तक रहेगी। कुछ लोग रंग वाली होली के लिए 18 मार्च का दिन शुभ मान रहे हैं। वहीं कुछ लोग उदया तिथि के हिसाब से 19 मार्च को रंग वाली होली खेलेंगे। कुछ जगहों पर 18 और 19 दोनों को रंग वाली होली खेली जाएगी।
रंगोत्सव के पर्व होली को लेकर लोगों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। इस बार होलिका दहन गुरुवार १७ मार्च को और चैत्र कृष्ण प्रतिपद शनिवार को हस्त नक्षत्र में है। वहीं‚ वृद्धि योग में धुरेड़़ी १९ मार्च को मनायी जायेगी। पंडि़तों का कहना है कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा दो दिन होने से ऐसी परिस्थिति बनी है। इस त्योहार को लेकर दोनों मिथिला और बनारसी पंचांग एकमत हैं। फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा १७ मार्च गुरुवार को दोपहर ०१ः१३ बजे से आरंभ हो रहा है‚ जो १८ मार्च शुक्रवार को दोपहर ०१०३ बजे तक रहेगा। होलिका दहन पूर्णिमा तिथि में रात के समय भद्रामुक्त काल में होता है। १७ मार्च की मध्यरात्रि बनारसी पंचांग के अनुसार १२ः५७ बजे और मिथिला पंचांग के मुताबिक रात्रि ०१ः०९ बजे तक भद्रा रहेगा‚ इसलिए होलिका दहन इसके बाद किया जाएगा। व्रत की पूर्णिमा १७ मार्च को और स्नान–दान की पूर्णिमा १८ को होगी। शास्त्रोचित मत से होली में लाल‚ पीला और गुलाबी रंग का प्रयोग करना चाहिए।
होलिका भस्म का होता है खास महत्वः पंडि़त गजाधर झा के अनुसार‚ होलिका दहन के भस्म को काफी पवित्र माना गया है। इस आग में गेहूं‚ चना की नई बाली‚ गन्ना को भूनने से शुभता का वरदान मिलता है। होली के दिन संध्या बेला में इसका टीका लगाने से सुख–समृद्धि और आयु में वृद्धि होती है। इसके साथ ही इस दिन ईश्वर से नई फसल की खुशहाली की कामना भी की जाती है। सेंक कर लाये गये धान्यों को खाने से काया हमेशा निरोग रहती है । घर मे माता अन्नपूूर्णा की कृपा बनी रहती है।






