भाकपा–माले विधायक दल के नेता महबूब आलम ने शनिवार को बयान जारी कर कहा है कि बिहार विधान मंडल में राज्यपाल का अभिभाषण और उपमुख्यमंत्री द्वारा पेश आर्थिक सर्वे झूठ का पुलिंदा है। एक बार फिर सरकर आंकडों की बाजीगरी के जरिए बिहार के सच को मानने से इनकार कर रही है। राज्य सरकार का दावा है कि कोविड महामारी व लॉकडाउन के बावजूद राज्य सरकार के व्यय में १३ फीसद वृद्धि हुई। प्रति व्यक्ति आय में भी बढोतरी हुई है और विकास दर २.५ फीसदी रही। यह पूरी तरह झूठ व हास्यास्पद है। राज्य में कृषि विकास लगातार कई वर्षों से निगेटिव है‚ फिर ऐसा क्या हुआ कि उसी को आधार बनाकर सरकार २.५ फीसदी विकास का दावा कर रही है। दरअसल‚ कृषि नहीं बल्कि कृषि से जुडे क्षेत्रों यथा मछली उत्पादन‚ वानिकी सहित अन्य सेक्टरों में मात्रा में हुए थोडे बदलाव को फीसद में बहुत बढा–चढाकर सरकार दिखला रही है। कंस्ट्रक्शन क्षेत्र को भी वह इसका आधार बना रही है‚ जो पूरी तरह से लूट–खसोट का क्षेत्र बन गया है। उद्योग पूरी तरह से बिहार में ध्वस्त हैं। इसलिए उसका भी कोई योगदान नहीं हो सकता है। यदि विकास दर सच में २.५ फीसदी है‚ तो बेरोजगारी‚ गरीबों की संख्या आदि में बिहार नंबर एक पर क्यों हैॽ पोषण का सबसे खराब हाल क्यों है‚ जैसा कि नीति आयोग की रिपोर्ट ने खुलासा किया था। जाहिर सी बात है कि विकास दर का यह दावा पूरी तरह अवास्तविक है‚ जिसका रियल सेक्टर के ग्रोथ से कोई लेना देना नहीं है। सरकार का यह भी दावा है कि उसने राजकोषीय घाटे व ऋण दायित्वों का बखूबी पालन किया। कैग की रिपोर्ट वित्तीय वर्ष २०१९–२० के बारे में कहती है कि राज्य में सार्वजनिक ऋण लगातार बढ रहा है‚ लेकिन कैपिटल व्यय लगातार निगेटिव दिखाया में है। इसका मतलब है कि सार्वजनिक ऋण पूंजी के निर्माण में नहीं लगाया जा रहा है। सरकार इस सच को भी छुपा रही है।
समाज के किसी भी तबके में कोई उपेक्षा या नाराजगी का भाव लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं………
UGC की नई नियमावली ने देश सहित बिहार की राजनीति में उबाल ला दिया है। अपर कास्ट के बढ़ते आक्रोश...







