बिहार की सरजमीं पर काम करने वाले आठ संगठनों ने संयुक्त रूप से पेरिस कम्यून समारोह आयोजन समिति के तत्वावधान में दुनिया के पहले मजदूर राज्य ‘पेरिस कम्यून’ की १५०वीं वर्षगांठ के मौके पर आईएमए सभागार में रविवार को समारोह आयोजित किया गया। संचालन अध्यक्ष मंडल ने किया। अध्यक्ष मंडल में कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया के पार्थ सरकार‚ सीपीआई (एमएल) के नन्दकिशोर सिंह‚ सर्वहारा जन मोर्चा की आकांक्षा प्रिया‚ श्रम मुक्ति संगठन के आदित्य कमल‚ कम्युनिस्ट सेंटर फॉर साइंटिफिक सोशलिज्म के विद्यानंद चौधरी‚ नागरिक अधिकार मंच के रामनंदन प्रसाद‚ कम्युनिस्ट चेतना केन्द्र के रामलखन तथा जनवादी लोक मंच के पुकार शरीक थे। ‘पेरिस कम्यून के सबक और भारत में मजदूर पर्व के समक्ष पेश चुनौतियां’ विषय पर नन्द किशोर सिंह ने आलेख पेश किया। ॥ सभा को सम्बोधित करने वालों में सर्वहारा जन मोर्चा के अजय सिन्हा‚ कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया के सतीश कुमार‚ सीपीआई (एमएल) के अरविन्द सिन्हा‚ कम्युनिस्ट चेतना केन्द्र के रासबिहारी चौधरी‚ नागरिक अधिकार मंच के संजय श्याम‚ कम्युनिस्ट सेंटर फॉर साइंटिफिक सोशलिज्म के नरेन्द्र कुमार‚ जनवादी लोक मंच के बलदेव झा एवं श्रम मुक्ति संठन के जयप्रकाश ललन प्रमुख हैं। इसके बाद बिरादराना संगठनों तथा अन्य जनवादी क्रांतिकारी संठनों के प्रतिनिधियों ने समारोह को सम्बोधित किया। इसमें मजदूर दस्ता के विवेक‚ वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर एवं जनकवि आलोक धन्वा उल्लेखनीय हैं। कार्यक्रम के दौरान क्रांतिकारी गीत एवं कविताओं की भी प्रस्तुति की गई। इसे ओमप्रकाश रमा‚ आदित्य कमल‚ रमा मूर्ति‚ धनंजय कुमार आदि ने पेश किया॥। समारोह में प्रस्तुत आलेख में कहा गया है कि पेरिस कम्यून दुनिया का पहला मजदूर राज्य था जो ७२ दिनों तक कायम रहा। इसने एक जनवादी राज्य की आधारशिला रखी जो संसदीय नहीं‚ बल्कि कार्यशील संगठन था जो कार्यकारी और विधिकारी दोनों कार्य साथ करता था। पेरिस कम्यून ने अपने पहले ही फरमान में स्थायी सेना एवं नौकरशाही को खत्म करने की घोषणा की थी और राष्ट्रीय गार्ड को एकमात्र सैन्य दल घोषित किया‚ जिसमें हथियार उठाने योग्य सभी नागरिकों को भर्ती करने का विधान किया गया था। कम्यून के सदस्यों से लेकर नीचे के लोगों तक जनसेवा कार्य के लिए वही मजदूरी निर्धारित की गई जो मजदूरों को मिलती थी। पेरिस कम्यून ने राज्य से चचोंर् का सम्बन्ध खत्म कर दिया और उन्हें मिलने वाले अनुदान को बंद कर दिया। सभी शिक्षण संस्थाएं आम जनता के लिए मुफ्त कर दी गइ और विज्ञान को उन सभी बंधनों से मुक्त कर दिया गया जिनमें पूर्वाग्रह एवं सरकारी दबाव ने उसे बांध रखा था। सभी कर्मचारियों की तरह मजिस्ट्रेट और जज भी निर्वाचित तथा उत्तरदायी बना‚ जिन्हें किसी समय भी हटाया जा सकता था। पेरिस कम्यून के अनुभवों का विश्लेषण करते हुए कार्ल मार्क्स ने महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला कि कम्यून ने एक बात तो खासतौर से साबित कर दी कि मजदूर वर्ग राज्य की बनी–बनाई मशीन पर कब्जा करके उसका उपयोग अपने उद्ेश्यों की पूर्ति के लिए नहीं कर सकता। पेरिस कम्यून की दो गलतियों–पहली कि उसने सम्पत्ति हरण करने वालों का सम्पत्ति हरण नहीं की और दूसरी गलती कि सर्वहारा वर्ग ने फौजी कार्रवाइयों के महत्व को कम आंका। परन्तु अपनी तमाम गलतियों के बावजूद कम्यून उन्नीसवीं सदी के महानतम सर्वहारा आंदोलन का महानतम उदाहरण था। उन्होंने कहा कि आज देश में बढते आर्थिक संकट एवं फासीवादी दमन के वर्तमान दौर में ‘पेरिस कम्यून’ के ऐतिहासिक क्रांतिकारी सबकों के आलोक में जब मजदूर वर्ग की चुनौतियों पर हम विचार करते हैं तो मजदूर–मेहनतकश वर्ग की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो जाती है। ॥ उन्होंने आलेख में कहा कि वर्तमान आर्थिक–सामाजिक व्यवस्था जिस असमाधेय संकट की शिकार है‚ उसका समाधान छोटे–मोटे सुधारों में नहीं‚ वरण इस मानवद्रोही शोषक व्यवस्था की बुनियाद हिलाने वाले क्रांतिकारी बदलाव के आन्दोलन में निहित है। औपनिवेशिक शासन से विरासत में मिली जनविरोधी नौकरशाही व पुलिस तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन और विद्यमान आदमखोर शोषणकारी व्यवस्था को समूल रूप से उखाडे बगैर हम नये सच्चे जनवादी व समाजवादी समाज व्यवस्था की स्थापना की दिशा में आगे नहीं बढ सकते हैं‚ जबकि यही भारत में एक सच्ची जनक्रांति का लक्ष्य होना चाहिए। इसलिए आज देश के मजदूरों‚ किसानों‚ अन्य मेहनतकश वर्गों‚ शोषित–उत्पीडित जमातों एवं दबे–कुचले समुदायों और जनवादी‚ प्रतिशील एवं क्रांतिकारी शक्तियों को एकजुट होकर वर्तमान व्यवस्था को समूल रूप से उखाड फेंकने के ऐतिहासिक कार्यभार को पूरा करने में लग जाना चाहिए। निश्चित रूप से पेरिस कम्यून के कम्यूनाडोंर् की वीरता और बलिदान तथा उनकी खूबियों एवं गलतियों से सीख लेते हुए हम भारत में क्रांतिकारी बदलाव के आन्दोलन को तेज करते हुए अंततः एक नये शोषणविहीन जनवादी व समाजवादी समाज के निर्माण के रास्ते को प्रशस्त कर सकते हैं। यही पेरिस कम्यून का सबक और वक्त की मांग है।
वक्ताओं ने आलेख का समर्थन करते हुए अपनी बातें रखीं और भारत में शोषणविहीन जनवादी एवं समाजवादी समाज व्यवस्था के निर्माण के लिए मजदूर वर्ग का आह्वान किया। पेरिस कम्यून की १५०वीं वर्षगांठ पर राजधानी में आयोजित हुआ समारोह॥







