जब उन्नीस नवम्बर की सुबह राष्ट्र के नाम अपने संदेश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की और साथही आंदोलनरत किसानों से घर वापस लौटने की मनुहार की तब कुछपल को तो लगा कि किसान नेता प्रधानमंत्री की बात का संज्ञान लेंगे और लगभग एक वर्ष से चले आ रहे आंदोलन को वापस ले लेंगे‚ लेकिन इस अपेक्षा के विपरीत किसान नेताओं ने स्पष्ट कर दिया कि वे आंदोलन वापस नहीं लेंगे जब तक कि एमएसपी को कानूनी मान्यता न मिले और आंदोलन के दौरान मृत किसानों के परिवारों को मुआवजा न मिले। साथ ही उनका यह भी आग्रह रहा कि किसानों के कुछ अन्य मुद्दों पर भी वार्ता हो यानी नरेन्द्र मोदी का आंदोलन को समाप्त करने का दांव पूरी तरह विफल हो गया। किसान नेताओं ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की उसके निहितार्थ केवल मोदी या मोदी सरकार के लिएनहीं‚ बल्कि भारतीय राज्य के लि खतरनाक संकेत देने वाले हैं। अगर मोदी सरकार इस बार की तरह आगे भी किसानों की मांगों के आगे झुक जाती है‚ तो यह स्थापित हो जाएगा कि कुछसमूहों का अक्खड़़ और गैर–जनतांत्रिक प्रतिरोध किसी भी चुनी हुई सरकार पर मनमाना दबाव बना सकता है और उसे झुका सकता है। देश में अनेक ऐसे समूह हैं जो मोदी सरकार के विरोधी हैं‚ इनको भी स्पष्ट प्रेरणा मिलेगी कि बिना चुनाव में जाए और वैधानिक तरीके से अपनी सरकार बनाने की लोकतांत्रिक चेष्टा के बजाए अपने भीड़़ बल से सरकार को झुकाया जा सकता है। जम्मू–कश्मीर और सीएए कानून के विरोधी लोगों के बीच उठ रहे स्वर ऐसे ही संकेत दे रहे हैं। अगर चुनी हुई सरकारें भीड़़ बल के आगे समर्पण करती रहें तो लोकतंत्र का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। जब एक छोटी सी संख्या के बल पर ही रास्ते जाम करके सरकार को अपनी बात मनवाने के लिए घुटनों पर लाया जा सकता है तो फिर चुनाव जीत कर अपनी सरकार बनाने और अपनी तरह से नीति और कानून बनाने की जहमत कौन उठाएगा। किसान आंदोलन ने आम लोगों की सुविधाओं की कीमत पर अक्खड़़पन‚ हठधर्मिता और दुराग्रहशीलता का परिचय दिया है वह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। इसके आगे समर्पण करने से लोकतांत्रिक मूल्य समाप्त होंगे और देश की कोई भी सरकार अपने बहुमतीय चुनाव के बल पर शासन नहीं कर पाएगी। जो लोग सरकार के समर्पण पर खुश हो रहे हैं‚ उन्हें भविष्य को लेकर चिंतित होना चाहिए और देश को अराजकता के भंवर में जाने से बचाना चाहिए।
पेपर लीक पर चर्चा के लिए सरकार और विपक्ष दोनों तैयार, फिर संसद ठप क्यों?
लोकसभा और राज्यसभा में पेपर लीक के मुद्दे पर प्रदर्शन और लाठीचार्ज को लेकर तीसरे दिन भी बहस नहीं हो...







