धर्म और ज्योतिष के मुताबिक कार्तिक पूर्णिमा के दिन पवित्र नदी में स्नान करके उगते सूर्य को अर्ध्य देने का विशेष महत्व है. इसके अलावा इस दिन दान-पुण्य करने से कई तरह के पापों से मुक्ति भी मिलती है. ज्योतिष के अनुसार यदि कुंडली में चंद्रमा कमजोर हो तो कार्तिक पूर्णिमा के दिन चावल का दान करने से लाभ होता है. इसके अलावा इस दिन दीपदान और तुलसी पूजा जरूर करनी चाहिए.
कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर राक्षस का वध किया था इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस दिन दान-पुण्य करने का भी अत्यंत महत्व है. इस साल 19 नवंबर 2021 को कार्तिक पूर्णिमा है.
मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा को दीप जलाने से भगवान विष्णु की खास कृपा मिलती है. इस कारण श्रद्धालु विष्णुजी को ध्यान करते हुए मंदिर, पीपल के पेड़, नदी किनारे, मंदिरों में दीप जलाते है.
ऐसी मान्यता है कि कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन ही सिख धर्म के पहले गुरु यानी गुरु नानकदेव का जन्म हुआ था। इस वजह से भी हिंदू और सिख धर्म के अनुयायी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पर्व (Guru Parv 2021), प्रकाश पर्व या प्रकाश उत्सव के रूप मनाते हैं. इस अवसर पर गुरुद्वारों में अरदास की जाती है और बहुत बड़े स्तर पर जगह-जगह पर लंगर किया जाता है.
आज कार्तिक पूर्णिमा के दिन खग्रास चंद्र ग्रहण है। जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा क्रमशः एक ही सीध में होते हैं या चंद्रमा पृथ्वी के ठीक पीछे उसकी प्रच्छाया में आ जाता है तब चंद्र ग्रहण लगता है और अबकी बार चन्द्रमा पूर्ण रूप से पृथ्वी की प्रच्छाया से ढका हुआ रहेगा। अतः यह खग्रास चंद्र ग्रहण होगा। आचार्य इंदु प्रकाश से जानिए आपकी राशि पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
वृष राशि और कृतिका नक्षत्र पर लगने वाला यह ग्रहण ग्रस्तोदित खण्डग्रास रूप में अरुणाचल प्रदेश के सुदूरवर्ती इलाकों में ही दृश्य होगा। इसके आलावा पूरा भारतीय परिक्षेत्र ग्रहणयुक्त रहेगा। अरुणाचल प्रदेश के जिस हिस्से में यह ग्रहण दिखायी देगा वहां भी चंद्रोदय के समय ग्रहण बहुत ही कम समय के लिये दिखेगा। यह ग्रहण प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र, दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया, चीन, न्यूजीलैंड तथा हिन्द महासागरीय क्षेत्र के पूर्वी इलाकों में दिखाई देगा।
काशी में आज दीपावली के 15 दिनों के बाद कार्तिक पूर्णिमा तिथि पर देव दीपावली का उत्सव मनाया जाएगा. लोग पूर्णिमा के दिन खूबसूरत रंगोली और लाखों दीये जलाकर इस त्योहार को हर्षोल्लास के साथ मनाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. माना जा रहा है कि वाराणसी के गंगा घाट 15 लाख दीयों से जगमग होंगे. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करने और दीपदान करने का विशेष महत्व है. इस दौरान अस्सी से राजघाट तक 84 घाटों के बीच 22 से अधिक जगहों पर गंगा आरती का आयोजन किया जाएगा.
कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली का पर्व मनाने का रिवाज है. काशी के गंगा घाट पर लोग दीपक जलाते हैं. इस धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के परंपरा को देवताओं की दीपावली भी कहते हैं. वाराणसी में देव दीपावली के पर्व पर घाट, कुंड, गलियां और चौबारे दीपों से रौशन होंगे. इस दौरान घाटों पर लेजर शो दिखेगा. वहीं पहली बार कन्याएं मां गंगा की आरती उतारेंगी और 108 किलो फूल से श्रृंगार किया जाएगा. देव दीपावली की रात शिव की नगरी का नजारा देवलोक का आभास कराएगा. घाट, कुंड, गलियां, चौबारे और घर की चौखट दीयों की रौशनी से जगमग होगी. शहर से लेकर गांव, घाट और नदियों के किनारों को रौशनी से सजाने की तैयारियां पूरी की जा चुकी हैं. चेतसिंह घाट, राजघाट पर लेजर शो दिखाया जाएगा.
कार्तिक पूर्णिमा का महत्व
हिंदू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्व होता है. पूरे कार्तिक महीने में पूजा, अनुष्ठान और दीपदान का विशेष महत्व होता है. इस कार्तिक माह में ही देवी लक्ष्मी की जन्म हुआ था और इसी महीने में भी भगवान विष्णु चार माह की योग निद्रा से जागे थे. कार्तिक पूर्णिमा के पवित्र अवसर पर श्रद्धालु गंगा में पवित्र डुबकी लगाते हैं और शाम को मिट्टी के दीपक या दीया जलाते हैं. गंगा नदी के तट पर घाटों की सभी सीढ़ियां लाखों मिट्टी के दीयों से जगमगाती हैं. यहां तक कि वाराणसी के सभी मंदिर भी लाखों दीयों से जगमगाते हैं.
वाराणसी में दीपावली और देव दीपावली के बीच अंतर
अमावस्या के दिन पूरे भारत में दीपावली मनाई जाती है क्योंकि भगवान राम 14 साल के वनवास के बाद रावण को मारने के बाद अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अपने घर वापस आए थे. देव दिवाली दिवाली के ठीक 15 दिन बाद मनाई जाती है. इसे कार्तिक पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है.







