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लोकल से ग्लोबल होता अफगान संकट

UB India News by UB India News
September 8, 2021
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर, ब्लॉग
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तालिबान की एलीट फोर्स को पाकिस्तान ने कैसे दी ट्रेनिंग
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अन्तराष्ट्रीय जगत में शायद ही ऐसा कोई देश होगा‚ जिसकी तारीख के पन्ने इतनी तेजी से पलटे होंगे जितनी तेजी से अफगानिस्तान का इतिहास बदलता रहा है। कभी रेशम मार्ग और मानव प्रवास का प्राचीन केंद्र बिंदु रहा ये मुल्क आज फिर उसी मुहाने पर आ खड़ा हुआ है जहां वो ढाई दशक पहले था। तख्तापलट की प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही अफगानिस्तान अब नये दौर में प्रवेश कर चुका है। वैसे सच तो ये है कि यह दौर न तो अफगान जनता के लिए नया है‚ और न ही बाकी दुनिया के लिए। तालिबान राज की दो दशक पुरानी यादें लोगों के जेहन में आज भी ताजा हैं। उन पुराने अनुभवों की तासीर ऐसी है कि एक तरफ अफगानियों में अपने ही देश को छोड़ने की होड़ लगी हुई है‚ तो दूसरी तरफ बाकी दुनिया तालिबान का तोड़ ढूंढने में अपना सिर खपा रही है॥। खासकर पड़ोसी देशों में तो इस बदलाव ने खतरे का अलार्म बजा दिया है। इस मामले में भारत का रुख अभी तक संयत रहा है। तालिबान के न्योते पर दोनों देशों के बीच दोहा जैसी न्यूट्रल लोकेशन पर औपचारिक बातचीत की शुरु आत भी हुई है। इस बातचीत के लिए तालिबान से अफगानिस्तान की जमीन का भारत के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होने देने की शर्त मनवाकर सरकार ने देश को एक बड़ी चिंता से तो राहत दिलवाई है‚ लेकिन कई महत्वपूर्ण मसले अभी भी अधर में दिख रहे हैं। ये मसले सामरिक भी हैं और कारोबारी भी।

सबसे बड़ा सवाल कश्मीर का है‚ जिस पर तालिबान पिछले एक पखवाड़े में दो स्टैंड जाहिर कर चुका है। कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला बताने के बाद अब तालिबान जिस तरह मुसलमानों के अधिकारों की आवाज बनने की बात कर रहा है‚ उससे इस बात का डर है कि कहीं पाकिस्तान के बाद हमारे पड़ोस में आतंक की एक और पनाहगार न बन जाए। कारोबार और नये निवेश के लिहाज से भी फिलहाल स्थिति तलवार की धार पर चलने जैसी लग रही है। भारत इस समय अफगानिस्तान के सभी ३४ प्रांतों में विकास की किसी–न–किसी परियोजना पर काम कर रहा है। पिछले दो वित्तीय वर्षों से दोनों देशों के बीच का कारोबार भी १.५ अरब डॉलर के करीब बना हुआ है। इसका बड़ा माध्यम हवाई मार्ग रहा है‚ जो फिलहाल बाधित है। जमीन के जरिए कारोबार के लिए या तो कराची के रास्ते या फिर ईरान के बंदर अब्बास के जरिए अफगानिस्तान तक पहुंचा जा सकता है। एक तीसरा विकल्प ईरान का चाबहार बंदरगाह भी है‚ जिसे तालिबान के आने से पहले भारत की रणनीतिक सफलता माना जा रहा था। वैसे भी इस बंदरगाह को ईरान से ज्यादा अफगानिस्तान के लिए फायदेमंद माना जाता है‚ लेकिन अब इस रास्ते से कारोबार बहुत कुछ तालिबान के रुख पर निर्भर करेगा। बातचीत के नजरिए से विकल्प की समस्या भारत के सामने भी है। अमेरिका अब जा चुका है और चीन–पाकिस्तान–रूस–ईरान सब अपने–अपने हित साधने में लगे हैं।

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अफगानिस्तान में अब नई तालिबानी सरकार बनने के बाद मान्यता का सवाल भी पीछे छूट चुका है। पिछली बार जब तालिबान सत्ता में आया था‚ तो उसे पाकिस्तान‚ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात का साथ मिला था। इस बार सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने चुप्पी साध रखी है‚ लेकिन उनकी जगह चीन‚ रूस और ईरान जैसे बड़े खिलाडि़यों ने ले ली है। अभी ये लिस्ट और बढ़ेगी। ऐसे में भारत को वेट एंड वॉच पॉलिसी से आगे निकलकर नई रणनीतिक राह तैयार करनी ही होगी। तालिबान से औपचारिक संबंधों को ज्यादा समय तक टाला भी नहीं जा सकता क्योंकि इससे सामरिक और कारोबारी दोनों मोर्चों पर भारत का ही नुकसान है। पिछले दो दशक में भारत ने अफगानिस्तान में पुख्ता जमीन तैयार की है। अब भारत जितना अफगानिस्तान से दूर होगा‚ इस जमीन पर चीन और पाकिस्तान अपना दबदबा बढ़ाएंगे। इससे एक तरह लश्कर और जैश जैसे आतंकी संगठनों को खुला खेल खेलने का मौका मिलेगा‚ वहीं कारोबार के मामले में भारत तालिबान के लिए अप्रासंगिक होता जाएगा। बेशक इससे भारत के आर्थिक हितों को कोई खास नुकसान नहीं होगा‚ लेकिन भारत को पश्चिम और मध्य एशिया में बनाई बढ़त से हाथ धोना पड़ सकता है।

इस बीच तालिबान को लेकर अमेरिका में दुनिया की दिलचस्पी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है–खासकर आतंकी संगठनों के बेलगाम होने के खतरे को लेकर। एक तरफ ये सोच है कि जब अमेरिका अफगानिस्तान में रहते हुए तालिबान को अपनी शर्तों पर राजी नहीं करवा पाया‚ तो वहां से बाहर निकलने के बाद तालिबान पर उसका कितना जोर चलेगाॽ दूसरी तरह अमेरिकी प्रशासन है‚ जो लगातार दावा कर रहा है कि तालिबान को काबू में रखने के लिए उसके पास अभी भी कई ‘चिराग’ बाकी हैं। जिस तरह अमेरिका ने काबुल से अपना दूतावास हटाकर दोहा भेज दिया है‚ उससे ये स्पष्ट होता है कि तालिबान सरकार को मान्यता देने की उसे कोई जल्दी नहीं है। अभी वो फिलहाल ग्लोबल मार्केट में अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर तालिबान पर आर्थिक स्ट्राइक कर सकता है या फिर अफगानिस्तान में आतंकियों के सिर उठाने पर एयर स्ट्राइक का विकल्प भी आजमा सकता है। एक तरफ चीन‚ रूस‚ पाकिस्तान और ईरान की चौकड़ी है‚ तो दूसरी तरफ अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान के साथ अहम भूमिका निभाने वाले अल–कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे संगठन भी हैं। अल–कायदा और आईएस की अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी से अलग तालिबान केवल अफगानिस्तान में केंद्रित है‚ लेकिन अमेरिका तीनों का साझा दुश्मन है। ये तीनों मिलकर मध्य–पूर्व और मध्य–एशिया में आतंक का एक नया सिलसिला शुरू कर सकते हैं।

हालांकि यह भी सही है कि आईएस और तालिबान के रिश्ते सहज नहीं रह गए हैं। आईएस की नजर में तालिबान अमेरिका का ‘पिट्ठू’ बन चुका है। आईएस पर लगाम कसने के लिए अमेरिका ‘भरोसे की इस कमी’ को हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है। दूसरी तरफ चीन‚ रूस‚ पाकिस्तान और ईरान जैसे देश हैं‚ जिनकी अमेरिका से अलग–अलग वजहों से खींचतान है। तालिबान के सामने अमेरिका का पस्त पड़ जाना‚ फौरी तौर पर इनके खुश होने की वजह जरूर हो सकता है‚ लेकिन आगे चलकर यही तालिबान इन देशों के लिए भी परेशानी खड़ी कर सकता है। शिनिजयांग प्रांत में चीन की अफगानिस्तान से लगती आठ किलोमीटर लंबी सीमा है। ये इलाका उइगर मुसलमानों का घर है और यहां ईस्ट तुरकस्तान इस्लामिक मूवमेंट नाम का अलगाववादी संगठन सक्रिय है‚ जो तालिबान का साथ मिलने पर चीन के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।

रूस की अफगानिस्तान के साथ सीमा नहीं है‚ लेकिन उसके प्रभाव वाले ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान जैसे देश अफगानिस्तान से जुड़े हैं। अफगानिस्तान में इस्लामी कट्टरता बढ़ी तो मध्य एशिया लड़ाई का केंद्र बनेगा और उसके असर से रूस भी नहीं बचेगा। तालिबान के सत्ता में आने का मतलब अफगानिस्तान में सुन्नी मुसलमानों का दबदबा कायम होना है‚ जो शिया परस्त ईरान के लिए दिक्कतें बढ़ाएगा। पिछली बार तालिबानी राज में अफगानिस्तान ड्रग्स का अड्डा बन गया था और पश्चिमी देशों में ज्यादातर सप्लाई ईरान के रास्ते से ही होती थी। बचा पाकिस्तान जिसकी अफगानिस्तान से २‚६११ किलोमीटर लंबी सीमा की ही तरह समस्याओं की फेहरिस्त भी काफी लंबी हो सकती है। एक तरफ शरणार्थी संकट है‚ तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के सैन्य अभियानों के कारण अफगानिस्तान चले गए तहरीक–ए–तालिबान की वापसी का भी खतरा है। यानी तालिबान भले ही एक देश की सत्ता पर काबिज हो रहा हो‚ उसका असर दुनिया भर में महसूस किया जा रहा है। लोकल होकर भी अफगान समस्या अब ग्लोबल बनती जा रही है।

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