एनड़ीए के अंदरखाने ऑल इज वेल नहीं है। इसकी बानगी समय–समय पर एनड़ीए में शामिल दलों के नेताओं के बयान हैं। एनड़ीए के घटक दल –भाजपा‚ जदयू‚ हम और वीआईपी के बयानवीर अपने तरकश से बयानों के ऐसे तीर छोड़़ते रहते हैं जिससे एनड़ीए की एकजुटता हरदम संदेह के घेरे में रहती है। जदयू–भाजपा के बीच की तनातनी कभी–कभी ऐसे मोड़़ पर आ पहुंचती है जहां भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को हस्तक्षेप करना पड़़ता है। बिहार में एनड़ीए के बीच नूराकुश्ती का यह खेल हाल के दिनों में ज्यादा खेला जा रहा है। या यूं कहें कि विधानसभा चुनाव २०२० के बाद इसके तेवर में तेजी आयी है तो कहना कोई गलत नहीं होगा। गठबंधन की गांठ ढीली होने के पीछे इस बार के विधानसभा चुनाव में जदयू के कद में कमी और विधानसभा में बीजेपी का संख्या बल बढ़ना है। यही वजह है कि इस चुनाव ने जदयू को बड़़ा भाई से छोटा और भाजपा को छोटे से बड़़ा बना दिया। २०२० के विस चुनाव में जदयू ने ११५ सीटों पर चुनाव लड़़ा था जिनमें से वह ४३ सीट ही जीत पाया जबकि भाजपा ने ११० सीटों पर लड़़कर ७४ सीटों पर कब्जा किया। इस चुनाव में जदयू को २०१५ के विस चुनाव की तुलना में २८ सीटें कम मिलीं‚ जबकि बीजेपी को २१ सीटों का फायदा हुआ। वहीं‚ २०१५ में बीजेपी के पास ५३ विधायक थे और जदयू के खाते में ७१। इसी तरह‚ २०१० में भाजपा के पास ९१ विधायक थे और जदयू के पास ११५ विधायकों का संख्याबल था। लब्बोलुआब यह है कि बिहार में भाजपा–जदयू के बीच शुरुआती गठबंधन के समय से ही जदयू बड़े़ भाई की भूमिका में रहा है। लेकिन २०२० के विस चुनाव में यह समीकरण बदल गया और सीटों के गुणा–गणित में भाजपा‚ जदयू से आगे निकल गई। इसके बाद से ही दोनों दलों के बीच खींचतान शुरू हो गई।
हालांकि इस बार का चुनाव भी एनड़ीए द्वारा नीतीश कुमार के चेहरे पर ही लड़ा गया था। लेकिन चुनाव के नतीजे आने के बाद भाजपा के कुछ नेताओं द्वारा बीजेपी का मुख्यमंत्री बनाये जाने की मांग तेजी से उठायी जाने लगी थी जिस पर पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के यह बयान कि सीएम नीतीश ही होंगे‚ विराम लगा। भाजपा और जदयू के बीच उसी समय से चल रही नूराकुश्ती का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
यही नहीं‚ एनड़ीए के घटक दलों में शामिल हम और वीआईपी भी कई अवसरों पर असहज करने वाले बयान देकर एनड़ीए के बीच तनाव का कारण बनते रहते हैं। वैसे‚ भाजपा और जदयू के बयानबहादुर इसमें सबसे आगे हैं जिसके कारण दोनों दलों के बीच तल्खी ज्यादा बढ़ जाती है। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि इनके मन तो मिल रहे हैं लेकिन दिल नहीं। वैसे‚ दोनों दलों के कुछ नेता ऐसा कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देना चाहते जिससे दलों के बीच दूरियां बढ़े। खासकर पीएम मैटेरियल का बयान काफी सुर्खियां बटोर रहा है और दलों के बीच दूरियां भी बढ़ा रहा है।
बयान देने से किसी को कोई परहेज नहीं
अच्छा बड़ी बात तो यह है कि दोनों दलों का कोई भी नेता कुछ भी बोलने से परहेज नहीं करता । चार-पांच दिन पूर्व में भाजपा के नेता और उपमुख्यमंत्री तार किशोर सिंह पर जदयू विधायक गोपाल मंडल ने एक बयान देकर दोनों दलों के रिश्तो में खटास पैदा कर दी। यही नहीं हाल ही में भाजपा के नेता एवं मंत्री सम्राट चौधरी ने एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि भाजपा कार्यकर्ताओं को यह संकल्प लेना चाहिए कि भाजपा का मुख्यमंत्री कैसे बने । इसके बाद दोनों ओर से बयानों के तीर चलने लगे थे । इस पर सीएम नीतीश कुमार ने इशारों इशारों में कहा था कि सम्राट चौधरी को इस पर भाजपा के बड़े नेताओं से बात करनी चाहिए । कोरोना संक्रमण के बीच रात्रि कर्फ्यू को लेकर भी भाजपा जदयू आमने-सामने हो गए थे । भाजपा प्रदेश अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल का कहना था कि रात में नहीं दिन में कर्फ्यू लगे । भाजपा विधान पार्षद टूना पांडे ने तो नीतीश कुमार को परिस्थितियों का मुख्यमंत्री बता दिया था जिससे दोनों दलों के बीच खलबली मच गई थी । इस मुद्दे पर तो घमासान छिड़ गया था । अंत में केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद टूना पांडे को पार्टी से निलंबित किया गया ।







