टोक्यो में चल रहे पैरालंपिक खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाले सुमित अंतिल और अवनि लेखरा सहित सभी सात पदक विजेता खिलाड़़ी सही मायनों में देश के असली हीरो हैं। आमतौर पर यह कहा जाता है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक जीतने के लिए कौशल के साथ जज्बा होना जरूरी होता है‚ लेकिन दिव्यांगों के लिए तो खिलाड़़ी बिना जज्बा के बनना संभव ही नहीं है। क्योंकि हाथ या पैर कटने से बने दिव्यांग लोगों को छोटे शहरों और कस्बों में उनकी कमजोरी को आधार बनाकर पुकारा जाता था‚ लेकिन पिछले कुछ दशकों में इस स्थिति में सुधार आया है। हालांकि किसी भी दिव्यांग के लिए खेल को अपनाना काफी दुष्कर होता है। शारीरिक रूप से दिव्यांगों का खिलाड़़ी बनने के लिए मानसिक रूप से मजबूत बनना जरूरी होता है। भारत को इन खेलों में पहला स्वर्ण दिलाने वाली अवनि लेखरा ने आर–२ केटेगरी की १० मीटर एयर राइफल में नये विश्व रिकॉर्ड़ के साथ यह उपलब्धि हासिल की। वह जब नौ साल की थीं‚ तब जयपुर से धौलपुर जाते समय एक दुर्घटना में उसके दोनों पैर चले गए थे। अवनि के पिता चाहते थे कि वह खेलों पर अपना फोकस करे। इसके लिए पिता जब उसे शूटिंग रेंज लेकर गए तो शुरुआत में निशाना लगाना तो दूर उससे राइफल ही नहीं उठती‚ लेकिन अभिनव बिंद्रा की आत्मकथा ने उसे इस खेल को अपनाने के लिए प्रेरित किया। जेवलिन थ्रो में स्वर्ण पदक जीतने वाले सुमित अंतिल‚ रजत पदक जीतने वाले देवेंद्र झाझरिया‚ योगेश कथूनिया‚ भाविना पटेल‚ निषाद कुमार और कांस्य पदक जीतने वाले सुंदर गुर्जर में से आप किसी की भी कहानी को देखें तो उनका खिलाड़़ी बनने का सफर बेहद कठिन रहा है। २०१६ के रियो पैरालंपिक खेलों में मरियप्पन थंगावेलु नेउची कूद में स्वर्ण पदक जीता था और इससे पहले हुए ओलंपिक खेलों में पीवी सिंधु ने रजत और साक्षी मलिक ने कांस्य पदक जीता था और इन दो खिलाडि़़यों की चर्चा में मरियप्पन का प्रयास दबकर रह गया था। हालांकि अब ऐसा नहीं है। देशभर में उनकी सराहना भी हो रही है और उन्हें नकद पुरस्कारों से भी नवाजा जा रहा है। पर बेहतर हो कि सरकारें इनकी प्रतिभा को पहले पहचान कर उनकी तैयारियों पर ज्यादा खर्च करें तो परिणाम और बेहतर आ सकते हैं।
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