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अफगानिस्तान में तालिबान की मदद कर रहे हैं चीन और पाकिस्तान?

UB India News by UB India News
July 31, 2021
in Lokshbha2024, अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर
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अफगानिस्तान में तालिबान की मदद कर रहे हैं चीन और पाकिस्तान?
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अफगानिस्तान जंग का मैदान बना हुआ है। यहां तालिबान और अफगानी फौज के बीच लड़ाई छिड़ी हुई है। तालिबान ने लगभग आधे बॉर्डर पोस्ट और 407 जिलों में से 194 पर कब्जा कर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है। अमेरिका की फौज अफगानिस्तान से चली गई है लेकिन अपने पीछे वो उथल-पुथल से भरा वॉर जोन छोड़ गई है। तालिबान देश के अधिकांश हिस्सों पर कब्जा करता हुआ अब धीरे-धीरे उन शहरों की ओर बढ़ रहा है जो अफगानी फौज के नियंत्रण में हैं।

भारत के लिए तालिबान की जीत या हार महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अफगनिस्तान में भारत का बहुत कुछ दांव पर लगा है। पिछले दो दशकों में अफगानिस्तान को दोबारा अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए भारत ने वहां 21 हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश किया है। अफगानिस्तान में भारत सरकार 400 बड़ी-बड़ी परियोजनाएं चला रही है। अगर अफगानिस्तान में इसी तरह मारकाट मची रही तो इस इनवेस्टमेंट का क्या होगा? वैसे भी अफगानिस्तान में जो कुछ होता है उसका असर भारत-पाकिस्तान के साथ ही भारत और चीन के संबंधों पर पड़ता है। इसलिए अफगानिस्तान में शान्ति औऱ स्थिरता भारत के लिए जरूरी है, लेकिन फिलहाल इसके आसार कम दिखाई देते हैं। मनीष प्रसाद के मुताबिक अफगानिस्तान के ज्यादातर इलाकों में अभी हालात खतरनाक हैं। तालिबान और अफगान आर्मी के बीच पिछले तीन हफ्ते से युद्ध हो रहा है। रॉकेट और बम चल रहे हैं, गोलियां बरस रही हैं। गुरुवार को अफगानिस्तान की सेना ने कपिसा प्रांत के नेजराब इलाके में हवाई हमले किए। इस हमले में कई तालिबानियों के मारे जाने की खबर है। इसके साथ-साथ कुनार, लोगर और पकतिया जैसे इलाके में भी अफगानिस्तान की सेना को जबरदस्त कामयाबी मिली है। अफगानिस्तान की सेना पूरी ताकत से तालिबान को खदेड़ रही हैं। मजार ए शरीफ, गजनी और कंधार में अफगानिस्तान की सेना एडवांसिंग पोजिशन पर है पर हेरात में यह मजबूत पोजिशन में है।

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उधर,तालिबान का दावा है कि उसने उन सभी ठिकानों पर कब्जा कर लिया है जो अमेरिकी फौज छोड़कर गई है। 2 जुलाई को अचानक अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से वापस चली गई थी। किसी को इसकी कानोंकान खबर नहीं हुई। लेकिन जैसे ही ये पता लगा कि अमेरिकी फौज वापस जा चुकी है तो 2 जुलाई की रात को ही तालिबान ने कई इलाकों पर हमला बोल दिया और ज्यादातर इलाकों पर कब्जा कर लिया। पहले तालिबान के कब्जे में 73 जिले थे लेकिन अब तालिबान का दावा है कि उसने 194 से ज्यादा जिलों से अफगान सेना को भगा दिया और अपना कब्जा जमा लिया है। करीब बीस जिलों में तालिबान और अफगान सेना के बीच जबरदस्त जंग चल रही है।

हालांकि ऐसा बिल्कुल नहीं हैं कि अफगान सेना कमजोर पड़ रही है। पहले दो हफ्ते तक तालिबानियों का पलड़ा भारी था लेकिन अफगान कमांडरों के मुताबिक अब उनकी सेना ने जबरदस्त वापसी की है। जाबुल प्रांत में अफगान सेना ने तालिबान को करारी शिकस्त दी। खुद को तालिबान का कृषि मंत्री बताने वाला अब्दुल रहमान घायल हो गया और उसे इलाज के लिए सीमा पार पाकिस्तान ले जाया गया। इस जंग में 26 तालिबानी ढेर हुए हैं। इसी तरह कंधार, हेरात, जोवजान और हेलमांड में भी अफगान सेना ने ऑपरेशंस किए। इनमें 200 से ज्यादा तालिबानी हमलावर मारे गए। इसी तरह जैनखेल जिले में भी कम से कम आधा दर्जन तालिबानी लड़ाके मारे गए।

तालिबान कमांडरों ने अब अपनी रणनीति बदल ली है और वे रॉकेट हमलों और हवाई हमलों से बचने के लिए बच्चों को मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। अफगान सुरक्षा बल अब अलर्ट और एक्टिव है। अमेरिकी सेना से मिले दो दशकों की ट्रेनिंग का लाभ मिल रहा है। हालात का कैसे मुकाबला करना है ये उन्हें अच्छी तरह आता है। वे युद्ध के मैदान से भागने के बजाय हर स्थिति का मुकाबला करना जानते हैं।

अब सवाल है कि अफगानिस्तान के खिलाफ तालिबान को इतनी ताकत कहां से मिल रही है? तालिबान को हथियार और गोला बारूद कौन डिलीवर करता है? इसका जवाब तो खुद अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी पूरी दुनिया के सामने दे चुके हैं। आपको याद होगा 16 जुलाई को अफगानिस्तान को लेकर साउथ ईस्ट-एशिया कॉन्फ्रेंस ताशकंद में हुई थी। इसमें पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम इमरान खान के साथ ही भारत, चीन और रूस के विदेश मंत्री भी मौजूद थे। तब अशरफ गनी ने कहा था कि इस वक्त अफगानिस्तान की जो हालत है उसके लिए सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान जिम्मेदार है। अशरफ गनी ने आरोप लगाया कि पिछले एक महीने में 10,000 से ज्यादा ‘जिहादी’ लड़ाके पाकिस्तान से अफगानिस्तान में दाखिल हुए हैं। पाकिस्तान की शह पर तालिबान के लड़ाके अफगानिस्तान में खून-खराबा करते हैं, सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहे हैं और पाकिस्तान को इसमें कोई बुराई भी नजर नहीं आती। उन्होंने कहा, ‘पाकिस्तानी पीएम और उनके जनरलों के बार-बार आश्वासन के विपरीत, तालिबान का समर्थन करने वाले संगठन खुले तौर पर अफगानिस्तान की जनता और वहां की सरकार की संपत्ति और क्षमताओं के विनाश का जश्न मना रहे हैं’।

मनीष के अनुसार फिलहाल अफगानिस्तान के लगभग सभी बड़े शहरों में रात का कर्फ्यू लागू है और अफगान सेना की यूनिट को उन शहरों की ओर मूव कर दिया गया है जिन पर तालिबान के कब्जे का खतरा है। आत्मरक्षा के लिए आम जनता को आर्म्स दिए जा रहे हैं। अफगानिस्तान का बॉर्डर ईरान, पाकिस्तान, तजीकिस्तान, उजबेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान जैसे देशों से लगता है। कुल मिलाकर 12 बॉर्डर पोस्ट है लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इन 12 पोस्ट्स में से कम से कम 6 पोस्ट तालिबान के कब्जे में आ चुकी हैं यानी तालिबान अब अफगानिस्तान के आधे बॉर्डर को कंट्रोल कर रहा है। लेकिन अब भी जो शहरी इलाके हैं और जहां बड़ी आबादी है, जैसे मजार-ए-शरीफ, कुंदूज, जलालाबाद, काबुल, कंधार ये सारे इलाके अफगान सेना के कंट्रोल में हैं और तालिबान इन इलाकों तक ना पहुंच पाए इसलिए उन्हें पहले ही रोकने की तैयारी भी हो रही है।

चीन इस पूरे मामले का फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है। बुधवार को चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने तालिबान के दूसरे सबसे बड़े नेता मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के नेतृत्व में आए एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की। चीन पहुंचे इस प्रतिनिधिमंडल में तालिबान के 9 प्रतिनिधि थे। इस मुलाकात से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद चीन और तालिबान के बीच बेहतर संबंधों का संकेत मिलता है। बीजिंग में इस मुलाकात के बाद ये चर्चा शुरू हो गई कि अगर अफगानिस्तान पर तालिबान का कंट्रोल हो जाता है तो चीन तालिबान की सरकार को मान्यता दे देगा। ये इस बात का संकेत है कि चीन, तालिबान को कितनी अहमियत दे रहा है। इसकी वजह भी है। चीनी विदेश मंत्री ने कहा, उन्हें उम्मीद है कि तालिबान अलगाववादी पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट पर नकेल कसेगा, क्योंकि यह शिनजियांग क्षेत्र में चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है।

चीन और अफगानिस्तान के बॉर्डर जुड़े हुए हैं। चीन का शिनजियांग प्रांत अफगानिस्तान से लगता है। चीन को डर है कि उइगर मुस्लिम आतंकवादी चीनी सेना पर हमले के लिए अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल कर सकते हैं। शिनजियांग प्रांत में उइगर मुस्लिम अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। उइगर मुसलमानों पर चीन जुल्म कर रहा है। कई मस्जिदें तोड़ दी गई हैं। नमाज पर पाबंदी है। इस इलाके के मुसलमान दाढ़ी नहीं रख सकते। चार लाख से ज्यादा उइगर मुस्लिमों को ‘सुधार गृह’ में बंद कर दिया गया है।

तालिबान के नेताओं ने चीन के विदेश मंत्री को भरोसा दिया कि वे अफगानिस्तान की धरती का इस्तेमाल चीन के खिलाफ नहीं होने देंगे। चीन के विदेश मंत्री ने भी अफगानिस्तान की सहायता जारी रखने और उसके आंतरिक मसलों में दखल न देने की बात कही है। पाकिस्तान ने ही चीन के विदेश मंत्री और तालिबान के प्रतिनिधिमंडल के बीच बातचीत की मध्यस्थता की थी। इन दोनों की वार्ता से पहले पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी बीजिंग में थे। एक तरफ कुरैशी ने बीजिंग से इस्लामाबाद की फ्लाइट पकड़ी और दूसरी तरफ तालिबान नेताओं की फ्लाइट बीजिंग में लैंड हो गई।

इस समय अफगानिस्तान पर पूरी दुनिया की नजर है। अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद रूस ने अफगान मामलों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई है। भारत का बहुत कुछ दांव पर लगा है। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन, जो हाल ही में दिल्ली में थे, ने साफ कहा है कि अमेरिका और भारत दोनों चाहते हैं कि अफगानिस्तान में कोई हिंसा न हो। भारत और अमेरिका दोनों चाहते हैं कि अफगानिस्तान में खून खराबा न हो, वहां के लोग चैन से रहें, महिलाओं को शिक्षा एवं आजादी मिले, चुनी हुई सरकार देश को चलाए और तालिबान का कब्जा वहां न हो पाए।

अफगानिस्तान के लोग भी नहीं चाहते कि दो दशक बाद तालिबान शासन की वापसी हो। तालिबान जब सत्ता में था तब पुरुषों को अपनी दाढ़ी काटने से मना कर दिया गया था, महिलाओं को सार्वजनिक रूप से बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया गया था, घर के पुरुष के साथ न होने पर महिलाओं को चौखट से बाहर कदम रखने की सख्त मनाही थी, और टीवी देखने एवं रेडियो सुनने पर पाबंदी लग गई थी। जहां भारत और अमेरिका चाहते हैं कि अफगानिस्तान में एक लोकतांत्रिक सरकार सत्ता में बनी रहे, वहीं पाकिस्तान और चीन वहां की सत्ता में तालिबान को लाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने तालिबान के लड़ाकों को ‘अच्छे नागरिक’ और ‘सिविलियंस’ बताया, और कहा कि वे खून खराबा करने वाले लोग नहीं हैं। चीन ने तो दो कदम आगे बढ़ते हुए तालिबान के सबसे बड़े कमांडर्स को बीजिंग बुलाया और ऐसे तवज्जों दी जो आमतौर पर किसी देश के चुने हुए नेताओं को दी जाती है।

अफगानिस्तान को लेकर भारत का रुख बिल्कुल साफ। भारत-अफगान संबंध कई दशकों से चले आ रहे हैं और भारत हमेशा अफगानिस्तान के साथ खड़ा रहा है। हालांकि, भारत इस मामले में दखल नहीं देना चाहता कि काबुल में किसकी सरकार होगी और वहां कौन राज करेगा। मुझे लगता है कि मौजूदा हालात को देखते हुए भारत सरकार को भी तालिबान से बात करनी चाहिए। यदि भारत तालिबान और अन्य अफगान नेताओं को बातचीत के लिए तैयार कर पाता है तो यह सबसे अच्छी बात होगी।

समय की मांग है कि अफगानिस्तान में सबकी सहमति से एक सर्वमान्य सरकार बने। इसमें सबसे ज्यादा फायदा अफगानिस्तान की आवाम का होगा। यदि अफगानिस्तान में शांति से सत्ता परिवर्तन होता है, तो वहां चल रहीं भारत की परियोजनाएं वक्त पर पूरी होंगी और अफगानिस्तान के लोगों को उनका फायदा मिलेगा। साथ ही अफगानिस्तान में शांति होने की सूरत में पाकिस्तान और चीन को अफगान मामलों में हस्तक्षेप करने का मौका नहीं मिलेगा। लेकिन ये सब बातें बहुत दूर की हैं, क्योंकि इस वक्त तो हालात ये हैं कि कई जिलों में अफगान सेना और तालिबान के बीच भीषण लड़ाई चल रही है। इंडिया टीवी की टीम इस समय वॉर जोन में मौजूद है और पल-पल की अपडेट भेज रही है। हम सबको आशा करनी चाहिए कि वहां जल्द शांति कायम हो।

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