बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी को 100 दिन से कुछ अधिक दिन हो गए हैं। बांकीपुर उपचुनाव का रिजल्ट उनके शासनकाल का भी परीक्षा परिणाम होने वाला है। जानकार मानते हैं कि बीजेपी यदि इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखती है, तो इससे सम्राट चौधरी के नेतृत्व को लेकर एक सकारात्मक संदेश जाएगा। उसके अलावा इस चुनाव के मतदान से ठीक पहले नीट- यूजी पेपर लीक को लेकर देश में जो हुआ, उसका असर भी इसके परिणाम पर दिखेगा या नहीं, इसका उत्तर भी तीन अगस्त को मिल जाएगा। यदि ये चुनाव बीजेपी लूज करती है, तो साफ दिख जाएगा कि नीट छात्रों के प्रदर्शन का असर इस पर हुआ है।
बांकीपुर उपचुनाव रिजल्ट का प्रभाव
बांकीपुर उपचुनाव का रिजल्ट पहला ऐसा चुनाव परिणाम बन गया है, जहां बीजेपी को व्यापक युवा आक्रोश के बीच परखा जाएगा। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस परिणाम का राष्ट्रीय राजनीति और प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा की चुनावी रणनीति पर असर पड़ सकता है। पटना के मध्य में स्थित बांकीपुर पिछले 31 वर्षों से भाजपा का गढ़ रहा है। पार्टी ने बिहार में विपक्ष में रहते हुए भी यह सीट जीती थी – आरजेडी शासन के दौरान 1995, 2000 और 2005 में, और फिर 2015 में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार के तहत। हालांकि, इस बार भाजपा राज्य सरकार की मुखिया है और सम्राट मुख्यमंत्री हैं, जिससे राजनीतिक दांव काफी बढ़ गए हैं।
| बांकीपुर उपचुनाव में बाजी पलट जाने पर बीजेपी की मुश्किल बढ़ जाएगी। पार्टी अपनी रणनीति में भारी बदलाव कर सकती है। |
| बीजेपी कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में रणनीति की समीक्षा करने के बाद कदम आगे बढ़ाएगी। |
| बीजेपी को पता चल जाएगा कि नीट- यूजी पेपर लीक और अन्य मुद्दों का असर कितना हुआ है। |
| बांकीपुर के वोटरों का मिजाज जानने के बाद बीजेपी के लिए आगामी फैसले लेने में आसनी होगी। |
| बांकीपुर का रिजल्ट बीजेपी के लिए काफी मायने रखता है, ये बीजेपी के 100 दिन के शासनकाल की परीक्षा का परिणाम होगा। |
क्या जेन- जी के विरोध प्रदर्शन का असर होगा?
छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बाद, बीजेपी ने इस सीट को बरकरार रखने और मतदाताओं, विशेष रूप से युवाओं पर अपनी पकड़ खोने की किसी भी धारणा से बचने के लिए अपने सारे हथकंडों को इस्तेमाल किया है। टीओआई से बातचीत में राजनीतिक जानकार प्रो.बीएन प्रसाद ने बताया कि यह पहली बार था जब जनरेशन जेड के विरोध प्रदर्शन ने हिंदुत्व के नारे को चुनौती दी। अगर भाजपा चुनाव हारती है, तो यह देश में उभरती राजनीतिक संस्कृति के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रदान करेगी और उसे उत्तर प्रदेश, गुजरात और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अपनी चुनावी रणनीति को फिर से निर्धारित करना होगा।
बांकीपुर चुनाव परिणाम के होने वाले इफेक्ट के बारे में जानकार कहते हैं कि बीजेपी का बहुत कुछ दांव पर लगा है। ये चुनाव परिणाम महज विधायक का चुनाव नहीं करेगा। ये जनसमर्थन की एक परीक्षा का परिणाम होगा। बांकीपुर बीजेपी का गढ़ रहा है। पार्टी तीन दशकों से चुनाव नहीं हारी है। यदि परिणाम प्रतिकुल आते हैं, तो ये संकट की स्थिति हो जाएगी। इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि चारा घोटाले की भनक लगते ही बीजेपी ने अपने एक अच्छे खासे उम्मीदवार को बदलने में देरी नहीं लगाई। तब इसके परिणाम के बाद होने वाले असर का अंदाजा आप लगा सकते हैं।
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी पूरी ताकत झोंकी। इस चुनाव परिणाम के लिए पूर्व सीएम नीतीश कुमार को उतार दिया गया, मैदान में। बीजेपी ने रोड शो के अलावा जनसभा किया। हुआ ये कि प्रशांत किशोर के मैदान में आने से अचानक ये सीट हॉट केक बन गया। उन्होंने लोगों से अपने बच्चों के भविष्य को लेकर वोट डालने की अपील की। जन सुराज पार्टी ने मोहल्ला सभाओं, अड्डा बैठकों, चाय बैठकों, पदयात्राओं, बुद्धिजीवियों के साथ बातचीत और जन संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से लगातार दिखाई देते रहे। साथ ही उन्होंने चुनाव अभियान में जीविका दीदियों को नियुक्त करने के लिए एनडीए की आलोचना भी की।
इलाके में जातिगत आधार पर वोटरों का मिजाज
सियासी जानकारों की राय में इस निर्वाचन क्षेत्र में कायस्थ समुदाय के मतदाताओं की संख्या लगभग 14% है, यही कारण है कि भाजपा लगातार इस समुदाय से उम्मीदवार उतारती रही है। इनके बाद यादव (12%), मुस्लिम, चंद्रवंशी और वैश्य समुदाय (प्रत्येक 9%), दलित और भूमिहार (प्रत्येक 8%), ब्राह्मण (7%), और राजपूत और कुर्मी (प्रत्येक 5%) का स्थान आता है। और NEET-UG परीक्षा के पेपर लीक विरोध प्रदर्शनों के बाद, बांकीपुर उपचुनाव के रिजल्ट का महत्व केवल एक विधायक के चुनाव से कहीं अधिक बढ़ गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह परिणाम इस बात का प्रारंभिक संकेत देगा कि क्या छात्रों का गुस्सा सत्तारूढ़ पार्टी के लिए चुनावी चुनौती में तब्दील हुआ है और आगामी राज्य चुनावों से पहले राजनीतिक परिदृश्य को आकार दे सकता है।







