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भारत के मंदिरों को चलाने में सरकार की क्या है भूमिका?

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July 6, 2026
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भारत के मंदिरों को चलाने में सरकार की क्या है भूमिका?
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अयोध्या में भव्य राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा के बाद से ही यहां देश और दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है. लेकिन हाल ही में मंदिर में मिलने वाले चढ़ावे और दान की राशि में हेराफेरी के कुछ आरोपों ने सबका ध्यान अपनी तरफ खींचा है. इस विवाद के बाद से ही मंदिर के प्रशासनिक ढांचे और उसके प्रबंधन को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं. सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद 5 फरवरी 2020 को केंद्र सरकार ने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया था. तब से लेकर अब तक इस मंदिर को केवल नकद के रूप में ही लगभग 3500 करोड़ रुपये का दान मिल चुका है.

इतने बड़े पैमाने पर आने वाले पैसे के प्रबंधन में कुछ कमियों की बात सामने आने के बाद राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त करने की वकालत की है. दूसरी तरफ राम मंदिर आंदोलन का मुख्य चेहरा रहे विश्व हिंदू परिषद ने देश भर के मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त करने की अपनी पुरानी मांग को एक बार फिर दोहराया है.

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भारत में मंदिरों की स्थिति और उनका खजाना
भारत में हिंदू मंदिरों की संख्या को लेकर कोई आधिकारिक आंकड़े तो उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन एक अनुमान के मुताबिक देश में करीब 10 लाख मंदिर हैं. इनमें से ज्यादातर छोटे और ग्रामीण इलाकों के मंदिर हैं, जिनका रखरखाव स्थानीय समुदाय, कोई परिवार या वहां के पारंपरिक पुजारी करते हैं. मंदिर में आने वाला चढ़ावा भी उन्हीं के पास जाता है. लेकिन इसके उलट देश में कई ऐसे बड़े और ऐतिहासिक मंदिर भी हैं, जिनके पास जमीन, मकान और सोने चांदी के गहनों के रूप में अरबों रुपये की संपत्ति है.

इन बड़े मंदिरों में हर साल करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है. ये बड़े मंदिर मुख्य रूप से अयोध्या, वाराणसी, हरिद्वार और दक्षिण भारत के राज्यों में फैले हुए हैं. इन मंदिरों का प्रबंधन अक्सर चैरिटेबल ट्रस्ट के जरिए होता है. इन रजिस्टर्ड ट्रस्टों को मिलने वाले दान पर आयकर कानून की धारा के तहत टैक्स में छूट भी मिलती है, लेकिन बहुत सारा दान नकद या सामान के रूप में आता है, जिसका कोई पक्का हिसाब किताब नहीं मिल पाता है.

पुजारियों और परिवारों का पारंपरिक सिस्टम
अगर हम देश में मंदिरों के प्रबंधन के तौर तरीकों को देखें, तो मुख्य रूप से तीन पारंपरिक व्यवस्थाएं दिखाई देती हैं. इनमें सबसे पहली व्यवस्था है पारिवारिक प्रबंधन की, जिसे पंडा या पुजारियों के परिवार संभालते हैं. देश के अधिकांश मंदिरों में यही व्यवस्था लागू है, जहां एक ही वंश या परिवार के लोग पीढ़ी दर पीढ़ी पूजा पाठ और व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालते हैं.

मंदिर में आने वाले चढ़ावे पर भी उन्हीं का अधिकार होता है. जहां एक से ज्यादा परिवार शामिल होते हैं, वहां वे आपस में दिन, घंटे या महीनों के हिसाब से अपनी बारी तय कर लेते हैं. इसका एक बेहतरीन उदाहरण कर्नाटक का उडुपी श्री कृष्ण मठ है. इस मठ का प्रबंधन आठवीं सदी के संत मध्वाचार्य द्वारा स्थापित 8 मठों के हाथ में है. प्रत्येक मठ को दो साल के लिए मंदिर की जिम्मेदारी मिलती है और इस तरह एक मठ का नंबर 16 साल के बाद दोबारा आता है.

महंत प्रणाली और अखाड़ा व्यवस्था
दूसरी बड़ी व्यवस्था महंत प्रणाली है. इस व्यवस्था में किसी एक आध्यात्मिक गुरु या महंत के पास ही मंदिर की सारी शक्तियां होती हैं. वही व्यक्ति मंदिर की संपत्ति, चढ़ावे और पूरे प्रशासन का अकेला मालिक होता है. महंत को ही अपने जीवनकाल में या वसीयत के जरिए अपना उत्तराधिकारी चुनने का अधिकार होता है.

इसका सबसे बड़ा समकालीन उदाहरण उत्तर प्रदेश के गोरखपुर का प्रसिद्ध गोरखनाथ मठ है. इस मठ के मुखिया वर्तमान में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, जिन्हें स्वर्गीय महंत अवैद्यनाथ ने अपना उत्तराधिकारी बनाया था. आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित ऐतिहासिक पीठों में भी इसी तरह की उत्तराधिकारी व्यवस्था काम करती है. तीसरी पारंपरिक व्यवस्था अखाड़ा या पंचायती सिस्टम है.

अखाड़े मुख्य रूप से साधु संतों के स्वायत्त संगठन होते हैं, जो महाकुंभ के दौरान अपने शाही स्नान को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में रहते हैं. इन अखाड़ों का संचालन लोकतांत्रिक या पंचायती तरीके से होता है, जहां सर्वसम्मति या चुनाव से मुखिया चुना जाता है. देश में इस समय 13 प्रमुख अखाड़े हैं, जिन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है. ये अखाड़े अपने अधीन आने वाले सैकड़ों मंदिरों और आश्रमों का प्रबंधन खुद करते हैं, पुजारी नियुक्त करते हैं और चढ़ावे का इस्तेमाल अपने संप्रदाय के काम में करते हैं.

मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण का इतिहास
इन तीन पारंपरिक व्यवस्थाओं के अलावा भारत में मंदिरों के प्रबंधन में सरकार की भी बहुत बड़ी भूमिका है. इस सरकारी हस्तक्षेप की शुरुआत ब्रिटिश काल में साल 1863 के रिलीजियस एंडोमेंट्स एक्ट से हुई थी, जिसके तहत अंग्रेजों ने मंदिरों का नियंत्रण स्थानीय कमेटियों को सौंप दिया था, लेकिन परोक्ष रूप से नियंत्रण अपने पास ही रखा था.

इसके बाद साल 1925 में मद्रास हिंदू रिलीजियस एंडोमेंट्स एक्ट बनाया गया, जिसने प्रांतीय सरकारों को मंदिरों के लिए कानून बनाने की बड़ी ताकत दे दी. आजादी के बाद इसी कानून को आधार बनाकर देश के कई राज्यों ने अपने यहां मंदिरों के प्रबंधन के लिए विशेष विभाग और मंत्रालयों का गठन कर दिया.

भारतीय संविधान का अनुच्छेद सरकार को यह अधिकार देता है कि वह धार्मिक आचरण से जुड़ी किसी भी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि को नियंत्रित करने के लिए कानून बना सकती है. इसी प्रावधान का इस्तेमाल करके राज्य सरकारें हिंदू मंदिरों के लिए बोर्ड बनाती हैं. हालांकि इसके उलट मुस्लिम और ईसाई समुदाय अपने धार्मिक स्थलों का प्रबंधन अपने समुदाय के बोर्ड या ट्रस्ट के जरिए खुद करते हैं.

राज्यों में मंदिरों के प्रबंधन की मौजूदा स्थिति
सरकारी नियंत्रण वाले हिंदू मंदिरों में सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी पुजारियों को वेतन देते हैं और चढ़ावे की रकम को बैंक खातों में जमा कराते हैं. इस पैसे का एक बड़ा हिस्सा मंदिरों के रखरखाव और अन्य सामाजिक कल्याणकारी कार्यों में भी खर्च किया जाता है. अगर हम देश के कुछ बड़े राज्यों में सरकारी प्रबंधन के उदाहरण देखें तो तमिलनाडु में हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त विभाग लगभग चालीस हजार से अधिक मंदिरों का संचालन करता है.

आंध्र प्रदेश का प्रसिद्ध तिरुमला तिरुपति देवस्थानम एक स्वतंत्र ट्रस्ट है, जो भगवान वेंकटेश्वर मंदिर का प्रबंधन देखता है, लेकिन इसके बोर्ड के सदस्यों और सीईओ की नियुक्ति राज्य सरकार ही करती है. केरल में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड साल 1950 से सबरीमाला सहित एक हजार से ज्यादा मंदिरों को संभाल रहा है.

उत्तर प्रदेश में साल 1983 में काशी विश्वनाथ मंदिर में हुई एक बड़ी चोरी के बाद सरकार ने विशेष कानून बनाकर मंदिर का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया था, जहां सरकार द्वारा नियुक्त सीईओ व्यवस्था देखता है. इसी तरह जम्मू कश्मीर में माता वैष्णो देवी मंदिर का प्रबंधन भी सरकार द्वारा गठित बोर्ड ही करता है.

मिलने वाले चढ़ावे का कहां होता है इस्तेमाल
देश के कई बड़े मंदिर ट्रस्ट के जरिए संचालित होते हैं. जैसे अयोध्या के राम मंदिर के लिए अलग ट्रस्ट बनाया गया है, वैसे ही कई प्रसिद्ध मंदिरों का भी अपना ट्रस्ट या सरकारी प्रबंधन है. इन मंदिरों में हर साल करोड़ों रुपये का चढ़ावा आता है. कुछ मंदिरों का संचालन ट्रस्ट करते हैं, जबकि कुछ मंदिर सीधे सरकारी नियंत्रण में होते हैं. ऐसे मामलों में अक्सर यह सवाल उठता है कि मंदिरों में आने वाले दान का पैसा आखिर किन कामों में खर्च किया जाता है.

छोटे मंदिरों में मिलने वाला चढ़ावा आमतौर पर मंदिर के रखरखाव, पूजा-पाठ, पुजारियों और सेवादारों के खर्च तथा भंडारे जैसे धार्मिक आयोजनों में इस्तेमाल होता है. वहीं बड़े मंदिरों के कई ट्रस्ट अस्पताल, स्कूल, धर्मशालाएं और सामाजिक सेवा से जुड़े काम भी चलाते हैं. हालांकि देशभर के मंदिरों को हर साल कितना चढ़ावा मिलता है और उसका कितना हिस्सा किस काम में खर्च होता है, इसका कोई एकीकृत और पारदर्शी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

इसी वजह से समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि मंदिरों की दान राशि के उपयोग को लेकर स्पष्ट व्यवस्था और पारदर्शिता हो. साथ ही यह भी तय किया जाए कि हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार और समाज के कल्याण के लिए इस धन का सबसे प्रभावी और संतुलित उपयोग किस प्रकार किया जाए.

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