भाजपा और जदयू, दोनों दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार के हैं। बीजेपी के नितिन नवीन तो जेडीयू के नीतीश कुमार, लेकिन अभी तक दोनों अध्यक्षों ने भरत तिवारी एनकाउंटर पर कुछ नहीं बोला है। भाजपा के कुछ नेताओं ने पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाये तो पार्टी प्रवक्ता ने कहा दिया कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक कुछ कहने से बचें। यानी भाजपा नेताओं को फिलहाल इस मामले में बोलने से रोक दिया गया है।
जदयू के वरिष्ठ नेता अशोक चौधरी ने मिलीजुली प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने अपनी ही सरकार की पुलिस से पूछा है- जब विक्षिप्त आदमी ने सरेंडर कर दिया तो क्यों मारोगे? तुम पकड़ते, 10 डंडा मारते, थाना ले आते, मेडिकल कराते, इलाज के लिए भेजते। सब व्यवस्था है न! लेकिन अशोक चौधरी ने इस घटना के बाद हो रही राजनीति पर कटाक्ष किया है। उन्होंने कहा, महापंचायत हो, महाकुंभ हो! ठीक है लोगों की भावना है, अपनी भावना व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन उससे हम लोगों को क्या मतलब।
जनता का गुस्सा अब जनाक्रोश में बदला, जनाक्रोश को भुनाने की कोशिश
भरत तिवारी एनकाउंटर मामला जिस तरह से तूल पकड़ रहा है, वह राज्य सरकार के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। सात दिन में यह मामला एक बड़े जनाक्रोश में बदल गया है। राजनीतिक दलों के एंट्री ने विवादों की आग को और हवा दी है। जनसुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर बुधवार को महापंचायत में शामिल होने पहुंचे। न्याय की लड़ाई के लिए अपना समर्थन दिया। राज्य सरकार पर सवाल उठाये।
राजद से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके भोजपुरी फिल्म स्टार खेसारी लाल यादव तीन दिन पहले पीड़ित परिवार से मिलने बिलौटी पहुंचे थे। उन्होंने सच्चाई सामने लाने के लिए आंदोलन की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने बिहार सरकार और व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया। खेसारी लाल ने पीड़ित परिवार को 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी दी। भोजपुरी सिनेमा के एक और स्टार और भाजपा के नये-नये बने एमएलसी, पवन सिंह ने भी भरत तिवारी के परिवार के प्रति अपनी संवेदना प्रकट की और इस मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
सरकार के खिलाफ बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश
महापंचायत में लोगों के महाजुटान से यह साफ हो गया कि भरत तिवारी एनकाउंटर मामला अब बिहार का एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। इसकी आंच अब उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल तक पहुंच गयी है। बुधवार को महापंचायत में इन तीन राज्यों से लोग शामिल होने आये। जब महापंचायत में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के खिलाफ नारे लगने लगे और उनसे इस्तीफे की मांग होने लगी तो यह साफ हो गया कि यह घटना अब राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील हो गयी है।
कुछ विपक्षी दल इस जनाक्रोश को अपने हक में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि एनडीए सरकार के खिलाफ उनके पास एक बड़ा मौका है। वे सम्राट सरकार को इतना ‘डिफेम’ करना चाहते हैं कि उसका मनोबल टूट जाए और वह एनकाउंटर पॉलिसी से तौबा कर ले।
बड़े नेता जांच के बाद ही कुछ बोलेंगे
चूंकि सारे सवाल पुलिसकर्मियों के खिलाफ हैं। आरोपी पुलिसवालों पर कार्रवाई भी हो चुकी है। ऐसे में एनडीए सरकार बैकफुट पर है। जब तक कोई ठोस जांच नहीं होती, घटना के लिए जिम्मेदार की पहचान नहीं होती, तब तक नितिन नवीन और नीतीश कुमार, कोई आधिकारिक बयान देने की जोखिम नहीं उठा सकते। अगर बयान के एक शब्द पर भी विवाद हो गया तो सरकारी की जड़ें हिल जाएंगी। विपक्षी दल तो इसी मौके की ताक में हैं।
अब इस मामले में करणी सेना का भी प्रवेश हो गया है। भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में जो कानून सम्मत रास्ता होगा वही मान्य होगा। अगर पुलिस गलत है तो वह भी कठोर दंड की भागी होगी। सरकार ने इस मामले की न्यायिक जांच की घोषणा की है, लेकिन उसका स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है। सत्ता को निष्पक्ष दिखने के लिए जल्द से जल्द कोई फैसला लेना होगा।







