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क्या यह तेहरान की जीत है !

UB India News by UB India News
June 17, 2026
in खास खबर, ब्लॉग
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क्या यह तेहरान की जीत है !
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22 अक्तूबर, 1951 का दिन था। ईरान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग फिलाडेल्फिया में स्थित लिबर्टी बेल के सामने खड़े थे। इंडिपेंडेंस हॉल में जुटी सैकड़ों लोगों की भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने अमेरिका की आजादी के संघर्ष की तारीफ की और उस वक्त ब्रिटिश नियंत्रण से खुद को मुक्त कराने के लिए चल रहे ईरानी आंदोलन से इसकी समानताएं भी बताईं। उन्होंने कहा, ‘राष्ट्रीय आजादी का सिद्धांत सार्वभौमिक है और सभी इसे मानते हैं।’ लेकिन, इसके सिर्फ दो वर्ष बाद हालात बिल्कुल बदल गए।

ईरानी तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण करने और ब्रिटिश स्वामित्व वाली एंग्लो-ईरानी तेल कंपनी पर नियंत्रण स्थापित करने के मोसादेग के फैसले के चलते अमेरिका व ब्रिटेन ने एक तख्तापलट का समर्थन किया। नतीजतन, मोसादेग को सत्ता से हटा दिया गया। उस दौर में, जब उपनिवेशवाद से मुक्त हो रहे अनेक देश अपनी नई राष्ट्रीय पहचान गढ़ रहे थे, मोसादेग का नाम आजादी की चाहत और पश्चिमी साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई का पर्याय बन गया। आज भी उन्हें हटाए जाने की घटना को वैश्विक दक्षिण (विकासशील देशों) में अमेरिकी विदेश नीति की सबसे बड़ी व ऐतिहासिक गलतियों में से एक माना जाता है। आज, पश्चिमी दबाव के सामने ईरान का प्रतिरोध एक बार फिर कई देशों के एकजुट होने का कारण बन गया है।

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और ईरान को निशाना बनाने वाली अमेरिकी कार्रवाइयों को कई लोग एक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं-एक ऐसी हिंसक सजा, जो किसी भी अव्यवस्थित देश को मिल सकती है। आलम यह है कि वे देश भी, जो ईरानी सरकार की घरेलू नीतियों या क्षेत्रीय गतिविधियों से सहमत नहीं हैं, कई मामलों में ‘जे सुई ईरान’ (मैं भी ईरान हूं) जैसी भावना को महसूस कर रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि अमेरिका और इस्राइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध ऐसे समय में छेड़ा, जब दुनिया खुद को फिर से व्यवस्थित कर रही थी और कई देश खुद को डोनाल्ड ट्रंप की ‘लेन-देन’ आधारित तथा दबावपूर्ण विदेश नीति के अनुरूप ढालने का दबाव महसूस कर रहे थे।

अपनी संप्रभुता और रणनीतिक स्वतंत्रता को बचाए रखने के लिए छोटे और मध्यम दर्जे के देश अब नए विकल्पों की तलाश में हैं। कई राष्ट्र अमेरिका पर निर्भरता कम करते हुए चीन व अन्य ताकतों के साथ अपने व्यापार और संबंध बढ़ा रहे हैं। ऐसे माहौल में ईरान के खिलाफ युद्ध तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था का एक निर्णायक मोड़ बनकर उभरा है। ईरान ने न केवल यह दिखाया है कि वह वैश्विक समुद्री व्यापार के एक अहम रास्ते (चोकपॉइंट) को प्रभावित करने और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बनाने की क्षमता रखता है, बल्कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकतों के हवाई हमलों का बखूबी सामना भी कर सकता है। शायद यही कारण है कि कभी वैश्विक व्यवस्था के हाशिये पर धकेला गया, प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव से घिरा ईरान आज दुनिया के कई हिस्सों में प्रतिरोध, आत्मसम्मान और दबाव के सामने न झुकने वाली राजनीतिक इच्छाशक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है।

गौरतलब है कि 1953 में मोसादेग को सत्ता से हटाने के बाद ईरान सदमे में आ गया था और वहां के लोग वाशिंगटन के इरादों को लेकर बहुत सतर्क हो गए थे। अमेरिका का साथ देने की वजह से शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने जो विश्वसनीयता खोई थी, उसे वह कभी वापस नहीं पा सके। इस संदेहपूर्ण माहौल में आखिरकार 1979 की क्रांति हुई। इसके बाद, नए इस्लामिक गणराज्य और अमेरिका के बीच तनाव हिंसक दुश्मनी में बदल गया और दोनों देशों के बीच राजनीतिक टकराव की भाषा भी पूरी तरह बदल गई। मोसादेग के दौर की शिष्ट भाषा की जगह नए नेता अयातुल्ला रूहोल्लाह खोमैनी की तीखी बातें आ गईं। खोमैनी ने अमेरिका के लिए ‘महान शैतान’, ‘घायल सांप’ और ‘दुनिया के गरीबों और शोषितों का सबसे बड़ा दुश्मन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। दूसरी ओर, अमेरिका की भाषा भी तीखी होती गई। अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने ईरान के नेतृत्व को क्यूबा, लीबिया, उत्तर कोरिया और निकारागुआ के शासकों की श्रेणी में रखते हुए उन्हें गैर-जिम्मेदार, सनकी और आपराधिक प्रवृत्ति वाले नेता करार दिया। इतना ही नहीं, 2000 के दशक के आखिर तक, जॉन मैक्केन और हिलेरी क्लिंटन ने ईरान पर बम गिराने की हिंसक धमकियों को अमेरिका की विदेश नीति की आम बातचीत बना दिया।

खोमैनी के बाद सर्वोच्च नेता बने अयातुल्ला अली खामनेई ने भी अमेरिका के प्रति वही कठोर और गुस्से भरी भाषा का सिलसिला जारी रखा। अपनी मृत्यु से महज ग्यारह दिन पहले 86 वर्षीय खामनेई ने अमेरिका को ‘पतन की ओर बढ़ता हुआ साम्राज्य’ करार दिया था। आज जब ईरान दुनिया की ओर देखता है, तो उसे कई देशों में इसी तरह की असंतुष्टि और संदेह की भावना दिखाई देती है। हालांकि, पश्चिम एशिया में चीन और रूस के हित एक जैसे नहीं हैं। चीन अपने आर्थिक निवेश और तेल की स्थिर कीमतों को लेकर चिंतित रहता है, जबकि रूस की सोच अलग है। फिर भी, दोनों ने स्वयं को ऐसी शक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया है, जो युद्ध और बाहरी दबाव से प्रभावित देशों तथा क्षेत्रीय समूहों के साथ संबंध मजबूत करने को तैयार हैं। हालांकि, कई देश ऐसे भी रहे, जिन्होंने इस मुद्दे पर खुलकर कोई पक्ष लेने के बजाय चुप रहना ही बेहतर समझा। शायद इसलिए, क्योंकि वे नहीं जानते कि भविष्य में डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों या दबाव का अगला निशाना कौन-सा देश बन सकता है।

कुछ लोग इस बात से सहमत नहीं हैं कि ईरान द्वारा अमेरिका का सफलतापूर्वक विरोध करने से अमेरिका का प्रभाव कम हो जाएगा। आखिर, अमेरिका की सैन्य हार कोई नई बात नहीं है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिका के ज्यादातर सैन्य दखल-वियतनाम, कोरिया, अफगानिस्तान और इराक-ऐसे लंबे खिंचने वाले और कम तीव्रता वाले संघर्षों में बदले, जिन्हें शायद ही कोई जीत कह सकता है। लेकिन, यह तय है कि ट्रंप और इस्राइल ने मिलकर ईरान की सरकार को और मजबूत किया है। अब यह कहना तो मुश्किल है कि इस्लामी रिपब्लिक को लेकर लोगों की अच्छी सोच कब तक बनी रहेगी। लेकिन, फिलहाल ईरान के पास एक दिलचस्प कहानी है और इसे सुनाने की क्षमता भी।

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