नब्बे के दशक में बंदूकों की गूंज और वैशाली उपचुनाव की सियासी लहर से अपनी पहचान बनाने वाले आनंद मोहन आज एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं. उनकी ताज़ा नाराज़गी ने बिहार की राजनीति में एक नया उबाल ला दिया है. वह जेडीयू पर ‘नीतीश कुमार की तपस्या पर पानी फेरने’ और ‘पार्टी को थैलीशाहों के हाथों बेचने’का आरोप लगा रहे हैं. उनकी नाराज़गी की मुख्य वजह उनके बेटे चेतन आनंद को नई सरकार में मंत्री न बनाया जाना है.
इस ताज़ा घटनाक्रम और 1994 के इतिहास के झरोखे से यह समझना बेहद दिलचस्प है कि आज के दौर में आनंद मोहन बिहार की राजनीति में कितने प्रासंगिक रह गए हैं? 1994 का वह दौर बिहार की सियासत का सबसे गर्म और हिंसक दौर था.लालू यादव का ‘अभेद्य किला’ और कथित सामाजिक न्याय की मुहिम चरम पर थी. उसे चुनौती देने के लिए आनंद मोहन ने अपनी ताकत झोंक दी थी. वैशाली लोकसभा का वह उपचुनाव महज़ एक सीट का चुनाव नहीं था,बल्कि वह लालू राज के खिलाफ अगड़ी जातियों और सवर्णों के ‘अस्तित्व की लड़ाई’ बन चुका था.
मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज के उस काउंटिंग सेंटर के ठीक बाहर मैं खुद मौजूद था .तब आरडीएस कॉलेज से इंटर साइंस की पढ़ाई कर रहा था.नब्बे के दशक में मुजफ्फरपुर का आरडीएस कॉलेज हो या एलएस कॉलेज, पढ़ाई से ज्यादा चर्चा वहां के होस्टल गैंगवार और छात्र राजनीति की होती थी. काउंटिंग के दिन पूरे बिहार के ‘एंटी-लालू’ वोटरों की निगाहें मुजफ्फरपुर की तरफ टिकी थीं. चुनाव में आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद का मुकाबला कांग्रेस की कद्दावर नेता किशोरी सिन्हा से था. वो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी और दिग्गज राजपूत चेहरा मानी जा रही थी. यह लड़ाई दिलचस्प इसलिए थी क्योंकि लालू यादव ने परदे के पीछे से किशोरी सिन्हा को समर्थन दे रखा था ताकि आनंद मोहन के उभार को रोका जा सके.
मतपेटियों का दौर और ढलता सूरज
आज के दौर की तरह तब ईवीएम (EVM) नहीं थे कि दो-तीन घंटे में नतीजे आ जाएं. बैलट पेपर की गिनती की प्रक्रिया बेहद धीमी और तनावपूर्ण थी. आरडीएस कॉलेज में पढ़ाई तो वैसे भी नाममात्र की होती थी,इसलिए उस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए मैं भी एलएस कॉलेज के गेट पर ही डटा रहा.जैसे-जैसे सूरज ढलने लगा, वैसे-वैसे काउंटिंग सेंटर के बाहर खड़े हुजूम की धड़कनें तेज होने लगीं. गेट के ठीक सामने एक मकान था, जहाँ आनंद मोहन और लवली आनंद खुद मौजूद थे और पल-पल के रुझानों पर नज़र बनाए हुए थे. शाम ढलते-ढलते यह पूरी तरह साफ हो गया कि लवली आनंद ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली है.
आज के दौर की तरह तब ईवीएम (EVM) नहीं थे कि दो-तीन घंटे में नतीजे आ जाएं. बैलट पेपर की गिनती की प्रक्रिया बेहद धीमी और तनावपूर्ण थी. आरडीएस कॉलेज में पढ़ाई तो वैसे भी नाममात्र की होती थी,इसलिए उस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए मैं भी एलएस कॉलेज के गेट पर ही डटा रहा.जैसे-जैसे सूरज ढलने लगा, वैसे-वैसे काउंटिंग सेंटर के बाहर खड़े हुजूम की धड़कनें तेज होने लगीं. गेट के ठीक सामने एक मकान था, जहाँ आनंद मोहन और लवली आनंद खुद मौजूद थे और पल-पल के रुझानों पर नज़र बनाए हुए थे. शाम ढलते-ढलते यह पूरी तरह साफ हो गया कि लवली आनंद ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली है.
गॉगल्स और वो गगनभेदी हुंकार
जीत की घोषणा होते ही जो मंजर वहां दिखा, वह आज भी बिहार की राजनीति की यादों में दर्ज है. अपनी आँखों पर काला चश्मा चढ़ाए, रौबीली मूंछों और कड़क आवाज़ के मालिक आनंद मोहन जब उस घर से बाहर निकले, तो छाता चौक का पूरा इलाका “आनंद मोहन जिंदाबाद” और “लवली आनंद जिंदाबाद” के नारों से गूंज उठा. भीड़ के उस बेकाबू जोश और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच आनंद मोहन ने सीधे मीडिया और जनता के सामने अपनी कड़क आवाज़ में जो हुंकार भरी. वह महज़ एक बयान नहीं, बल्कि लालू सत्ता के लिए सीधी चेतावनी थी. आनंद मोहन ने सीधे कैमरे की तरफ देखते हुए कहा था,”छह महीने में हम बिहार के सीएम होंगे…”
जीत की घोषणा होते ही जो मंजर वहां दिखा, वह आज भी बिहार की राजनीति की यादों में दर्ज है. अपनी आँखों पर काला चश्मा चढ़ाए, रौबीली मूंछों और कड़क आवाज़ के मालिक आनंद मोहन जब उस घर से बाहर निकले, तो छाता चौक का पूरा इलाका “आनंद मोहन जिंदाबाद” और “लवली आनंद जिंदाबाद” के नारों से गूंज उठा. भीड़ के उस बेकाबू जोश और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच आनंद मोहन ने सीधे मीडिया और जनता के सामने अपनी कड़क आवाज़ में जो हुंकार भरी. वह महज़ एक बयान नहीं, बल्कि लालू सत्ता के लिए सीधी चेतावनी थी. आनंद मोहन ने सीधे कैमरे की तरफ देखते हुए कहा था,”छह महीने में हम बिहार के सीएम होंगे…”

आनंद मोहन ने कभी हथियार उठा लिया था
यह वो पल था जिसने बिहार के कसमसाए और डरे हुए सवर्ण समाज में एक नई जान फूंक दी थी. उन्हें लगा था कि लालू के ‘भूरा बाल साफ करो’ वाले दौर में उन्हें एक ऐसा ‘मसीहा’ मिल गया है जो लालू को उन्हीं की भाषा में,उन्हीं की शैली में खुली चुनौती दे सकता है. सनद रहे कि चुनाव परिणाम के कुछ महीने बाद ही मुजफ्फरपुर के भूमिहार डॉन छोटन शुक्ला की हत्या होती है.पांच नवंबर, 1994 की शाम छोटन के जनाजे में गोपालगंज के डीएम जी कृष्णैया को उग्र भीड़ मार डालती है. बाद में आनंद मोहन इसी केस में सजायाफ्ता होते हैं लेकिन तब अगड़ों के मसीहा बनते हैं.
इतिहास का कनेक्शन और आज की नाराजगी की असली जड़
जब हम1994 के इस किस्से को आज (2026) के घटनाक्रम से जोड़कर देखते हैं, तो आनंद मोहन का दर्द और उनकी झुंझलाहट को समझना आसान हो जाता है. आज जब आनंद मोहन कहते हैं कि “बिहार में एनडीए वैशाली की 1994 की जीत के बाद मेरी बदौलत बना था, जब मेरी बिहार पीपुल्स पार्टी का समता पार्टी में विलय हुआ था…” तो वह दरअसल इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हवाला दे रहे होते है. वे आज की पीढ़ी और नीतीश कुमार को याद दिलाना चाहते हैं कि जब नीतीश की समता पार्टी 1995 में महज़ 7 सीटों पर सिमट गई थी और उनके 271 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी, तब आनंद मोहन का बाहुबल और उनकी पार्टी का जनाधार ही था जिसने बाद में नीतीश कुमार को पैर जमाने की ज़मीन दी थी.
जब हम1994 के इस किस्से को आज (2026) के घटनाक्रम से जोड़कर देखते हैं, तो आनंद मोहन का दर्द और उनकी झुंझलाहट को समझना आसान हो जाता है. आज जब आनंद मोहन कहते हैं कि “बिहार में एनडीए वैशाली की 1994 की जीत के बाद मेरी बदौलत बना था, जब मेरी बिहार पीपुल्स पार्टी का समता पार्टी में विलय हुआ था…” तो वह दरअसल इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हवाला दे रहे होते है. वे आज की पीढ़ी और नीतीश कुमार को याद दिलाना चाहते हैं कि जब नीतीश की समता पार्टी 1995 में महज़ 7 सीटों पर सिमट गई थी और उनके 271 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी, तब आनंद मोहन का बाहुबल और उनकी पार्टी का जनाधार ही था जिसने बाद में नीतीश कुमार को पैर जमाने की ज़मीन दी थी.

मुजफ्फरपुर के एलएस कॉलेज के गेट पर 1994 की उस शाम जो आनंद मोहन खुद को “अगला सीएम” घोषित कर रहे थे, आज 32 साल बाद वे अपने बेटे चेतन आनंद को एक अदद मंत्री पद न मिलने पर जेडीयू और नीतीश कुमार से बगावत करने पर मजबूर हैं. समय का चक्र देखिए कि जिस वैशाली और मुजफ्फरपुर की धरती ने उन्हें ‘रॉबिनहुड’ बनाया, आज उसी अतीत की दुहाई देकर वे अपनी बची-कुची राजनीतिक प्रासंगिकता को बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं. इतिहास गवाह है कि राजनीति में ‘अतीत के कर्ज’ पर ज्यादा दिनों तक दुकानें नहीं चलाई जा सकतीं, और आनंद मोहन की मौजूदा नाराजगी इसी कड़वी हकीकत का सबूत है.
क्या आनंद मोहन का वह ‘वजन’ बरकरार है?
आनंद मोहन का यह दावा ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह गलत नहीं है कि उन्होंने एनडीए की बुनियाद रखने में बड़ी भूमिका निभाई थी. लेकिन 1994 और आज के समय में जमीन-आसमान का फर्क है. नब्बे के दशक में आनंद मोहन के पीछे अगड़ी जातियों का जो स्वाभाविक और आक्रामक जनसमर्थन था,वह वक्त के साथ काफी बिखरा है. आज का युवा वोटर महज़ ‘बाहुबल’ या ‘अतीत के रॉबिनहुड’ वाली छवि से प्रभावित नहीं होता.
नीतीश पर नरम, जेडीयू की चौकड़ी पर गरम क्यों हैं आनंद मोहन?
जी.कृष्णैया हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे आनंद मोहन की अप्रैल 2023 में जेल से रिहाई बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा रणनीतिक कदम था. नीतीश कुमार ने बिहार जेल नियमावली (Prison Manual) में संशोधन करके ‘ड्यूटी पर तैनात सरकारी सेवक की हत्या’ वाले क्लॉज को हटाया था ताकि आनंद मोहन बाहर आ सकें. नीतीश कुमार ने ये उपकार अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि राजपूत वोटों को साधने और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के खिलाफ एक मजबूत सवर्ण चेहरा खड़ा करने की मजबूरी में किया था.
बदले में क्या मिला? आनंद मोहन ने अपनी वफादारी बदली, उनकी पत्नी लवली आनंद लोकसभा पहुंचीं और बेटा चेतन आनंद विधायक बना. लेकिन आनंद मोहन की महत्वाकांक्षा इससे कहीं बड़ी थी. वह अपने बेटे चेतन आनंद के लिए नीतीश कैबिनेट में मंत्री पद चाहते हैं.
क्या आनंद मोहन का राजपूत कार्ड जेडीयू को नुकसान पहुंचाएगा?
बिहार की राजनीति अब ‘अतीत के दिग्गजों’ से आगे बढ़कर नए जातीय समीकरणों की तरफ बढ़ रही है. नीतीश कुमार के प्रभाव के धीमे होने और उपमुख्यमंत्री से मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे सम्राट चौधरी के उभार ने सत्ता के संतुलन को बदल दिया है. बीजेपी और नई एनडीए सरकार यह मानती है कि आनंद मोहन के परिवार को पहले ही पर्याप्त राजनीतिक हिस्सेदारी दी जा चुकी है. मंत्री पद न मिलने से तिलमिलाए आनंद मोहन ने एक बार फिर ‘राजपूत स्वाभिमान’ और ‘जातीय गोलबंदी’ का कार्ड खेला है. वह खुद को दरकिनार महसूस कर रहे हैं.
एक लाइन में कहें तो आनंद मोहन आज बिहार की राजनीति में किंगमेकर नहीं है. वे किसी गठबंधन को अपने दम पर चुनाव नहीं जिता सकते, लेकिन यदि वे नाराज़ होकर अलग रास्ता चुनते हैं, तो एनडीए के कुछ सवर्ण वोटों को छिटकाकर नुकसान ज़रूर पहुंचा सकते हैं। उनकी मौजूदा प्रासंगिकता महज़ एक ‘प्रेशर ग्रुप’के नेता के रूप में बची है, जो अपने परिवार के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अतीत के गौरव का सहारा ले रहे हैं.







