विजयादशमी का महापर्व आश्विन शुक्ल दशमी तिथि को मनाया जाता है। भारतीय सनातन परंपरा में इसे आसुरी प्रवृत्तियों पर सात्विकता की विजय के प्रतीक के रूप में माना गया है। पूर्वकाल में इसी दिन समस्त देवी-देवताओं की शक्तियों का मूल तत्व मां श्रीदुर्गा ने महादानव महिषासुर का वध करके सभी असुर-महापापी राक्षसों से संपूर्ण पृथ्वी को मुक्त कराया था। वर्तमान श्रीश्वेतवाराह कल्प के वैवस्वत मन्वंतर के चौबीसवें चतुर्गीय के त्रेता युग में भगवान श्रीमहाविष्णु ने अयोध्या के चक्रवर्ती राजा महाराज दशरथ के यहां पुत्र रूप में (श्रीराम के रूप में) जन्म लिया था। उन्होंने महाप्रतापी परम शिवभक्त आसुरी प्रवृत्तियों वाले अहंकारी-आततायी लंकापति राजा रावण का वध करके संपूर्ण नारी शक्ति के सम्मान का प्रतीक मां सीता को उसके चंगुल से मुक्त कराया था। तभी से इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत अथवा अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में मनाया जाने लगा। संयोगवश उस दिन आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी तो महात्माओं ने इस तिथि का नाम ‘विजयादशमी’ रखा।
इस दिन देवी भक्तों द्वारा जगह-जगह मां दुर्गा की पूजा-आरती होती है और झांकी भी निकाली जाती हैं। भक्तगण और दर्शक उन झांकियों पर पुष्प वर्षा करते हैं। पांडालों में प्रतिपदा तिथि से चल रहे यज्ञादि कर्म संपन्न किए जाते हैं। जगह-जगह भोजन-भंडारे का भी प्रबंध किया जाता है। जन मानस उस परम स्वादिष्ट प्रसाद का भरपूर आनंद लेता है। गांव-गांव, शहर-शहर हर कस्बे में सनातन धर्मी सामूहिक रूप से भगवान श्रीराम द्वारा की गईं लीलाओं का मंचन करते हैं, जिसके फलस्वरूप संपूर्ण वातावरण राममय हो जाता है। बुरे कर्म करने वालों का अंत भी बुरा ही होता है। समाज को यह संदेश देने के लिए भक्तगण रावण, उसके भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद के बड़े-बड़े पुतले बनाकर धनुष-बाण द्वारा अग्निवाण मारकर उन पुतलों को अग्निदेव को समर्पित करते हैं, जिसे जन मानस में रावण दहन कहा जाता है। उस समय तमाम आतिशबाजियों और पटाकों से वातावरण जगमगा जाता है और दृश्य भी अभूतपूर्व रहता है।
संपूर्ण कार्य-सिद्धि दिवस : वैदिक ज्योतिष में वसंत पंचमी, अक्षय तृतीया और विजयादशमी को वर्ष के श्रेष्ठतम महामुहूर्त होने का स्थान प्राप्त है। इस दिन किया गया कोई भी कार्य, चाहे वो गृह आरंभ हो, गृह प्रवेश हो, फैक्ट्री आदि बनाने के लिए भूमि पूजन हो, मकान-वाहन का क्रय करना हो तथा इस तरह के जितने चल-अचल से संबंधित कार्य, शादी-विवाह से संबंधित कार्य हों, उन्हें करने के लिए यह अक्षुण शुभ फलदायी मुहूर्त है। इस दिन किया गया कोई शुभ कार्य, धर्म-कर्म, दान-पुण्य आदि कभी निष्फल नहीं होता।
शास्त्रों कहा गया है कि ‘आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये। स कालो विजयो ज्ञेयः सर्वकार्यार्थसिद्धये।।’ अर्थात- आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को जब आसमान में तारों का उदय होता है तो उस काल को ‘विजयीकाल’ कहा जाता है। ऐसे में इस दिन सायंकाल प्रदोष वेला से लेकर निशीथकाल तक के मध्य घर अथवा संस्थान में भगवान श्रीराम, देवी सीता, लक्ष्मण जी सहित राम दरबार की पूजा के साथ-साथ मां अपराजिता की पूजा, आयुध की पूजा भी करनी चाहिए। इस विजयी और समस्त कार्यों की सिद्धि देने वाले महामुहूर्त का शुभारंभ सुबह सूर्योदयकाल से ही आरंभ हो जाएगा। गृह प्रवेश, भूमि पूजन, मकान अथवा वाहन आदि क्रय-विक्रय, नौकरी अथवा किसी नए अनुबंध पर हस्ताक्षर करने का कार्य दिन में संपन्न किया जा सकता है। दान-पुण्य का महत्व भी पूरे दिन रहेगा।
राम का एक ही चेहरा है: जिस आदमी ने एक चेहरा पा लिया, वह राम हो गया
हम या तो रावण हो सकते हैं या राम, मध्य में होने का कोई उपाय नहीं। हमारे मन की तकलीफ यह है कि यह तो हम भी समझते हैं कि राम हम नहीं हैं, मगर यह अहंकार को चोट देती है कि तो फिर रावण ही बचते हैं, वह मानने को मन राजी नहीं होता। मन कहता है, माना कि राम नहीं हैं, क्योंकि इतनी घोषणा करनी भी जरा मुश्किल मालूम पड़ती है। चारों तरफ लोग जानते हैं कि राम हम नहीं हैं, किसके सामने घोषणा करें? लोग सिर्फ हंसेंगे। तो राम तो हम होने को नहीं कह पाते। कहना तो चाहते हैं, कह नहीं पाते, वास्तविक कठिनाइयां हैं, लेकिन रावण मानने का भी मन नहीं होता। तो बीच का मार्ग हम खोज लेते हैं। अगर रावण के व्यक्तित्व को समझें, तो पाएंगे कि तुम मध्य में तो हो ही नहीं सकते, छोटे या बड़े रावण हो सकते हो।
रावण में ऐसा क्या है, जो हममें नहीं? इसे समझें। रावण में साम्राज्य विस्तार की आकांक्षा है, लेकिन वह बड़ा विद्वान और शास्त्रों का ज्ञाता भी है। रावण के गुणधर्मों में ऐसा कौन-सा है, जो हम खुद में न पाएं।
रावण धन का दीवाना है, इसलिए उसकी स्वर्ण की नगरी है। फिर भी दूसरे का धन, दूसरे का राज्य उसे आकर्षित करता है। राम की अयोध्या सोने की नहीं है, फिर भी राम को दूसरे की किसी चीज या राज्य में कोई रस नहीं है। राम जैसी चेतना का व्यक्ति झोपड़े में रहे, तो भी महल आकर्षित नहीं करता। राम जैसा व्यक्ति जहां भी रहे, वहीं महल है। रावण जैसा व्यक्ति जहां भी रहे, वहीं दुख है। रावण के दस सिर कहे हैं हमने। हर आदमी के दस सिर हैं। क्योंकि हमको कई चेहरे तैयार रखने पड़ते हैं, सुबह से शाम तक कई दफे बदलने पड़ते हैं।
राम का एक ही चेहरा है। सुख में, दुख में, महल हो या जंगल में, उनके चेहरे में भेद नहीं। और जिस आदमी ने एक चेहरा पा लिया, वह राम हो गया। यानी उसका चेहरा प्रामाणिक हो गया, जिसका चेहरा भीतरी हो गया, जो बाहर को देखकर चेहरे नहीं बदलता। उसका होना थिर हो गया है। इसी थिरता का नाम राम है। रावण को मारना इसीलिए मुश्किल हुआ कि असली चेहरे का पता ही नहीं है, झूठ के चेहरे को काट भी दो, तो कोई फर्क नहीं पड़ता, न वहां रक्त है, न मांस है, वह सिर्फ एक ख्याल था, उसे काट दिया, तो आप तुरंत दूसरा पैदा कर लोगे।
विजयादशमी का महापर्व आश्विन शुक्ल दशमी तिथि को मनाया जाता है। भारतीय सनातन परंपरा में इसे आसुरी प्रवृत्तियों पर सात्विकता की विजय के प्रतीक के रूप में माना गया है। पूर्वकाल में इसी दिन समस्त देवी-देवताओं की शक्तियों का मूल तत्व मां श्रीदुर्गा ने महादानव महिषासुर का वध करके सभी असुर-महापापी राक्षसों से संपूर्ण पृथ्वी को मुक्त कराया था। वर्तमान श्रीश्वेतवाराह कल्प के वैवस्वत मन्वंतर के चौबीसवें चतुर्गीय के त्रेता युग में भगवान श्रीमहाविष्णु ने अयोध्या के चक्रवर्ती राजा महाराज दशरथ के यहां पुत्र रूप में (श्रीराम के रूप में) जन्म लिया था। उन्होंने महाप्रतापी परम शिवभक्त आसुरी प्रवृत्तियों वाले अहंकारी-आततायी लंकापति राजा रावण का वध करके संपूर्ण नारी शक्ति के सम्मान का प्रतीक मां सीता को उसके चंगुल से मुक्त कराया था। तभी से इस दिन को बुराई पर अच्छाई की जीत अथवा अधर्म पर धर्म की विजय के रूप में मनाया जाने लगा। संयोगवश उस दिन आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी तो महात्माओं ने इस तिथि का नाम ‘विजयादशमी’ रखा।
इस दिन देवी भक्तों द्वारा जगह-जगह मां दुर्गा की पूजा-आरती होती है और झांकी भी निकाली जाती हैं। भक्तगण और दर्शक उन झांकियों पर पुष्प वर्षा करते हैं। पांडालों में प्रतिपदा तिथि से चल रहे यज्ञादि कर्म संपन्न किए जाते हैं। जगह-जगह भोजन-भंडारे का भी प्रबंध किया जाता है। जन मानस उस परम स्वादिष्ट प्रसाद का भरपूर आनंद लेता है। गांव-गांव, शहर-शहर हर कस्बे में सनातन धर्मी सामूहिक रूप से भगवान श्रीराम द्वारा की गईं लीलाओं का मंचन करते हैं, जिसके फलस्वरूप संपूर्ण वातावरण राममय हो जाता है। बुरे कर्म करने वालों का अंत भी बुरा ही होता है। समाज को यह संदेश देने के लिए भक्तगण रावण, उसके भाई कुंभकर्ण और पुत्र मेघनाद के बड़े-बड़े पुतले बनाकर धनुष-बाण द्वारा अग्निवाण मारकर उन पुतलों को अग्निदेव को समर्पित करते हैं, जिसे जन मानस में रावण दहन कहा जाता है। उस समय तमाम आतिशबाजियों और पटाकों से वातावरण जगमगा जाता है और दृश्य भी अभूतपूर्व रहता है।
संपूर्ण कार्य-सिद्धि दिवस : वैदिक ज्योतिष में वसंत पंचमी, अक्षय तृतीया और विजयादशमी को वर्ष के श्रेष्ठतम महामुहूर्त होने का स्थान प्राप्त है। इस दिन किया गया कोई भी कार्य, चाहे वो गृह आरंभ हो, गृह प्रवेश हो, फैक्ट्री आदि बनाने के लिए भूमि पूजन हो, मकान-वाहन का क्रय करना हो तथा इस तरह के जितने चल-अचल से संबंधित कार्य, शादी-विवाह से संबंधित कार्य हों, उन्हें करने के लिए यह अक्षुण शुभ फलदायी मुहूर्त है। इस दिन किया गया कोई शुभ कार्य, धर्म-कर्म, दान-पुण्य आदि कभी निष्फल नहीं होता।
शास्त्रों कहा गया है कि ‘आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये। स कालो विजयो ज्ञेयः सर्वकार्यार्थसिद्धये।।’ अर्थात- आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को जब आसमान में तारों का उदय होता है तो उस काल को ‘विजयीकाल’ कहा जाता है। ऐसे में इस दिन सायंकाल प्रदोष वेला से लेकर निशीथकाल तक के मध्य घर अथवा संस्थान में भगवान श्रीराम, देवी सीता, लक्ष्मण जी सहित राम दरबार की पूजा के साथ-साथ मां अपराजिता की पूजा, आयुध की पूजा भी करनी चाहिए। इस विजयी और समस्त कार्यों की सिद्धि देने वाले महामुहूर्त का शुभारंभ सुबह सूर्योदयकाल से ही आरंभ हो जाएगा। गृह प्रवेश, भूमि पूजन, मकान अथवा वाहन आदि क्रय-विक्रय, नौकरी अथवा किसी नए अनुबंध पर हस्ताक्षर करने का कार्य दिन में संपन्न किया जा सकता है। दान-पुण्य का महत्व भी पूरे दिन रहेगा।
राम का एक ही चेहरा है: जिस आदमी ने एक चेहरा पा लिया, वह राम हो गया
हम या तो रावण हो सकते हैं या राम, मध्य में होने का कोई उपाय नहीं। हमारे मन की तकलीफ यह है कि यह तो हम भी समझते हैं कि राम हम नहीं हैं, मगर यह अहंकार को चोट देती है कि तो फिर रावण ही बचते हैं, वह मानने को मन राजी नहीं होता। मन कहता है, माना कि राम नहीं हैं, क्योंकि इतनी घोषणा करनी भी जरा मुश्किल मालूम पड़ती है। चारों तरफ लोग जानते हैं कि राम हम नहीं हैं, किसके सामने घोषणा करें? लोग सिर्फ हंसेंगे। तो राम तो हम होने को नहीं कह पाते। कहना तो चाहते हैं, कह नहीं पाते, वास्तविक कठिनाइयां हैं, लेकिन रावण मानने का भी मन नहीं होता। तो बीच का मार्ग हम खोज लेते हैं। अगर रावण के व्यक्तित्व को समझें, तो पाएंगे कि तुम मध्य में तो हो ही नहीं सकते, छोटे या बड़े रावण हो सकते हो।
रावण में ऐसा क्या है, जो हममें नहीं? इसे समझें। रावण में साम्राज्य विस्तार की आकांक्षा है, लेकिन वह बड़ा विद्वान और शास्त्रों का ज्ञाता भी है। रावण के गुणधर्मों में ऐसा कौन-सा है, जो हम खुद में न पाएं।
रावण धन का दीवाना है, इसलिए उसकी स्वर्ण की नगरी है। फिर भी दूसरे का धन, दूसरे का राज्य उसे आकर्षित करता है। राम की अयोध्या सोने की नहीं है, फिर भी राम को दूसरे की किसी चीज या राज्य में कोई रस नहीं है। राम जैसी चेतना का व्यक्ति झोपड़े में रहे, तो भी महल आकर्षित नहीं करता। राम जैसा व्यक्ति जहां भी रहे, वहीं महल है। रावण जैसा व्यक्ति जहां भी रहे, वहीं दुख है। रावण के दस सिर कहे हैं हमने। हर आदमी के दस सिर हैं। क्योंकि हमको कई चेहरे तैयार रखने पड़ते हैं, सुबह से शाम तक कई दफे बदलने पड़ते हैं।
राम का एक ही चेहरा है। सुख में, दुख में, महल हो या जंगल में, उनके चेहरे में भेद नहीं। और जिस आदमी ने एक चेहरा पा लिया, वह राम हो गया। यानी उसका चेहरा प्रामाणिक हो गया, जिसका चेहरा भीतरी हो गया, जो बाहर को देखकर चेहरे नहीं बदलता। उसका होना थिर हो गया है। इसी थिरता का नाम राम है। रावण को मारना इसीलिए मुश्किल हुआ कि असली चेहरे का पता ही नहीं है, झूठ के चेहरे को काट भी दो, तो कोई फर्क नहीं पड़ता, न वहां रक्त है, न मांस है, वह सिर्फ एक ख्याल था, उसे काट दिया, तो आप तुरंत दूसरा पैदा कर लोगे।