AI के तेजी से बढ़ते विकास और उसकी निगरानी को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच पेरिस में 10 फरवरी से शुरू होने वाला AI एक्शन समिट खास महत्व रखता है. यह समिट 2023 में ब्रिटेन के ब्लेचली पार्क में हुई एआई सुरक्षा समिट और 2024 में सियोल में हुए एक छोटे से सम्मेलन पर आधारित है. ब्लेचली समिट में एआई से आने वाले बड़े खतरों पर चर्चा हुई थी. इस बैठक के बाद 25 देशों, जिनमें अमेरिका और चीन भी शामिल थे ने एआई सुरक्षा के लिए ब्लेचली घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे. वहीं, सियोल समिट में मई 2024 में 16 बड़ी एआई कंपनियों ने पारदर्शी तरीके से एआई के विकास के लिए वॉलेंट्री कमिटमेंट दिया.
पेरिस AI सम्मेलन सिर्फ वैश्विक नीति पर चर्चा का मंच नहीं है, बल्कि भारत के लिए भी एक बड़ा मौका भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस सम्मेलन में शामिल होना भारत के एआई क्षेत्र की दिशा तय करने और वैश्विक स्तर पर उसकी भूमिका को मजबूत करने के लिए अहम साबित हो सकता है.
इस समिट का मुख्य फोकस एआई के विकास के साथ-साथ उसके संभावित खतरों से निपटने पर है. सम्मेलन में यह चर्चा होगी कि कैसे इनोवेशन और सुरक्षा के बीच संतुलन रखा जा सकता है. प्रधानमंत्री मोदी का पेरिस दौरा भारत की एआई नीति को दुनिया के सामने रखने और इस उभरते क्षेत्र में देश की स्थिति को मजबूत करने का बेहतरीन भी माना जा रहा है.
ऐसे में इस रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि पेरिस AI सम्मेलन का एजेंडा क्या है, पीएम मोदी का दौरा भारत के लिए कितना अहम है?
क्या है पेरिस एआई समिट का एजेंडा
पेरिस समिट फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पहल है, जिसका मकसद दुनिया भर में एआई के नियम और दिशा तय करना है. इस समिट में एआई के विकास, नए विचारों और समाज की भलाई पर बात की जाएगी. यह समिट इस बात पर ध्यान देगा कि कैसे एआई का इस्तेमाल किया जाए ताकि यह हर किसी के लिए फायदेमंद हो और साथ ही इसके संभावित खतरों से बचा जा सके. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समिट के सह-अध्यक्ष के रूप में शामिल होने के लिए पेरिस यात्रा करेंगे.
यह समिट एआई बाजार में बढ़ती ताकत और कुछ बड़ी कंपनियों जैसे, माइक्रोसॉफ़्ट, अल्फाबेट, अमेजन और मेटा के हाथों में बहुत सारा एआई का नियंत्रण होने पर चर्चा करेगा. इसके अलावा यह समिट, ग्लोबल एआई गवर्नेंस, इनोवेशन और सार्वजनिक हित से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित होगा.
यह सम्मेलन को 10 फरवरी को पेरिस के ग्रैंड पैलेस में शुरू होगा, जहां दुनिया भर के लोग, जैसे सरकार के अधिकारी, व्यापारी, समाज के लोग, शोधकर्ता, कलाकार और पत्रकार, एक मंच पर आएंगे. इस समिट के बाद कई बैठकें और प्रेजेंटेशन भी होगी, जो खास तौर पर एआई द्वारा दी जाने वाली समस्याओं के हल पर चर्चा करेंगी.
इसके अलावा 11 फरवरी को ग्रैंड पैलेस में राष्ट्राध्यक्षों और सरकारों का समिट होगा, जहां एआई पर सामान्य कार्रवाइयों पर चर्चा की जाएगी.
यह समिट यूरोप के लिए काफी महत्वपूर्ण
एक्सपर्ट्स की मानें तो फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की यह पहल यूरोप के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. दरअसल AI का शक्तिशाली विकास अब अमेरिका और चीन के बीच एक रेस का रूप ले चुका है और यूरोप इस दौड़ में पिछड़ता नजर आ रहा है, इस समिट के जरिय फ्रांस अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहता है.
खास बात ये है कि ये बैठक ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका ने ‘स्टारगेट प्रोजेक्ट’ नाम के एक विशाल एआई परियोजना की घोषणा की है और चीन के डीपसीक (DeepSeek) ने एक नया बड़ा लैंग्वेज मॉडल (LLM) विकसित किया है, जिसे ओपनएआई (OpenAI) के नए मॉडलों के बराबर का माना जा रहा है.
प्रधानमंत्री मोदी का पेरिस दौरा, भारत के लिए अहम अवसर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस सम्मेलन में सह-अध्यक्ष के रूप में भाग लेना भारत के लिए एक सुनहरा मौका है. दरअसल पीएम मोदी का यह दौरा न केवल भारत की तकनीकी शक्ति को वैश्विक मंच पर उजागर करेगा, बल्कि AI के क्षेत्र में इस देश की नीति और दृष्टिकोण को भी प्रमुखता से प्रस्तुत करेगा. भारत ने हमेशा यह रुख अपनाया है कि AI को सुरक्षित, पारदर्शी और विश्वासपूर्ण तरीके से विकसित किया जाए, ताकि इसका लाभ समाज के व्यापक वर्ग को मिल सके.
इस समिट के दौरान, भारत AI के नियम पर अपने दृष्टिकोण भी साझा कर सकता है, जो कि खासतौर पर इस तकनीक के संभावित खतरों, जैसे गोपनीयता, बायस और इंटेलैक्चुअल प्रॉपर्टी राइट से निपटने पर केंद्रित है. भारत का यह दृष्टिकोण अन्य देशों के लिए मार्गदर्शन का काम कर सकता है, खासकर विकासशील देशों के लिए, जो AI के लाभों को हासिल करने के साथ-साथ इसके जोखिमों से भी निपटने की कोशिश कर रहे हैं.
भारत का वैश्विक नेतृत्व और AI का भविष्य
प्रधानमंत्री मोदी का पेरिस AI सम्मेलन में शामिल होना भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत को दिखाता है. भारत, जो पहले से ही टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान बना चुका है, अब AI के मामले में भी अपनी भूमिका मजबूत करना चाहता है. पेरिस समिट में भारत का सक्रिय योगदान यह साफ करता है कि भारत AI के विकास और उसके नियमन में जिम्मेदार तरीके से अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है.
भारत न केवल अपनी तकनीकी क्षमताओं को बढ़ाने पर ध्यान दे रहा है, बल्कि वह दूसरे देशों के साथ मिलकर AI के क्षेत्र में सुरक्षित और पारदर्शी माहौल बनाने के लिए भी काम कर रहा है. पीएम मोदी का यह दौरा भारत को वैश्विक AI नीतियों और नियमों को बनाने में एक अहम स्थान दिलाने के साथ-साथ हमारे टेक्नोलॉजी सेक्टर को नई दिशा भी देगा.
डिजिटल और साइबर सुरक्षा
इस समिट के दौरान भारत और फ्रांस के बीच डिजिटल और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सहयोग हो सकता है. साइबर सुरक्षा के मुद्दे पर दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग की जरूरत और बढ़ गई है, क्योंकि बढ़ती डिजिटल निर्भरता के साथ साइबर हमले भी ज्यादा हो रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए पहले ही सहमति जताई है.
इस समिट के दौरान भारत और फ्रांस दोनों देशों के बीच डेटा सुरक्षा, साइबर क्राइम को रोकने और एंटरप्राइज़ नेटवर्क सुरक्षा जैसे पहलुओं पर चर्चा हो सकती है. जिससे भारत के साइबर सुरक्षा में और मजबूत मिलेगी और फ्रांस के साथ रणनीतिक साझेदारी भी बढ़ेगी. इसके साथ-साथ, डिजिटल भारत के अंतर्गत टेक्नोलॉजी ए़डवांसमेंट को गति मिलेगी, जिससे भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित और उन्नत डिजिटल सेवाएं प्रदान की जा सकेंगी.
ब्लेचली घोषणा क्या है?
ब्लेचली घोषणा एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जो एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) से जुड़ी सुरक्षा और जोखिमों के बारे में चर्चा करती है. यह घोषणा 2023 में यूके में हुए एआई सुरक्षा सम्मेलन के दौरान की गई थी. इस घोषणा में एआई के बारे में दो मुख्य बातें कही गई हैं.
1. एआई के बड़े अवसर और खतरे- एआई आजकल हमारे रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है, जैसे कि स्मार्टफोन, ऑनलाइन सर्च, और कई दूसरी चीजें. लेकिन इसके साथ ही इसके बड़े खतरे भी हैं, जैसे कि गलत तरीके से इसका इस्तेमाल, लोगों के अधिकारों का उल्लंघन, और इससे जुड़े नैतिक मुद्दे. खासकर, जब बहुत ताकतवर एआई सिस्टम्स बनते हैं, तो इनसे सुरक्षा के खतरे और भी बढ़ सकते हैं.
2. वैश्विक सहयोग की जरूरत- एआई के इन खतरों को समझने और नियंत्रित करने के लिए देशों के बीच सहयोग करना बहुत जरूरी है. इस घोषणा में देशों से अपील की गई है कि वे मिलकर काम करें और एआई के खतरे से निपटने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च और पॉलिसी बनाएं. साथ ही, एआई के फायदे सभी देशों तक पहुंचाने के लिए यह सुनिश्चित करें कि विकासशील देशों को भी इसकी सही जानकारी और सुरक्षित इस्तेमाल का अवसर मिले.
घोषणा में यह भी कहा गया है कि एआई के खतरों को समझने के लिए सभी देशों को मिलकर काम करना होगा, ताकि उनकी नीतियां एक जैसी बने. इसमें पारदर्शिता, मूल्यांकन मापदंड, और सुरक्षा परीक्षण जैसे उपायों को शामिल करने की बात की गई है. आखिर में, यह घोषणा इस बात पर जोर देती है कि एआई के सकारात्मक पहलुओं का भी इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन उसके खतरों को समझकर ही इसे सही तरीके से उपयोग करना चाहिए.







