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बिहार : लोकसभा चुनाव-2024 के पहले फेज में 5% कम वोटिंग, वोटिंग परसेंटेज का कम होना किसके लिए नुकसानदेह ………..

UB India News by UB India News
April 21, 2024
in loakshbha 24, पटना, बिहार
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बिहार : लोकसभा चुनाव-2024 के पहले फेज में 5% कम वोटिंग, वोटिंग परसेंटेज का कम होना किसके लिए नुकसानदेह ………..
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लोकसभा चुनाव के पहले चरण में बिहार की चार सीटों पर मतदान हुआ। औरंगाबाद, गया, नवादा और जमुई संसदीय सीट पर वोटरों में उत्साह की कमी रही। निर्वाचन विभाग के मुताबिक इन चार सीटों पर मतदान का औसत परिणाम 48.23 रहा, जो लोकसभा आम निर्वाचन 2019 के मतदान प्रतिशत से लगभग 5 फ़ीसदी कम है। लोकसभा आम चुनाव 2019 में इन चार सीटों का मतदान प्रतिशत 53.47 था।

अब कम वोटिंग के मायने निकाले जा रहे हैं। इसे एंटी इनकंबेंसी के रूप में देखा जा रहा है, तो सरकार के खिलाफ विपक्ष को सत्ता पर बैठाने का उत्साह भी नहीं दिख रहा। निर्वाचन आयोग वोटिंग कम होने की वजह गर्मी जरूर बता रहा है, लेकिन सत्ताधारी दल और विपक्ष के उम्मीदवारों को यह आंकड़ा पसीना छुड़ा रहा होगा।

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राजनीतिक विश्लेषक से इसके मायने समझिए

राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि 5 फ़ीसदी कम वोटिंग होना चौंकाने वाला है। सरकार से जनता की जो उम्मीदें रही है, उसे जरूर इसे जोड़ना होगा। केंद्र की सरकार ने बिहारी युवाओं से बड़े-बड़े वादे किए थे। केंद्र सरकार पूरी तरीके से खरे नहीं उत्तर पाई है। बिहार में बीजेपी जेडीयू की सरकार है। एंटी इंकम्बेसी बड़ी वजह हो सकती है।

दूसरी वजह बताते हैं कि बीजेपी जेडीयू के नेता और कार्यकर्ता वोटरों को मतदान केंद्र तक नहीं ला सके। इसकी वजह है निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं होना। वह बताते हैं कि मोदी की गारंटी, 5 किलो,अनाज आयुष्मान कार्ड जैसे योजनाओं में लोगों को उत्साह नहीं दिख रहा।

आगे कहते हैं कि वोटर मोदी को तो पसंद करते हैं लेकिन उनके सांसदों को नापसंद। संभवत यह भी एक बड़ी वजह रही है कि वोटर मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचे।

निर्वाचन विभाग ने गर्मी की वजह गिनाई। इस पर वह कहते हैं कि लोकसभा आम चुनाव इसी सीजन में करवाए गए हैं। आम चुनाव 2014 और लोकसभा चुनाव 2019 इसी गर्मी में वोटिंग कराए गए थे। वे अभी आगे कहते हैं कि अप्रैल की गर्मी में जब वोटर मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच रहे हैं तो मई और जून में क्या हालात होंगे।

2019 और 2024 में वोटिंग फीसदी का अंतर देखिए

औरंगाबाद सीट पर लोकसभा 2019 में 53 फीसदी वोट पड़े थे। जबकि 2024 आम चुनाव में मतदान का प्रतिशत 50 रहा है। यहां से बीजेपी के सांसद सुशील कुमार सिंह पिछले तीन बार से जीतते आ रहे हैं। इस बार उनके सामने राजद उम्मीदवार अभय कुशवाहा हैं। अभय कुशवाहा काफी मजबूत माने जाते हैं।

गया लोकसभा सीट से पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी एनडीए उम्मीदवार के तौर पर चुनावी दंगल में हैं। उनके सामने राजद के पूर्व मंत्री सर्वजीत है। लोकसभा आम चुनाव 2024 में गया सीट पर 52 फीसदी वोट डाले गए, जबकि लोकसभा आम चुनाव 2019 में यहां का मतदान फ़ीसदी 56.6 था। 4 फीसदी से अधिक का गैप।

इसी तरह नवादा संसदीय सीट से एनडीए प्रत्याशी विवेक कुमार ठाकुर बीजेपी के उम्मीदवार हैं। जो बीजेपी पूर्व सांसद सीपी ठाकुर के बेटे हैं। यह बाहरी नेता के तौर पर माने जा रहे हैं। उनके सामने राजद के श्रवण कुशवाहा हैं। नवादा लोकसभा आम चुनाव 2024 में 41.50 फीसदी है तो लोकसभा आम चुनाव 2019 में 49.33। नवादा पर सबसे ज्यादा गैप दिखा है। यहां तकरीबन 8 फ़ीसदी का मार्जिन दिख रहा है।

जमुई संसदीय सीट परआम चुनाव 2024 में 50 फ़ीसदी वोट पड़े हैं तो 2019 के चुनाव में 55.13 फीसदी। यहां पर भी 5 फीसदी से अधिक का मार्जिन है।

वोटिंग परसेंटेज का कम होना बीजेपी के लिए नुकसानदेह !

बिहार में पहले चरण का चुनाव खत्म हो गया है। फर्स्ट फेज की चार सीटों पर पूर्व में हुए चुनावों की तुलना में इस बार वोटिंग प्रतिशत में भारी गिरावट आई है। सबसे कम वोटिंग नवादा में हुई है। यहां सिर्फ 41.5 फीसदी ही वोटिंग हुई है, जो पिछले 15 वर्षों में सबसे कम है।

2019 में जहां इस सीट पर 51.7 फीसदी वोटिंग हुई थी तो सबसे कम 2009 में 41.6 फीसदी थी। वहीं, 2014 में मोदी लहर के दौरान यहां 52.18 फीसदी वोटिंग हुई थी। वहीं, इस बार औरंगाबाद और जमुई में 50-50 फीसदी वोटिंग हुई है। जबकि, 2019 के चुनाव में औरंगाबाद में 55.5 तो जमुई में 57.8 फीसदी वोटिंग हुई थी।

गया में इस बार सबसे अधिक 52 फीसदी वोटिंग हुई है, जो पिछले चुनाव की तुलना में लगभग 6 फीसदी कम है। 2019 में यहां 58.1 फीसदी वोटिंग हुई थी। इस लिहाज से देखें तो केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद पहली बार वोटिंग पर्सेंटेज में इतनी गिरावट आई है। इससे पहले 2009 में यूपीए सरकार के दौरान वोटिंग पर्सेटेज में गिरावट आई थी।

वोटिंग पर्सेंटेज गिरना मोदी सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं

वोटिंग पर्सेंटेज का कम होना मोदी सरकार के लिए शुभ संकेत नहीं है। ये उनके लिए खतरे की घंटी है।  लगभग सभी सीटों पर इस बार नए कैंडिडेट चुनाव लड़ रहे थे। इसके बाद भी वोटर्स में उस तरह का उत्साह नहीं दिखा। नवादा, जमुई और औरंगाबाद में लगभग दोनों ही तरफ के कैंडिडेट नए थे। बावजूद इसके वोटर्स टर्न आउट यहीं कम हुआ है। बिहार में चुनाव के लिहाज से ये शुभ संकेत नहीं है।

अब 4 पॉइंट में समझिए वोटिंग में गिरावट के कारण

1. भीषण गर्मी के कारण नहीं निकले लोग

नवादा के वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं कि इस बार गर्मी का भारी असर वोटिंग पर भी देखने को मिला। सुबह 7-9 बजे तक वोटिंग की जो रफ्तार रही, वह 10 बजे के बाद और घटती चली गई। दोपहर तक लगभग बूथ पर सन्नाटा पसरा था। इसका बड़ा कारण था अचानक तापमान में बढ़ोतरी। शुक्रवार को राज्य के कई इलाकों का पारा 40 के पार पहुंच गया।

2. नेताओं के प्रति वोटर्स की घटती दिलचस्पी

गर्मी के साथ इस बार एक बड़ा फैक्टर रहा नेताओं के प्रति वोटर्स की घटती दिलचस्पी। खास कर शहरी क्षेत्र के बूथों पर ये साफ तौर पर दिख रहा था। जमुई के वरिष्ठ पत्रकार मुरली दीक्षित कहते हैं कि जमुई में 2014 और 2019 के समय एनडीए कार्यकर्ताओं में जो जोश था, वो इस बार नहीं दिखा है।

हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में महागठबंधन और एनडीए दोनों के ही समर्थक उत्साहित दिखे। इधर, शहरी वोटर काफी कम निकले हैं। इसलिए 2019 से कम वोट प्रतिशत देखा जा रहा है। वहीं, नवादा के वरिष्ठ पत्रकार अशोक प्रियदर्शी कहते हैं कि सवर्ण वोटर्स में इस बार अग्रेशन का अभाव दिख रहा था। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में पिछड़े वर्ग के वोटर्स खास कर यादव बड़ी संख्या में घरों से निकल कर बूथ तक पहुंचे हैं।

3. बीएलओ की लापरवाही से नहीं मिली वोटिंग पर्ची

इस बार वोट पर्सेटेज में गिरावट की एक वजह बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) की लापरवाही भी है। नवादा के ग्रामीण और शहरी इलाकों में बड़ी संख्या में ऐसे वोटर्स मिले, जिनके घर तक वोटिंग पर्ची ही नहीं पहुंची थी। इसके कारण एक तो वोटर्स को इस बात की जानकारी नहीं मिल सकी कि उनका पोलिंग बूथ कौन सा है। दूसरा अगर बिना पर्ची लिए कोई पोलिंग बूथ तक पहुंच भी जाते थे तो वहां के पदाधिकारी पर्ची के बिना वोट डालने नहीं देते थे। ये शिकायत नवादा के साथ-साथ जमुई के भी कई इलाकों में देखने को मिला।

4. शादियों ने बिगाड़ा चुनाव का माहौल

चुनाव की तारिख ऐसे दिन निर्धारित की गई थी, जो शादी के लिए शुभ दिन था। 18-19 अप्रैल शादी के लिए शुभ दिन था। बड़ी संख्या में शादी थी और लोग चुनाव छोड़ शादियों में व्यस्त थे। इसका भी बड़ा असर वोटिंग पर्सेटेज पर पड़ा है। ग्रामीण इलाकों में इसकी खूब चर्चा थी कि लोग शादी में बाहर गए हुए हैं।

दो चुनाव से वोटिंग के ग्राफ का जीत-हार पर नहीं पड़ रहा असर

पिछले दो चुनाव के नतीजे को देखें तो वोटिंग पर्सेटेज के उतार-चढ़ाव का कैंडिडेट के जीत हार पर बहुत ज्यादा असर नहीं है। नवादा में 2009 से लगातार बीजेपी या एनडीए के उम्मीदवार जीत रहे हैं। 2014 में 52 फीसदी वोटिंग हुई तो इसमें एनडीए समर्थित बीजेपी प्रत्याशी गिरिराज सिंह को 44.1% वोट पाए और विजयी रहे। जबकि, 2019 में वोटिंग पर्सेटेज घटकर 51.7 हुआ तो इसमें एनडीए समर्थित लोजपा प्रत्याशी चंदन सिंह 26.9% पाए और जीतने में सफल रहे।

वहीं, जमुई में पिछले दो चुनाव से लगातार एलजेपी (आर) सुप्रीमो चिराग पासवान चुनाव जीतते आ रहे हैं। वहीं, गया में भी पिछले दो चुनाव से एनडीए के प्रत्याशी ही जीतने में सफल रहे हैं। जबकि, यहां 2019 के चुनाव में 2015 से लगभग 5 फीसदी कम मतदान हुआ था। औरंगाबाद में भी वोटिंग पर्सेटेज का आंकड़ा गिरा, लेकिन भाजपा के सुशील सिंह जीतने में सफल रहे।

बिहार का चुनाव टफ इसलिए पीएम लगातार कर रहे हैं सभा

पॉलिटिकल एक्सपर्ट अरुण पांडेय कहते हैं कि इस बार बिहार की जमीन पर फतह कर पाना आसान नहीं है। ये बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अच्छे से समझ रहे हैं। लालू यादव के प्रयोग ने बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी है। यही कारण है कि पीएम बार-बार बिहार आ रहे हैं।

पहले चरण की 4 सीटों में तीन पर पीएम मोदी की सभा हुई है। अपने चुनावी कैंपेन की शुरुआत प्रधानमंत्री ने जमुई में अपने सहयोगी लोजपा (आर) के प्रत्याशी अरुण भारती के लिए सभा की। इसके बाद नवादा में विवेक ठाकुर के लिए उन्होंने वोट मांगे। इसके बाद वे गया में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के पक्ष में प्रचार करने पहुंचे। गया की सभा में तो उन्होंने यहां तक कह दिया कि आप मांझी नहीं मोदी को वोट देंगे।

लालू की किलेबंदी से बीजेपी की चुनौती बढ़ी

पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं कि इस बार कैंडिडेट सिलेक्शन से लेकर सीट शेयरिंग तक सब कुछ लालू प्रसाद अपने हाथ में रखे हुए हैं। केवल राजद ही नहीं महागठबंधन की सहयोगी पार्टियों की कमान भी वो अपने हाथ में रखे हुए हैं। लालू प्रसाद यादव ने इस बार अपनी जातीय समीकरण के प्रयोग से बीजेपी की चुनौती बढ़ा दी है। यही कारण है कि देश के हर राज्य में प्रयोग करने वाली बीजेपी बिहार में सभी प्रयोग को किनारे कर अपने पुराने और विनिंग कैंडिडेट पर ही दांव लगाया है।

प्रधानमंत्री मोदी के साथ गृह मंत्री अमित शाह भी लगातार बिहार का दौरा कर रहे हैं। हालांकि, अभी पहले चरण की चार सीटों पर ही वोटिंग हुई है। अभी बिहार में 6 चरण का चुनाव बाकी है। इसमें लालू और मोदी क्या प्रयोग करते हैं। यह देखना दिलचस्प रहेगा।

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