बिहार के सीएम नीतीश कुमार को महागठबंधन ने उसी दिन से पीएम फेस बताना शुरू कर दिया था, जब वे एनडीए छोड़ महागठबंधन के साथ आए थे। आरजेडी और जेडीयू ने तो नीतीश को प्रतीकात्मक तरीके से पीएम बताना भी शुरू कर दिया। जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह उन्हें लगातार पीएम पद के सर्वथा योग्य उम्मीदवार बताते रहे। आरजेडी के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह तो पीएम पद के लिए लालू यादव का नीतीश को आशीर्वाद मिलने का दावा भी करने लगे। जेडीयू के एक एमएलसी ने रमजान के महीने में इफ्तार के दौरान लाल किले की आकृति के पंडाल में नीतीश को बिठाया। सियासी जानकार कहते हैं कि विपक्षी एकता को कांग्रेस ने पूरी तरह हाईजैक कर लिया। भाकपा (माले) जैसे सहयोगी नाराज चल रहे हैं।
RJD और JDU नेता बताते रहे पीएम कैंडिडेट
समय-समय पर नीतीश को पीएम बनाने के पोस्टर भी लगते रहे। जेडीयू कार्यकर्ता नीतीश को देखते ही- हमारा पीएम कैसा हो, नीतीश कुमार जैसा हो- नारे लगाने से नहीं चूकते। इन सबके बावजूद नीतीश कुमार पहले तो चुप रहे, लेकिन बाद में खुल कर कहना शुरू किया कि वे पीएम पद की रेस में शामिल नहीं हैं। यही बात उन्होंने तब भी दोहराई, जब वे विपक्षी नेताओं से एकजुट होने का प्रस्ताव लेकर मिलने गए थे। आखिर क्या वजह थी कि बेदाग छवि और लंबा सियासी अनुभव वाले नीतीश कुमार ने खुद को पीएम पद की रेस से बाहर कर लिया? नीतीश कुमार अब पूर्व की तरह ‘इंडिया’ गठबंधन की चर्चा को लेकर उत्साहित नहीं होते। नीतीश कुमार अब राजनीतिक ऊर्जा के साथ विपक्षी एकता पर जवाब नहीं देते। कुल मिलाकर वो ‘मन न रंगाए रंगाए जोगी कपड़ा’ भाव में हैं। ‘इंडिया’ गठबंधन का साथ छोड़ते भी नहीं बनता और खुलकर समर्थन करते भी।
जेडीयू के 16 सांसद- पीएम पद कैसे मिलेगा
नीतीश को मालूम है कि फिलहाल उनके पास 16 सांसद हैं। विपक्षी गठबंधन के साथ जाने पर चुनाव लड़ने के लिए इतनी सीटें मिल भी पाएंगी या नहीं, इसमें संदेह है। इसलिए कि छह दावेदारों में लोकसभा की 40 सीटें बंटनी हैं। हिस्से में पिछली बार की तरह चुनाव लड़ने के लिए 17 सीटें मिल पाना संभव नहीं दिखता। अगर सीटें मिल भी जाएं और पिछली बार जितनी सीटें जीत भी जाएं तो भी उतनी सीटों से पीएम पद की दावेदारी हास्यास्पद ही कही जाएगी। आज की तारीख में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है। दूसरे नंबर पर तृणमूल कांग्रेस (TMC) है। ऐसे में नीतीश के भाग्य से छींका न टूटे तो उन्हें अपना नेता मानने के लिए कौन तैयार होगा ? जहां तक आरजेडी के समर्थन का सवाल है तो लोकसभा में अभी वह खुद ही शून्य पर है। अगली बार कुछ सीटें जीत भी जाए तो उसके समर्थन से नीतीश का कोई भला नहीं होने वाला। नीतीश को यह बात अच्छी तरह पता है। उनके इनकार के पीछे सबसे बड़ी वजह यही है।
बिहार में बड़ी पार्टी भी नहीं है जेडीयू, सिर्फ 43 MLA
नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू कभी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी होती थी। पर, अब उसकी वैसी स्थिति नहीं है। नीतीश कुमार के सिर्फ 43 विधायक हैं, जबकि जेडीयू से अधिक विधायक आरजेडी के पास हैं। इसलिए नीतीश को पहले जितना टिकट भी लोकसभा चुनाव के लिए मिल पाना मुश्किल है। जिस तरह उपेंद्र कुशवाहा और आरसीपी सिंह के अलग होने से नीतीश के लव-कुश समीकरण में दरार पड़ी है, उसमें पिछली बार जितनी सीटें जीतना भी जेडीयू के लिए मुश्किल होगा। कभी जेडीयू के साथ रहे चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर तो दावा करते हैं कि नीतीश को पांच सीटें भी लोकसभा में मिल जाएं तो बड़ी बात होगी। अपने दावे की पुष्टि के लिए वे बंगाल विधानसभा के साल 2021 में हुए चुनाव का हवाला भी देते हैं। उन्होंने चुनाव से काफी पहले कह दिया था कि बीजेपी डबल डिजिट पार नहीं कर पाएगी। परिणाम भी उसी अनुरूप आया था।
सर्वेक्षणों में भी दूसरों से नीचे दिखते हैं नीतीश कुमार
लोकनीति और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) का एक सर्वेक्षण कुछ महीने पहले आया था, जिसमें नेताओं की लोकप्रियता की रेटिंग की गई थी। सर्वेक्षण में पता चला कि बिहार के सीएम नीतीश कुमार लोकप्रियता में सबसे निचले पायदान पर हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद 10 से 19 मई के बीच 19 राज्यों में कराए गए सर्वेक्षण में पता चला कि नीतीश कुमार सिर्फ एक प्रतिशत लोगों को पीएम के रूप में पसंद हैं। बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल 4-4 फीसदी के साथ तीसरे स्थान पर थे। अखिलेश यादव को तीन प्रतिशत लोगों ने पसंद किया। यानी यह बात बिल्कुल साफ है कि नीतीश की पहचान बिहार छोड़ अन्य राज्यों में शायद ही है। हां, एक बात दर्ज करने लायक है कि नरेंद्र मोदी अब भी पीएम के रूप में लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। दूसरे नंबर पर राहुल गांधी हैं। हालांकि मोदी से राहुल की लोकप्रियता का फासला इतना बड़ा है कि उनके बारे भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि वे पीएम बनेंगे।







