नए वर्ष के आगमन की तैयारियां इसका भी अवसर प्रदान करती हैं कि एक राष्ट्र के रूप में हमने बीते हुए वक्त में क्या खोया और पाया? खोया-पाया पर दृष्टिपात करते समय कुछ जरूरी सबक सीखने भी आवश्यक होते हैं। वैसे तो सबक सीखने की आवश्यकता हर किसी को होती है, लेकिन यदि राजनीतिक वर्ग इस मामले में सजगता-सक्रियता का परिचय दे तो उससे पूरा राष्ट्रजीवन लाभान्वित होता है, क्योंकि यह राजनीति ही है, जो समाज को सबसे अधिक प्रभावित करती है। राजनीति में बदलाव के साथ ही तमाम तरह के सुधार भी अपेक्षित हैं, लेकिन इस दिशा में आगे नहीं बढ़ा जा पा रहा है। इसका उदाहरण संसद के शीतकालीन सत्र में मिला, जो करीब एक सप्ताह पहले समाप्त हो गया।
वैसे तो यह पक्ष-विपक्ष की सहमति से हुआ और देश को यह बताया गया कि क्रिसमस के चलते संसद सत्र एक सप्ताह पहले खत्म किया जा रहा है, लेकिन यदि पक्ष-विपक्ष मौजूदा समस्याओं पर गंभीर चर्चा के लिए तत्पर होते तो क्रिसमस के अवकाश के बाद भी संसद को चलाया जा सकता था। चूंकि अब संसद कम दिन चलती है और आम तौर पर उसकी कार्यवाही हंगामे से दो-चार होती रहती है, इसलिए उसका असर विधानसभाओं पर भी पड़ने लगा है। अब विधानसभाओं के दो-तीन दिन के ही सत्र आयोजित होना बहुत आम हो गया है। इन दो–तीन दिनों में भी अच्छा-खासा समय हंगामे में जाया हो जाता है।
अच्छा होता कि देश का राजनीतिक वर्ग यह सबक सीखता कि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों को लेकर एकमत और एकजुट होना समय की मांग है। पक्ष-विपक्ष के राजनीतिक दलों के पास राष्ट्र के लिए ऐसा कोई साझा एजेंडा होना चाहिए था, जिसे मिलकर पूरा करना उनकी पहली प्राथमिकता होती। बीतते वर्ष ऐसा क्यों नहीं हो पाया, इसे लेकर सबक सीखा ही जाना चाहिए। निःसंदेह विपक्ष का काम सरकार के कामों पर निगाह रखना होता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह हर काम में अड़ंगा लगाने को अपना प्राथमिक दायित्व मान ले। बीतते वर्ष यही स्थिति रही और इसी कारण राष्ट्रीय महत्व के अनेक प्रश्न अनसुलझे बने रहे।
जिस तरह राजनीतिक वर्ग को देश की उम्मीदों को पूरा करने के लिए अपनी कार्यशैली बदलने की जरूरत है, उसी तरह प्रशासनिक वर्ग को भी। प्रशासनिक तंत्र पर न केवल सरकारों के फैसलों पर अमल करने की जिम्मेदारी होती है, बल्कि समस्याओं का सही समाधान खोजने की भी। जब राजनीतिक और प्रशासनिक वर्ग अपने हिस्से की जिम्मेदारी का निर्वाह कर रहे हों तब फिर आम जनता के लिए भी यह आवश्यक हो जाता है कि वह भी अपने हिस्से के कर्तव्यों का पालन करे। स्पष्ट है कि सबके लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि हर किसी को वह सब करना होता है, जो उससे अपेक्षित होता है।







