राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के इस कथन पर निश्चय ही गंभीरता से विमर्श होना चाहिए कि हमारा कार्य पुरुषार्थ और कर्म करना है‚ नारेबाजी या जोश में होश खोना नहीं। दो साल बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मनाएगा और इन वर्षों के बीच यह विश्व का सबसे बड़ा संगठन हो चुका है। इससे निकले संगठनों ने भी अपने–अपने क्षेत्र में कीर्तिमान के झंडे गाड़े हैं। भाजपा अभी देश का सबसे बड़ा दल है‚ और केंद्र और सबसे ज्यादा राज्यों में सरकार चला रहा है। बावजूद संघ को गैर–जिम्मेदार‚ फासीवादी‚ सांप्रदायिक‚ नफरती‚ विभाजनकारी‚ दंगाई और भी न जाने क्या–क्या कहा जाता है‚ लेकिन सच यह है कि मोहन भागवत सहित संघ के ज्यादातर पदाधिकारी अत्यंत संतुलित और जिम्मेवारी भरे वक्तव्य दे रहे हैं।
अभी जिस वक्तव्य की हम चर्चा कर रहे हैं‚ वह बिहार के बक्सर में आयोजित सनातन संस्कृति समागम के अंतरराष्ट्रीय संत सम्मेलन में दिया गया है। श्रीराम कर्मभूमि न्यास के इस कार्यक्रम में भागवत ने कहा कि धर्म के लिए कर्म अवश्य करना चाहिए‚ स्वयं के लिए अथवा किसी से डर कर नहीं यानी आपका जो भी कर्म हो‚ वह धर्म के अनुरूप हो‚ संकुचित स्वार्थ या भय से किया गया कर्म इस श्रेणी में नहीं आ सकता। संघ का प्रत्येक पदाधिकारी यही कहता है कि हम राष्ट्र और धर्म की सेवा स्वप्रेरणा से करते हैं। चूंकि वहां संतों का समागम था‚ इसलिए इस बात का महत्व दूसरे मायनों में भी है।
पिछले वर्षों में हिंदुत्व और भारतीयता को लेकर जो जागृति हुई है‚ उसका सकारात्मक पक्ष तो है किंतु एक बड़ा नकारात्मक पहलू भी चिंताजनक रूप से उभरा है। वह पक्ष है‚ गैर–जिम्मेदार तरीके से कुछ भी बोलना। सोशल मीडिया के दौर में लगातार बोलना या नारेबाजी करना प्रबल हो गया है‚ और कर्म यानी पुरुषार्थ गौण। होना ठीक उल्टा चाहिए था। बोला जाए तो जनचेतना जागृति के साथ कर्म की ओर प्रवृत्त करने के लिए। पिछले कुछ समय में ऐसे लोग‚ नेता‚ संत आदि उभर आए हैं‚ जो लोगों को केवल अपनी बातों से उत्तेजित करते हैं। कोई इस्लाम का विशेषज्ञ होकर भाषण दे रहा है सोशल मीडिया पर और लोगों की उसे तालियां मिल रही हैं। हिंदुत्व के नाम पर भी कुछ लोग गैर–जिम्मेदार तरीके से भड़काऊ वक्तव्य देते हैं‚ जिनसे पूरी विचारधारा बदनाम होती है। इसके तीन अर्थ हैं। कुछ स्वार्थी तत्व जिनका हिंदुत्व की विचारधारा से कोई लेना देना नहीं है‚ वे अपने स्वार्थ की पूर्ति कर रहे हैं। कोई इस्लाम पर बोल कर लोकप्रियता पा रहा है‚ तो कोई धन कमा रहा है‚ तो कोई हिंदुत्व के नाम पर अनर्गल बातें बोल कर एक वर्ग का हीरो बन रहा है। दूसरे‚ कुछ ऐसे लोग भी हैं‚ जिनका इरादा सही है लेकिन उन्हें पता ही नहीं कि हिंदुत्व और भारतीयता क्या है। इस कारण वे गलतफहमी पैदा करते हैं। तीसरी श्रेणी उन लोगों की है‚ जो समझते तो हैं किंतु कई कारणों से निराश हैं। इसमें हिंदुओं के सबसे बड़े संगठन की जिम्मेदारी है कि सही परिपेक्ष्य लगातार सामने रखे और कार्यकर्ताओं के साथ आम लोगों को भी आगाह करता रहे। यही भूमिका भागवत सहित संघ के पदाधिकारी निभा रहे हैं। यति नरसिंहानंद की भाषा के कारण भारत सहित दुनिया भर के विरोधियों को मौका मिला और उन्होंने यह प्रचारित किया कि यही असल में हिंदुत्व ब्रिगेड है।
इसी तरह कालीचरण द्वारा नाथूराम गोडसे के महिमामंडन को भी विश्व भर में प्रचारित किया गया। इस्लाम के विरुद्ध आग उगलने वाले कुछ सोशल मीडिया और मंचों के हीरो के वक्तव्यों को भी इसी तरह दुष्प्रचारित किया जाता है। विरोधी यही तस्वीर पेश करते हैं कि ये सभी के सभी संघ और भाजपा के ही हैं। भागवत ने समय–समय पर इन सब पर अपना मंतव्य प्रकट किया है। नासमझ और अतिवादी लोगों को यह नागवार गुजरा लेकिन यही हिंदुत्व एवं भारत के सभी लोगों के हित में है। भागवत ने संत समागम में यही कहा कि धर्म के लिए कर्म करना चाहिए‚ खुद के लिए अथवा किसी से डरकर नहीं। धर्म का उद्देश्य समाज‚ राष्ट्र और विश्व का कल्याण होता है। इसके लिए सहज और निष्कपट रहना आवश्यक है। भाषणबाजी और नारेबाजी से धर्म पूरा नहीं होता। मूल बात है कर्म। और कर्म का उद्देश्य भी सर्वहित होना चाहिए। अगर आप स्वयं को धार्मिक मानते हैं‚ तो आपको भीतर–बाहर‚ दोनों से शुद्ध–निश्छल होना चाहिए। निश्छलता का अर्थ यह नहीं है कि कोई हमको बेवकूफ बनाए और हम बनते रहे। राष्ट्र और धर्म के प्रति चैतन्यशील व्यक्ति हमेशा जागृत रहता है। जब आप बड़ा लक्ष्य लेकर काम करते हैं तो हर व्यक्ति के अंदर अच्छाई देखते हुए भी हमेशा सतर्क रहते हैं। इससे आपको कोई ठगता नहीं‚ भ्रमित नहीं करता। इस समय यह वक्तव्य इसलिए देना आवश्यक था ताकि सारे लोगों के अंदर यह संदेश जाए कि अगर कोई केवल नारेबाजी और भाषणबाजी कर रहा है तो मान लीजिए कि उसे धर्म का बोध नहीं। उससे हमें सचेत और सतर्क रहना है। भागवत ने स्पष्ट कहा कि अगर आपकी मनोकामना है कि भारत नामक यह राष्ट्र सर्वोच्च शिखर पर पहंुचे और हिंदू धर्म विश्व के कल्याण का वाहक बने तो उसको पूरा करने के लिए आप कर्म और पुरु षार्थ करिए। उन्होंने वहां प्रभु श्री राम का उदाहरण दिया और बताया कि कैसे उन्होंने छोटे से छोटे लोगों को गले लगाया। अहिल्या का उद्धार‚ केवट को गले लगाना तथा शबरी के बैर खाना प्रेम के उत्कट उदाहरण हैं।
भागवत ने सभी से आग्रह किया है कि प्रेम‚ करु णा ैऔर भाईचारे का संदेश देते हुए एक दूसरे को जोड़ें और एक दूसरे से जुड़ें। भारत का उत्थान करना है‚ तो हम गुणवान बनें‚ एक दूसरे को जोड़ें तथा देश‚ धर्म और संस्कृति के लिए काम करें। कर्मवीर और पुरुषार्थ किसी की याचना नहीं करते बल्कि स्वयं को योग्य बनाते हैं। अपने अनुसार सफलता न मिलने का अर्थ उग्रवादी और अतिवादी‚ होना नहीं है। नियति समय के अनुसार ही सफलता देती है। तो कुल मिलाकर भागवत ने कहा है कि धर्म और राष्ट्र के मर्म को समझें‚ अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए स्वयं को समर्थ और सक्षम बनाइए तथा इसके लिए देवी–देवताओं के चरित्र को आत्मसात करें। अपने अंदर हमेशा प्रेम और करुणा का भाव रहे‚ घृणा का नहीं। सफलता अपने समय से ही आएगी। इसलिए धैर्य खोकर अतिवाद या उग्रवाद का मार्ग न पकड़ा जाए। अतिवादी–उग्रवादी भाषा बोलने या कर्म करने वालों से सतर्क रहकर ही लक्ष्य को पाया जा सकता है।






